Tuesday, October 27, 2026
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Husband-Wife Relation: आपत्तिजनक स्थिति में देखने का दावा व्यभिचार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं; दोनों में जमीन-आसमान का अंतर, केस पढ़ें

मुख्य निष्कर्ष और टिप्पणी

  1. ‘आपत्तिजनक स्थिति’ बनाम ‘शारीरिक संबंध’: हाईकोर्ट ने दोनों परिस्थितियों के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित करते हुए कहा:“आपत्तिजनक स्थिति (Compromising Position) शब्द और शारीरिक संबंध बनाने (Having Sexual Intercourse) के बीच एक बड़ा अंतर (Gulf of Difference) है।”
  2. सबूतों का अभाव: कोर्ट ने नोट किया कि पति ने इस घटना के संबंध में न तो कोई पुलिस शिकायत दर्ज कराई और न ही अपने रिश्तेदारों से कोई शिकायत की। उसके माता-पिता या अन्य गवाहों ने भी इन आरोपों का समर्थन नहीं किया।
  3. संदेह से परे सबूत की आवश्यकता: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 1985 के ऐतिहासिक फैसले (हरगोविंद सोनी बनाम रामदुलारी) का हवाला देते हुए, पटना हाईकोर्ट ने कहा कि व्यभिचार के गंभीर आरोप को साबित करने के लिए ठोस और ठोस सबूतों की आवश्यकता होती है। केवल संभावनाओं या पति के बयान के आधार पर इसे सिद्ध नहीं माना जा सकता।
  4. क्रूरता का आधार निष्फल: चूंकि व्यभिचार का मुख्य आरोप साबित नहीं हो सका, इसलिए इसके आधार पर लगाए गए क्रूरता के अन्य आरोप भी अस्पष्ट और बेबुनियाद पाए गए।

पटना: पटना हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में व्यभिचार (Adultery) के आरोपों पर महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी जीवनसाथी को केवल “आपत्तिजनक स्थिति” (Compromising Position) में देखने का दावा करना हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत व्यभिचार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी और न्यायमूर्ति राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने मधुबनी के प्रधान न्यायाधीश (फैमिली कोर्ट) के फैसले को बरकरार रखते हुए पति द्वारा दायर तलाक की अपील खारिज कर दी। अदालत ने रेखांकित किया कि ‘आपत्तिजनक स्थिति’ और ‘शारीरिक संबंध बनाने’ (Having Sexual Intercourse) के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. ‘आपत्तिजनक स्थिति’ और ‘शारीरिक संबंध’ में अंतर व्यभिचार के आरोप की कानूनी कसौटी स्पष्ट करते हुए खंडपीठ ने कहा: ” ‘आपत्तिजनक स्थिति’ (Compromising Position) और ‘शारीरिक संबंध बनाने’ (Having Sexual Intercourse) के शब्दों के बीच एक बहुत बड़ा फासला (Gulf of Difference) है। केवल यह कह देना कि पत्नी को किसी अन्य व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखा गया था, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उनके बीच शारीरिक संबंध बने थे।”

2. सामान्य संभावना नहीं, ठोस और स्पष्ट साक्ष्य आवश्यक साक्ष्य के स्तर पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 1985 के नजीर फैसले (हरगोविंद सोनी बनाम रामदुलारी) का हवाला देते हुए कहा: “सिविल वैवाहिक मामलों में अन्य आधार भले ही संभावनाओं की प्रबलता (Preponderance of Probabilities) के आधार पर तय हो सकते हों, लेकिन व्यभिचार जैसे गंभीर आरोप को साबित करने के लिए स्पष्ट, पुख्ता और ठोस सबूत की आवश्यकता होती है। इसे केवल पति के कोरे बयान (Bald Statement) या महज संभावनाओं के आधार पर साबित नहीं माना जा सकता।”

