मामले के मुख्य बिंदु और हाईकोर्ट के कड़े निर्देश
- ₹27.91 करोड़ जमा कराने का आदेश: हाईकोर्ट ने राज्य के तकनीकी शिक्षा निदेशालय (DTE), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) कल्याण विभाग, और आदिवासी विकास विभाग को निर्देश दिया है कि वे कोटे के तहत नामांकित छात्रों के प्रतिपूर्ति (Reimbursement) के रूप में बकाया ₹27.91 करोड़ दो सप्ताह के भीतर उच्च न्यायालय में जमा करें, ताकि यह राशि कर्मचारियों के बकाया वेतन के भुगतान में बांटी जा सके।
- संस्थान अध्यक्ष से 10 दिनों में रिपोर्ट तलब: STES के अध्यक्ष मारुति नवले ने एक हलफनामा दायर कर बताया कि 31 अगस्त 2026 तक 22 याचिकाओं से संबंधित 21.04 करोड़ रुपये वेतन के रूप में जमा कराए गए हैं, लेकिन “वित्तीय तंगी” के कारण बाकी राशि जमा नहीं हो सकी। इस पर हाईकोर्ट ने अध्यक्ष को 10 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है कि संस्थान के लगभग 6,000 कर्मचारियों में से कितनों को वेतन मिला है, उनकी स्थिति क्या है और उन पर कितना वेतन बकाया है।
- कर्मचारियों का 8 साल लंबा संघर्ष: STES के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के निलंबित सहायक प्रोफेसर सचिन शिंदे (जो पिछले 8 वर्षों से बकाया वेतन के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं) ने बताया कि सरकार द्वारा दी जाने वाली प्रतिपूर्ति राशि कर्मचारियों के कुल बकाया वेतन का एक बहुत छोटा हिस्सा है और असली देनदारी संस्थान प्रबंधन पर है।
मुंबई: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने शिक्षण संस्थानों द्वारा शिक्षकों एवं गैर-शिक्षण कर्मचारियों के वेतन भुगतान में वर्षों की देरी, प्रबंधन की वित्तीय उपेक्षा, कर्मचारियों के आजीविका के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) और राज्य के शिक्षा विभाग की प्रशासनिक अकर्मण्यता पर कड़ा संज्ञान लेते हुए पुणे स्थित प्रतिष्ठित ‘सिंहगढ़ टेक्निकल एजुकेशन सोसाइटी’ (STES) और महाराष्ट्र सरकार को सख्त फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि स्कूलों और कॉलेजों का संचालन करते हुए कर्मचारियों का हक दबाए रखना प्रत्यक्ष रूप से “असंवेदनशीलता या घोर अवैधता” (Apathy or Illegality) को दर्शाता है, जिसे किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता।
18 सितंबर 2026 के अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने लगभग 100 याचिकाओं—जो STES के लगभग 1,200 कर्मचारियों द्वारा पिछले कई वर्षों के बकाया वेतन, भत्ते और एरियर को लेकर दायर की गई हैं—पर एक साथ सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से तीखा सवाल किया कि संबंधित प्राधिकारियों ने इस संस्थान की कार्यप्रणाली पर आंखें क्यों मूंद रखी थीं और कानून के तहत समय रहते कोई दंडात्मक या सुधारात्मक कदम क्यों नहीं उठाया।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं तल्ख टिप्पणियां
1. ‘संस्थान का आचरण पूरी तरह उदासीनता और अवैधता से भरा’: हाईकोर्ट कर्मचारियों के वर्षों लंबे शोषण और बकाए पर कड़ा रुख अपनाते हुए अदालत ने स्पष्ट किया:
- किसी भी शैक्षणिक संस्थान को अपनी संस्थाएं चलाने का अधिकार केवल तभी तक है जब तक वह वहां सेवा दे रहे शिक्षकों और कर्मचारियों के बुनियादी श्रम अधिकारों और वेतन का सम्मान करता है।
- आर्थिक तंगी का रोना रोकर कर्मचारियों को उनके वैध वेतन से वंचित रखना किसी भी कानून के तहत स्वीकार्य नहीं हो सकता।
2. महाराष्ट्र सरकार और शिक्षा विभाग से जवाब तलब
- अदालत ने राज्य सरकार और उसके उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग को नोटिस जारी कर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है कि उन्होंने STES की वर्षों से चल रही अनियमितताओं और वेतन न देने की शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की।
- राज्य की नियामक संस्थाओं का यह कर्तव्य था कि वे छात्रों के भविष्य और शिक्षकों की आजीविका दोनों की रक्षा के लिए कानून के अनुसार सख्त निगरानी रखतीं।
3. सरकारी प्रतिपूर्ति (Reimbursement) से वेतन वितरण का खाका
