Monday, February 16, 2026
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Delhi Dwarka Court: मजिस्ट्रेट की दी गई सजा पर सेंशस कोर्ट की फटकार, यह है मामला

Delhi Dwarka Court: दिल्ली के द्वारका कोर्ट ने आरोपियों को कोर्ट उठने तक हाथ ऊपर कर खड़े रहने की सजा को रद्द कर दिया।

मजिस्ट्रेट का आदेश पूरी तरह से अवैध

डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज अंजू बजाज चांदना ने मामले में मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस आदेश को रद्द किया है। कहा, कानून में ऐसी सजा का कोई प्रावधान नहीं है और मजिस्ट्रेट का आदेश पूरी तरह से अवैध है। कोर्ट ने कहा, न्यायिक मजिस्ट्रेट सौरभ गोयल ने इस तरह की सजा देकर कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया और अपने कर्तव्य में चूक की।

जमानत बॉन्ड समय पर न देना IPC Sec 228 में नही आता: कोर्ट

जमानत बॉन्ड समय पर न देना आईपीसी की धारा 228 (न्यायिक कार्यवाही में बाधा या अपमान) के दायरे में नहीं आता और इसे जानबूझकर अपमान नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हाथ ऊपर कर खड़े रहने जैसी सजा कानून में कहीं नहीं है। कुलदीप और राकेश की ओर से एडवोकेट काव्या, हिमानी वर्मा और अमन गहलोत पेश हुए। सरकार की ओर से एडिशनल पब्लिक प्रोसिक्यूटर रितेंदर सिंह ने पक्ष रखा। मूल शिकायतकर्ता की ओर से एडवोकेट संदीप शौकीन और हनीश बालयान पेश हुए।

कोर्ट ने कहा- बिना सुनवाई के सजा देना गलत

सेशंस जज ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने आरोपियों को यह बताने का मौका भी नहीं दिया कि उनके खिलाफ धारा 228 के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। बिना सुनवाई के ही उन्हें कोर्ट उठने तक हाथ ऊपर कर खड़े रहने को कहा गया, जो कि कानून के खिलाफ है।

मजिस्ट्रेट को दी गई सलाह

सेशंस कोर्ट ने मजिस्ट्रेट गोयल को सलाह दी कि वे अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करने से पहले कानूनी प्रावधानों को ठीक से पढ़ें और समझें।

15 जुलाई को दिया गया था आदेश

यह मामला 15 जुलाई का है, जब एक शिकायत केस में मजिस्ट्रेट ने देखा कि दो बार बुलाने के बावजूद आरोपी समय पर जमानत बॉन्ड नहीं दे पाए। इसे कोर्ट की अवमानना मानते हुए उन्होंने आरोपियों को हाथ ऊपर कर खड़े रहने की सजा दी थी।

आरोपियों ने फैसले को चुनौती दी

आरोपी कुलदीप और राकेश ने इस आदेश को सेशंस कोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि मजिस्ट्रेट ने अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया और कोर्ट की गरिमा बनाए रखने के नाम पर उनकी गरिमा का उल्लंघन किया।

सेशंस कोर्ट ने कहा- यह आदेश कानून के खिलाफ

सेशंस कोर्ट ने कहा कि यह आदेश न केवल प्रक्रियात्मक बल्कि मूल कानून के भी खिलाफ है। कोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, चाहे वह किसी अपराध में शामिल हो या नहीं। कोर्ट का कर्तव्य है कि वह बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के किसी को भी सजा न दे। इसलिए कोर्ट ने मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर दिया।

CA No. 362/2025
Kuldeep और Rakesh बनाम Govt. of NCT of Delhi Through SHO PS Palam Village व Harkesh Jain

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