यहा भी पढ़ें: Sexual Intercourse: डीएनए रिपोर्ट शारीरिक संबंध साबित करती है; यह नहीं कि संबंध सहमति से बने थे या जबरन…दुष्कर्म के आरोपी पर यह है फैसला

मामले की पृष्ठभूमि और पक्षकारों के आरोप

  • विवाह और विवाद: दोनों पक्षों का विवाह 2 जुलाई 2006 को हुआ था और 2010 में उनका एक बेटा हुआ।
  • पति के आरोप
    • पति ने आरोप लगाया कि बच्चे के जन्म के बाद पत्नी का व्यवहार बदल गया और उसके अपनी बड़ी बहन के पति (जीजा) के साथ अवैध संबंध थे।
    • उसने दावा किया कि उसने दोनों को एक बार आपत्तिजनक स्थिति में देखा था।
    • उसने यह भी आरोप लगाया कि 30 मार्च 2013 को पत्नी के मायके वाले आए और उसे सामान सहित जबरन ले गए तथा उसने उसका परित्याग (Desertion) कर दिया।
  • पत्नी का बचाव
    • पत्नी ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए जीजा के साथ अवैध संबंध के आरोप को मनगढ़ंत बताया और कहा कि चरित्र पर ऐसा झूठा लांछन लगाना खुद उसके प्रति क्रूरता है।
    • उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने उसे जहर देकर मारने की कोशिश की थी।
    • विवाह एवं आरोप: दोनों का विवाह जुलाई 2006 में हुआ था और उनका एक बेटा (जन्म 2010) है। पति का आरोप था कि पत्नी का उसकी बड़ी बहन के पति (जीजा) के साथ अवैध संबंध था और उसने दोनों को एक बार आपत्तिजनक स्थिति में देखा था।
    • परित्याग और क्रूरता का दावा: पति ने आरोप लगाया कि मार्च 2013 में पत्नी के मायके वाले आए और उसे अपने साथ ले गए, जिसके बाद उसने परित्याग कर दिया।
    • पत्नी का बचाव: पत्नी ने अवैध संबंध के आरोपों को पूरी तरह से मनगढ़ंत और झूठा बताया। उसने कहा कि इस तरह के बेबुनियाद आरोप लगाना ही अपने आप में मानसिक क्रूरता है। उसने पति पर जहर देकर मारने की कोशिश का भी आरोप लगाया।

हाईकोर्ट द्वारा अपील खारिज करने के मुख्य आधार

  1. समकालीन शिकायत या साक्ष्य का अभाव: अदालत ने पाया कि कथित घटना के बाद पति ने न तो कोई पुलिस शिकायत दर्ज कराई और न ही कोई सनहा (Sanha) दिया। यहां तक कि उसके माता-पिता या अन्य रिश्तेदारों ने भी अदालत में आकर इस आरोप की पुष्टि नहीं की।
  2. क्रूरता का आधार निराधार: चूंकि पति का क्रूरता का पूरा मामला कथित अवैध संबंधों पर ही टिका था और वह व्यभिचार साबित करने में पूरी तरह विफल रहा, इसलिए क्रूरता के शेष आरोप अस्पष्ट और सामान्य (Vague and Omnibus) पाए गए।

अंतिम आदेश

पटना उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट, मधुबनी के फैसले को पूरी तरह वैध ठहराते हुए पति की अपील खारिज कर दी और व्यभिचार व क्रूरता के आधार पर तलाक की डिक्री देने से इनकार कर दिया।

Husband-Wife Relation: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतपटना उच्च न्यायालय (Patna High Court)
खंडपीठन्यायमूर्ति विवेक चौधरी एवं न्यायमूर्ति राणा विक्रम सिंह
निचली अदालतप्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय, मधुबनी
कानूनी धाराएंहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i) [व्यभिचार] और 13(1)(ia) [क्रूरता]
हाईकोर्ट का निर्णयपारिवारिक न्यायालय के आदेश की पुष्टि; तलाक की याचिका खारिज।
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