हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
- सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसले (Ram Charan Case 2025) का सहारा: हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राम चरण बनाम सुखराम (2025) मामले के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि केवल इसलिए कि कोई विशिष्ट रिवाज नहीं लिखा है, आदिवासी महिलाओं को पैतृक संपत्ति से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
- पति से मिली संपत्ति स्व-अर्जित (Self-Acquired) संपत्ति: न्यायाधीश मौलिक जे. शेलत ने टिप्पणी की:“यद्यपि धारा 2(2) के अनुसार 1956 का अधिनियम अनुसूचित जनजाति समुदायों पर सीधे लागू नहीं होता है, लेकिन अदालत इस तथ्य से बेखबर नहीं रह सकती कि किसी जनजाति में महिला को संपत्ति से रोकने वाले रिवाज के अभाव में, अदालत हमेशा यह मान सकती है कि महिला को उत्तराधिकार का अधिकार प्राप्त है।” — गुजरात हाईकोर्टअदालत ने माना कि एक बार जब छानीबेन ने अपने पति से संपत्ति प्राप्त कर ली, तो वह उनकी स्व-अर्जित संपत्ति बन गई, और वे वसीयत के माध्यम से इसे किसी को भी देने के लिए स्वतंत्र थीं।
राज्य सरकार को सिफारिश (Recommendation to State Govt)
मामले का निस्तारण करते हुए, हाईकोर्ट ने इस फैसले की एक प्रति गुजरात राज्य सरकार को भेजने का निर्देश दिया। अदालत ने सिफारिश की कि:
- सरकार को केंद्र सरकार के साथ मिलकर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(2) के तहत एक अधिसूचना जारी करने के लिए कदम उठाने चाहिए।
- इससे हिंदू परंपराओं को मानने वाले अनुसूचित जनजातियों के बीच संपत्ति के हस्तांतरण के लिए एक स्पष्ट कानूनी ढांचा बन सकेगा, जिससे विशेष रूप से आदिवासी महिलाओं के समान संपत्ति अधिकारों की रक्षा हो सकेगी।
अहमदाबाद: गुजरात हाईकोर्ट ने अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों में महिलाओं के संपत्ति और उत्तराधिकार अधिकारों पर एक प्रगतिशील व ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत की एकल पीठ ने चौधरी (Chaudhari) अनुसूचित जनजाति की एक विधवा द्वारा अपने पति से प्राप्त कृषि भूमि को वसीयत (Will) के जरिए अपने भतीजे को सौंपे जाने के निर्णय को सही ठहराया और मृतका के भाई द्वारा ‘उत्तरजीविता के नियम’ (Rule of Survivorship) के तहत किए गए संपत्ति के दावे को खारिज करते हुए दूसरी अपील (Second Appeal) को निरस्त कर दिया। अदालत ने व्यवस्था दी है कि किसी विशेष जनजाति में महिला के उत्तराधिकार को प्रतिबंधित करने वाली किसी विपरीत प्रथा (Custom) के सिद्ध न होने की स्थिति में, न्यायालय न्याय, समानता और सद्भावना के सिद्धांतों के आधार पर यह मान सकता है कि आदिवासी महिला को संपत्ति में उत्तराधिकार का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. प्रथा के अभाव में महिला के उत्तराधिकार की विधिक मान्यता हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(2) के तहत अनुसूचित जनजातियों को दी गई छूट और महिलाओं के अधिकारों पर पीठ ने कहा: “यह सच है कि 1956 के अधिनियम की धारा 2(2) के अनुसार इसके प्रावधान अनुसूचित जनजाति समुदायों पर लागू नहीं होते हैं। इसके साथ ही, न्यायालय इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं रह सकता कि किसी विशेष जनजाति की ऐसी किसी प्रथा के अभाव में जो किसी महिला को अपने पति और/या पूर्वज से संपत्ति प्राप्त करने से रोकती हो, अदालत हमेशा यह मान सकती है कि ऐसी महिला को उत्तराधिकार का अधिकार है।”
2. पति से मिली संपत्ति ‘स्व-अर्जित’ (Self-Acquired) बनती है
- अदालत ने माना कि जब छानीबेन (विधवा) ने अपने मृत पति से संपत्ति कानूनी रूप से प्राप्त की, तो वह उसकी स्व-अर्जित संपत्ति बन गई।
- चूंकि वादी पक्ष ऐसी किसी विशिष्ट रूढ़िवादी प्रथा को साबित करने में विफल रहा जो महिला को अपनी संपत्ति की वसीयत करने से रोकती हो, इसलिए विधवा द्वारा 1991 में निष्पादित पंजीकृत वसीयत पूरी तरह वैध और प्रभावी है।
