WOMENS RESERVATION: केंद्र सरकार ‘महिला आरक्षण अधिनियम’ (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) को लेकर एक ऐतिहासिक कदम उठाने पर विचार कर रही है।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस संभावना को टटोल रही है कि क्या जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation) का इंतजार किए बिना ही इस कानून को लागू किया जा सकता है। आई जानकारी के अनुसार, हालांकि अभी केंद्रीय कैबिनेट के लिए कोई औपचारिक प्रस्ताव तैयार नहीं किया गया है, लेकिन 2023 में पारित इस कानून में संशोधन की योजना पर काम शुरू हो चुका है।
क्या है मौजूदा पेंच?
106वें संविधान संशोधन अधिनियम के अनुसार, लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तभी लागू होगा जब अगली जनगणना (Census) पूरी हो जाए। उसके बाद निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन (सीमाओं का पुनर्निर्धारण) संपन्न हो जाए। यदि सरकार परिसीमन से पहले इसे लागू करना चाहती है, तो उसे संसद में एक और संविधान संशोधन विधेयक लाना होगा।
सीटों के चयन के लिए ‘गीता मुखर्जी कमेटी’ का फॉर्मूला
- परिसीमन आयोग एक तटस्थ संस्था है जो जनसंख्या के आधार पर सीटें तय करता है। लेकिन अगर परिसीमन नहीं होता, तो महिलाओं के लिए सीटें कैसे चुनी जाएंगी? इसके लिए सरकार रोटेशन (बारी-बारी से) पद्धति पर विचार कर सकती है।
- ऐतिहासिक संदर्भ: 1990 के दशक के मध्य में गीता मुखर्जी समिति ने सुझाव दिया था कि आरक्षित सीटों को हर चुनाव के बाद बदला (Rotate) जाना चाहिए।
- लक्ष्य: तीन आम चुनावों के चक्र के बाद, देश की सभी सीटें कम से कम एक बार महिलाओं के लिए आरक्षित हो चुकी होंगी।
- वर्तमान स्थिति: 2023 में पारित कानून में फिलहाल रोटेशन का प्रावधान नहीं है, जिसे संशोधन के जरिए जोड़ा जा सकता है।
मुख्य बिंदु और चुनौतियां
- विपक्ष का रुख: अपुष्ट खबरों के अनुसार, सरकार ने कुछ विपक्षी नेताओं को इस बदलाव के संकेत दिए हैं। विपक्ष पहले से ही इसमें OBC कोटा की मांग कर रहा है।
-समय सीमा: यह आरक्षण लागू होने के बाद 15 वर्षों तक प्रभावी रहेगा, जिसे संसद आगे बढ़ा सकती है।
-संवैधानिक प्रक्रिया: लोकसभा और राज्यसभा में इस बदलाव के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी। 2023 में यह बिल लगभग सर्वसम्मति से पास हुआ था।
विशेषज्ञों की राय
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि चुनाव आयोग पूरे देश में परिसीमन नहीं कर सकता (जैसा उसने हाल ही में केवल असम में किया था)। इसलिए, पूरे भारत में महिला आरक्षण को जल्द लागू करने के लिए कानून में बदलाव ही एकमात्र व्यवहारिक रास्ता नजर आ रहा है।