- अदालत ने राज्य के तकनीकी शिक्षा निदेशालय (DTE), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) कल्याण विभाग और आदिवासी विकास विभाग को निर्देश दिया कि वे आरक्षित कोटे के तहत प्रवेशित छात्रों के लिए सरकार द्वारा लंबित ₹27.91 करोड़ की प्रतिपूर्ति राशि दो सप्ताह के भीतर सीधे उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री में जमा कराएं।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि इस राशि का उपयोग सीधे तौर पर पीड़ित कर्मचारियों के लंबित बकाए का भुगतान करने के लिए किया जाएगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (सिंहगढ़ सोसाइटी और 6,000 कर्मचारियों का संकट)
- विवाद का दायरा: पुणे स्थित सिंहगढ़ टेक्निकल एजुकेशन सोसाइटी (STES) महाराष्ट्र के सबसे बड़े शैक्षणिक समूहों में से एक है, जिसके तहत कई इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, फार्मेसी कॉलेज और स्कूल संचालित होते हैं। संस्थान में लगभग 6,000 कर्मचारी कार्यरत हैं।
- 8 वर्षों से कानूनी लड़ाई: कर्मचारियों की ओर से याचिकाकर्ताओं में शामिल इंजीनियरिंग कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर सचिन शिंदे—जिन्हें बकाए वेतन के खिलाफ आवाज उठाने के चलते प्रबंधन द्वारा निलंबित कर दिया गया था—ने अदालत को बताया कि सरकार से मिलने वाली ₹27.91 करोड़ की राशि कुल बकाया वेतन का एक बहुत छोटा हिस्सा मात्र है; वास्तविक देनदारी इससे कहीं अधिक है।
- संस्थान के अध्यक्ष का हलफनामा:
- STES के अध्यक्ष मारुति नवले ने अदालत में हलफनामा प्रस्तुत कर दावा किया कि 31 अगस्त 2026 तक 22 याचिकाओं के तहत कुल ₹21.04 करोड़ का वेतन जमा कराया जा चुका है।
- हालांकि, उन्होंने अन्य कर्मचारियों के बकाए का भुगतान न कर पाने के लिए “गंभीर वित्तीय कठिनाइयों” (Financial Constraints) का हवाला दिया।
उच्च न्यायालय के आगामी निर्देश एवं समयबद्ध आदेश
- संपूर्ण 6,000 कर्मचारियों का ऑडिट डेटा: अदालत ने STES प्रबंधन और उसके अध्यक्ष को निर्देश दिया कि वे 10 दिनों के भीतर एक विस्तृत हलफनामा दाखिल कर स्पष्ट करें कि:
- संस्थान के कुल लगभग 6,000 कर्मचारियों में से कितने लोगों को नियमित वेतन दिया जा रहा है?
- बाकी कर्मचारियों की वास्तविक स्थिति (Plight) क्या है?
- किस कर्मचारी का कितना वेतन और भत्ता बकाया व देय (Due and Payable) है?
- अगली सुनवाई: इस संपूर्ण मामले और सरकारी विभागों द्वारा ₹27.91 करोड़ जमा कराने की प्रगति की समीक्षा के लिए अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सिंहगढ़ टेक्निकल एजुकेशन सोसाइटी कर्मचारीगण (याचिकाकर्ता) बनाम सिंहगढ़ टेक्निकल एजुकेशन सोसाइटी (STES), महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य [रिट याचिकाओं का बैच – बॉम्बे उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: महाराष्ट्र सार्वजनिक ट्रस्ट अधिनियम, 1950; महाराष्ट्र गैर-कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम / महाराष्ट्र सार्वजनिक विश्वविद्यालय अधिनियम, 2016 (शिक्षकों के वेतन व सेवा शर्तें); भुगतान मजदूरी अधिनियम, 1936 (Payment of Wages Act); भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन और आजीविका का अधिकार) एवं अनुच्छेद 226
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- दीप्तिमान शिक्षक संघ बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘वेतन कर्मचारी का विधिक और संवैधानिक अधिकार है, यह कोई अनुग्रह या दान नहीं है; वित्तीय संकट का हवाला देकर किसी भी कर्मचारी का वैध वेतन अनिश्चितकाल के लिए नहीं रोका जा सकता।’
- सेंट थॉमस हायर सेकेंडरी स्कूल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि कोई निजी या सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थान अपने कर्मचारियों को न्यूनतम निर्धारित वेतन देने में विफल रहता है, तो राज्य सरकार को उसकी मान्यता, प्रबंधन या वित्तीय खातों की जांच करने की पूरी विधिक शक्ति प्राप्त है।’
- आदेश तिथि: 18 सितंबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 5 अक्टूबर 2026
Apathy or Illegality:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| संबंधित संस्थान | सिंहगढ़ टेक्निकल एजुकेशन सोसाइटी (STES), पुणे |
| याचिकाकर्ताओं की संख्या | लगभग 1,200 कर्मचारियों द्वारा दायर 100 से अधिक याचिकाएं |
| संस्थान के कुल कर्मचारी | लगभग 6,000 शिक्षक व कर्मचारी |
| अदालत का मुख्य आदेश | राज्य सरकार ₹27.91 करोड़ की राशि 2 हफ्ते में कोर्ट में जमा करे; संस्थान अध्यक्ष 10 दिनों में पूरा ब्योरा दें |
| अगली सुनवाई | 5 अक्टूबर 2026 |