3. सुप्रीम कोर्ट के राम चरण बनाम सुखराम (2025) फैसले का अनुसरण
- हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने माना था कि केवल इसलिए कि कोई प्रथा स्पष्ट रूप से उत्तराधिकार की अनुमति नहीं देती, किसी आदिवासी महिला को पैतृक संपत्ति में हिस्से से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन होगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (सूरत/बारडोली का भूमि विवाद)
- पक्षकार व संबंध: छानीबेन (चौधरी जनजाति की महिला) ने अपने पति जीवलाभाई की मृत्यु के बाद उनकी कृषि भूमि उत्तराधिकार में प्राप्त की थी। वह 1991 में निःसंतान दिवंगत हुईं।
- पंजीकृत वसीयत (1991): मृत्यु से पूर्व 1 जुलाई 1991 को छानीबेन ने एक पंजीकृत वसीयत निष्पादित कर उक्त भूमि प्रतिवादी (अपने भतीजे) के नाम कर दी।
- भाई का मुकदमा (2002): छानीबेन के भाई (मूल वादी) ने 2002 में दीवानी मुकदमा दायर कर दावा किया कि वह भाई होने के नाते उत्तरजीविता (Survivorship) के नियम से संपत्ति का हकदार है और वसीयत अवैध है।
- निचली अदालतों के समवर्ती निष्कर्ष (Concurrent Findings):
- ट्रायल कोर्ट ने 2011 में पाया कि वादी ऐसी कोई प्रथा साबित नहीं कर सका जो उसे उत्तराधिकार का हक देती हो।
- तीसरे अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, सूरत (बारडोली) ने 24 जून 2026 को इस फैसले की पुष्टि की। इसके खिलाफ वादी के कानूनी वारिसों ने हाईकोर्ट में दूसरी अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश व राज्य सरकार को सिफारिश
- दूसरी अपील खारिज: हाईकोर्ट ने पाया कि सीपीसी की धारा 100 के तहत निचली दोनों अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों में कोई विकृति या कानून का सारभूत प्रश्न (Substantial Question of Law) नहीं है। गुजरात लैंड रेवेन्यू कोड की धारा 73AA (प्रतिबंधित सत्ता प्रकार) का तर्क निचली अदालतों में न उठाए जाने के कारण खारिज कर दिया गया।
- केंद्र सरकार से अधिसूचना जारी कराने की सिफारिश:
- फैसले के अंत में अदालत ने फैसले की प्रति गुजरात राज्य सरकार को भेजने का निर्देश दिया।
- हाईकोर्ट ने सिफारिश की कि राज्य सरकार हिंदू परंपराओं का पालन करने वाली अनुसूचित जनजातियों के बीच संपत्ति के हस्तांतरण के लिए एक स्पष्ट वैधानिक ढांचा प्रदान करने और आदिवासी महिलाओं के समान संपत्ति अधिकारों की रक्षा हेतु हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(2) के तहत केंद्र सरकार से उपयुक्त अधिसूचना (Central Notification) जारी कराने की प्रक्रिया शुरू करे।
विधिक विवरण
- केस शीर्षक: सिविल द्वितीय अपील (अनुसूचित जनजाति महिला की वसीयत व उत्तराधिकार की वैधता)
- प्रासंगिक कानून: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(2); संविधान का अनुच्छेद 14; भारतीय साक्ष्य अधिनियम/BSA (वसीयत का निष्पादन); सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 100
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ताओं (वादी के वारिसों) की ओर से: अधिवक्ता एन.वी. गांधी
- पीठ: न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत (गुजरात उच्च न्यायालय)
Rule of Survivorship: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | गुजरात उच्च न्यायालय |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत (Justice Maulik J. Shelat) |
| संबंधित कानून | हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(2) और सुप्रीम कोर्ट का Ram Charan Case (2025) |
| विवाद | आदिवासी विधवा द्वारा पति की संपत्ति को वसीयत के जरिए देने के अधिकार को भाई द्वारा चुनौती |
| अदालत का फैसला | वसीयत वैध है; पति से मिली संपत्ति विधवा की स्व-अर्जित (Self-Acquired) संपत्ति मानी जाएगी। |

