Women Safety: दिल्ली हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए यौन दुराचार (Sexual Misconduct) के आरोपी एक व्यक्ति की FIR रद्द करने से इनकार कर दिया है।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| विवरण | तथ्य |
| मुख्य धाराएं | IPC 498A, 406 (विश्वासघात), 354 (छेड़छाड़) और दहेज निषेध अधिनियम। |
| आरोपी | शिकायतकर्ता का जेठ (Brother-in-law)। |
| कोर्ट का रुख | FIR रद्द करने की याचिका खारिज। |
| महत्वपूर्ण टिप्पणी | जघन्य अपराधों में ‘समझौता’ (Settlement) FIR रद्द करने का आधार नहीं हो सकता। |
जेठ पर छेड़छाड़ और यौन दुराचार का आरोप
जस्टिस गिरीश कठपालिया ने जोर देकर कहा कि ऐसे “जघन्य” (Heinous) आरोप निजी वैवाहिक विवादों या दहेज के मामलों के दायरे से बाहर हैं और इन्हें केवल ‘पारिवारिक कलह’ मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला ने अपने जेठ या देवर (Brother-in-law) पर यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं, तो उसे केवल इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता क्योंकि पति-पत्नी के बीच समझौता हो गया है। यह मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा है जिसने अपने ससुराल वालों पर दहेज उत्पीड़न (498A) के साथ-साथ अपने जेठ पर छेड़छाड़ और यौन दुराचार (354) के गंभीर आरोप लगाए थे।
मुख्य तर्क: न्याय के हित का अर्थ (Interest of Justice)
- अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers) का इस्तेमाल गंभीर आरोपों को ‘कालीन के नीचे दबाने’ (Dumping under the carpet) के लिए नहीं किया जा सकता।
- समझौता बनाम अपराध: याचिकाकर्ता (आरोपी) ने दलील दी थी कि चूंकि शिकायतकर्ता महिला ने अपने पति और ससुराल वालों के साथ सभी वैवाहिक विवाद सुलझा लिए हैं, इसलिए यह FIR रद्द होनी चाहिए।
- कोर्ट का रुख: कोर्ट ने कहा कि “न्याय के हित” का अर्थ केवल वादियों की सुविधा के लिए केस निपटाना नहीं है। यौन दुराचार के आरोप कोई मामूली सिविल या वैवाहिक गलती नहीं हैं।
शॉकिंग और बेहद गंभीर आरोप
- FIR का अध्ययन करने के बाद जस्टिस कठपालिया ने कुछ विशिष्ट घटनाओं का उल्लेख किया।
- विशिष्ट घटना: FIR के अनुसार, एक बार जब शिकायतकर्ता बाथरूम से बाहर आई, तो उसने देखा कि उसका जेठ उसके बिस्तर पर लेटा हुआ है, जिससे वह स्तब्ध रह गई।
- सत्यता की पुष्टि: जब आरोपी ने कहा कि ऐसी कोई घटना नहीं हुई, तो कोर्ट में मौजूद महिला ने खुद खड़े होकर इस घटना की पुष्टि की। कोर्ट ने इसे “अत्यंत गंभीर” माना जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
मिनी-ट्रायल नहीं करेगी अदालत
- दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इन आरोपों की सच्चाई की जांच करने के लिए कोई ‘मिनी-ट्रायल’ नहीं चलाएगी।
- ट्रायल की भूमिका: आरोप सच हैं या झूठ, यह तय करना ट्रायल कोर्ट का काम है।
- झूठे आरोपों पर टिप्पणी: कोर्ट ने माना कि आजकल 498A के मामलों में अक्सर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत हर ऐसे आरोप को ‘झूठा’ मान ले। यदि ट्रायल के बाद आरोप झूठे पाए जाते हैं, तो शिकायतकर्ता को कानूनी परिणामों का सामना करना चाहिए, लेकिन तब तक वास्तविक पीड़ितों को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।
महिलाओं की गरिमा सर्वोपरि
यह फैसला एक नजीर है कि वैवाहिक विवादों के समाधान के नाम पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले गंभीर यौन अपराधों को माफ नहीं किया जा सकता। दिल्ली हाई कोर्ट ने संदेश दिया है कि जहाँ मामला ‘गरिमा’ और ‘सुरक्षा’ का हो, वहाँ न्यायपालिका पूरी गंभीरता से ट्रायल प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करेगी।

