Tuesday, September 15, 2026
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Exceed Arresting Time: मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे से अधिक हिरासत गैरकानूनी, आरोपी जमानत का हकदार; उड़ीसा हाईकोर्ट की दो टूक

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

  • अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 58 का उल्लंघन: अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 58 यह मौलिक अधिकार प्रदान करती है कि किसी भी व्यक्ति को मैजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे (यात्रा समय छोड़कर) से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
  • रिमांड का दूषित होना: न्यायाधीश जी. सतपति ने फैसला सुनाते हुए कहा:“यह पूरी तरह स्पष्ट है कि आरोपी-याचिकाकर्ताओं को मैजिस्ट्रेट के किसी भी प्राधिकार के बिना 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया था। 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा के भीतर मैजिस्ट्रेट के सामने पेश न किए जाने के कारण उनकी गिरफ्तारी और उसके बाद का रिमांड पूरी तरह दूषित (Vitiated) हो जाता है, इसलिए वे जमानत के हकदार हैं।”उड़ीसा हाईकोर्ट

कटक: उड़ीसा हाईकोर्ट ने अभियुक्तों के मौलिक अधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के संवैधानिक अधिदेश पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

न्यायमूर्ति जी. सतपथी की एकल पीठ ने कटक के सदर थाने में दर्ज अपहरण और जबरन वसूली के मामले में आरोपियों की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें ₹20,000 के बेल बॉन्ड पर रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने व्यवस्था दी है कि यदि किसी अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के वैध प्राधिकार के बिना 24 घंटे से अधिक समय तक पुलिस हिरासत में रखा जाता है, तो ऐसी गिरफ्तारी और उसके बाद का न्यायिक रिमांड पूरी तरह दूषित (Vitiated) माना जाएगा। फलस्वरूप, अभियुक्त भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 483 के तहत विवेकाधीन जमानत (Discretionary Relief of Bail) पाने का पूर्ण हकदार बन जाता है।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. 24 घंटे से अधिक की अनधिकृत हिरासत गिरफ्तारी व रिमांड को दूषित करती है संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपायों का विश्लेषण करते हुए न्यायमूर्ति जी. सतपथी ने कहा: “यह स्पष्ट है कि अभियुक्त याचिकाकर्ताओं को मजिस्ट्रेट के किसी भी प्राधिकार के बिना 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया था। फलस्वरूप, वे जमानत की विवेकाधीन राहत के हकदार हैं, क्योंकि गिरफ्तारी स्थल से मजिस्ट्रेट की अदालत तक की यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर भी 24 घंटे की संवैधानिक समय सीमा के भीतर पेश न किए जाने के कारण अभियुक्तों की गिरफ्तारी और उनका परिणामी रिमांड पूरी तरह दूषित (Vitiated) माना जाता है।”

2. अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 58 का अनिवार्य अनुपालन

  • अदालत ने रेखांकित किया कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 58 (पूर्ववर्ती धारा 57 CrPC) यह अनिवार्य वैधानिक सुरक्षा प्रदान करती है कि किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा के समय को छोड़कर 24 घंटे से अधिक बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के अभिरक्षा में नहीं रखा जा सकता।
  • इस समय सीमा का उल्लंघन सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त दैहिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (कटक का कथित अपहरण व वसूली मामला)

  • आरोप: शिकायतकर्ता का आरोप था कि याचिकाकर्ताओं ने जमीन का सौदा कराने के नाम पर लिए गए ₹2 लाख के अग्रिम भुगतान की वापसी को लेकर उसका अपहरण किया, उसके साथ मारपीट की और उसकी सोने की चेन तथा फोनपे (PhonePe) के जरिए ₹2,000 की राशि जबरन छीन ली।
  • दर्ज धाराएं: पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 140(3), 140(2) (अपहरण), 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 303(2) (चोरी/लूट), 351(2) (आपराधिक धमकी) और 3(5) (साझा मंशा) के तहत मामला दर्ज किया था।
  • हिरासत का समय और दूरी का विश्लेषण
    • पुलिस रिकॉर्ड और कटक सदर थाना प्रभारी (IIC) के हलफनामे से संलग्न कमांड सर्टिफिकेट के अनुसार, आरोपियों को 28 मार्च 2026 को हिरासत में लिया गया था।
    • उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष 30 मार्च 2026 को शाम 4:40 बजे के बाद पेश किया गया।
    • अदालत ने गणना की कि गिरफ्तारी स्थल से कटक कोर्ट की दूरी लगभग 260 किलोमीटर थी, जिसमें अधिकतम 10 घंटे की यात्रा का समय लगता।
    • यात्रा के 10 घंटे घटाने के बाद भी जांच एजेंसी द्वारा मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने में लगाया गया कुल समय 40 घंटे से अधिक पाया गया।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

  1. संवैधानिक उल्लंघन पर जमानत मंजूर: अदालत ने पाया कि 24 घंटे के अनिवार्य नियम का खुला उल्लंघन हुआ है, जिससे रिमांड आदेश कानूनन निरस्त होने योग्य बन जाता है।
  2. जमानत की शर्तें: उच्च न्यायालय ने प्रत्येक याचिकाकर्ता को ₹20,000 के निजी मुचलके (Bail Bond) और एक सॉल्वेंट प्रतिभू (Solvent Surety) प्रस्तुत करने की शर्त पर नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: आपराधिक जमानत याचिका (BNSS की धारा 483 के तहत)
  • प्रासंगिक कानून: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(2); भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 58 एवं धारा 483; भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराएं
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता आर.पी. कर
    • राज्य (अभियोजन) की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) टी.के. आचार्य
  • पीठ: न्यायमूर्ति जी. सतपथी (उड़ीसा उच्च न्यायालय)

Exceed Arresting Time: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतउड़ीसा उच्च न्यायालय (Orissa High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति जी. सतपति (Justice G. Satapathy)
संवैधानिक/विधिक धाराएंसंविधान का अनुच्छेद 22(2) और BNSS की धारा 58 (तथा धारा 483-जमानत)
मुख्य मुद्दामैजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना 24 घंटे से अधिक अवैध हिरासत
अदालत का फैसलासंवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन होने पर याचिकाकर्ताओं को ₹20,000 के मुचलके पर जमानत मंजूर।
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