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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- शिक्षकों का पक्ष (Non-Teaching Duties Restriction):सहारनपुर के प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में कार्यरत 5 सहायक शिक्षकों ने हाईकोर्ट का रुख कर BLO ड्यूटी से राहत मांगी थी। उन्होंने तर्क दिया कि उनकी सेवा शर्तों में गैर-शैक्षणिक कार्यों में तैनाती का कोई प्रावधान नहीं है। उनका दावा था कि मतदाता सूची पुनरीक्षण जैसी गैर-शिक्षण गतिविधियों में उन्हें लगाने से संविधान के अनुच्छेद 21-A (शिक्षा का मौलिक अधिकार) और RTE एक्ट 2009 के नियमों का उल्लंघन होता है क्योंकि यह शिक्षकों को उनके मूल शैक्षणिक दायित्व से भटकाता है।
- सार्वभौमिक संप्रभु कर्तव्य और ECI का अधिकार क्षेत्र:हाईकोर्ट ने तर्कों को खारिज करते हुए रेखांकित किया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मतदाता सूची तैयार करना और पुनरीक्षण करना भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के अधीक्षण में संचालित एक संप्रभु वैधानिक प्रक्रिया (Sovereign Statutory Exercise) है।
- धारा 13CC और प्रतिनियुक्ति का सिद्धांत:अदालत ने कहा कि 1950 अधिनियम की धारा 13CC के तहत, मतदाता सूची की तैयारी और पुनरीक्षण के लिए तैनात राज्य सरकार के कर्मचारियों को उस अवधि के लिए निर्वाचन आयोग में कानूनी रूप से प्रतिनियुक्त (Statutorily Deemed on Deputation) माना जाता है।
मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष
1. RTE अधिनियम 2009 की धारा 27 का स्पष्ट अपवाद:
यह फैसला स्थापित करता है कि RTE कानून गैर-शैक्षणिक कार्यों पर सामान्य रोक लगाता है, लेकिन धारा 27 के तहत तीन विशिष्ट अपवाद दिए गए हैं: जनगणना, आपदा राहत और चुनाव ड्यूटी। BLO और SIR कर्तव्य सीधे तौर पर चुनाव ड्यूटी के इस वैधानिक अपवाद में शामिल हैं।
2. जनहित और संवैधानिक व्यवस्था में संतुलन:
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक शिक्षक यह साबित नहीं करते कि उनके शिक्षण कार्य में कोई अपूरणीय क्षति हुई है, तब तक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के संवैधानिक दायित्व (अनुच्छेद 324) को प्राथमिकता दी जाएगी।
प्रयागराज: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21A (6 से 14 वर्ष के बच्चों हेतु निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार), अनुच्छेद 324 (भारत निर्वाचन आयोग के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण में निर्वाचनों का संचालन), निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act, 2009) की धारा 27 (गैर-शैक्षणिक कार्यों में शिक्षकों की तैनाती पर सामान्य निषेध बनाम वैधानिक अपवाद), लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA, 1950) की धारा 13CC (निर्वाचक नामावली के पुनरीक्षण में लगे राज्य कर्मियों की निर्वाचन आयोग में सांविधिक प्रतिनियुक्ति / Deemed Deputation), तथा सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय भारत निर्वाचन आयोग बनाम सेंट मैरी स्कूल व अन्य [(2008) 2 SCC 390] के विधिक सिद्धांतों के तहत इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी लोकतंत्र और प्राथमिक शिक्षा के बीच एक महत्वपूर्ण विधिक सामंजस्य स्थापित किया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर (Justice Vinod Diwakar) की एकल पीठ ने सहारनपुर जिले के जूनियर एवं सीनियर बेसिक विद्यालयों में कार्यरत पाँच सहायक अध्यापकों द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज (Dismissed) कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि उन्हें बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) और मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR – Special Intensive Revision) जैसी गैर-शैक्षणिक चुनावी ड्यूटियों से पूरी तरह मुक्त (Detached) किया जाए ताकि वे केवल कक्षा शिक्षण पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
उच्च न्यायालय ने इस विधिक दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि शिक्षकों को चुनावी कर्तव्यों में लगाने से छात्रों के संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन होता है। पीठ ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि आरटीई अधिनियम, 2009 की धारा 27 में प्राथमिक शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाने पर सामान्य रोक तो है, किंतु उसी धारा में चुनाव, आपदा राहत और जनगणना को स्पष्ट वैधानिक अपवाद (Express Statutory Exceptions) के रूप में मान्यता दी गई है। अदालत ने माना कि मतदाता सूची तैयार करना निर्वाचन आयोग की संप्रभु संवैधानिक जिम्मेदारी है और बीएलओ का कार्य सीधे तौर पर चुनावी प्रक्रिया का अभिन्न अंग है, अतः इसे असंवैधानिक या गैर-कानूनी नहीं ठहराया जा सकता।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘RTE अधिनियम की धारा 27 स्पष्ट रूप से चुनावी ड्यूटी की छूट देती है; अनुच्छेद 21A का तर्क भ्रामक’:
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने आरटीई कानून की धारा 27 और अनुच्छेद 21A के अंतर्संबंध का विश्लेषण करते हुए अपने आदेश में व्यवस्था दी: “निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 27 स्पष्ट रूप से शिक्षकों को चुनाव संबंधी कर्तव्यों (Election-related duties) के लिए तैनात किए जाने की अनुमति प्रदान करती है, और बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के कर्तव्य इसी सांविधिक अपवाद के अंतर्गत आते हैं। अतः संविधान के अनुच्छेद 21-A और आरटीई नियमावली पर आधारित याचिकाकर्ताओं का यह तर्क पूरी तरह से भ्रामक और विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण (Misconceived) है।”
2. ‘RPA धारा 13CC के तहत शिक्षक चुनाव आयोग में सांविधिक प्रतिनियुक्ति पर माने जाते हैं’:
- अदालत ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के विधिक अधिदेश को रेखांकित करते हुए कहा:“संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत भारत निर्वाचन आयोग के अधीक्षण में मतदाता सूचियों (Electoral Rolls) की तैयारी और उनका पुनरीक्षण करना एक संप्रभु वैधानिक कार्य (Sovereign statutory exercise) है।लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13CC के अंतर्गत, निर्वाचक नामावली की तैयारी और पुनरीक्षण के लिए तैनात राज्य सरकार के सभी कर्मचारी उस समयावधि के लिए स्वतः ही कानूनन निर्वाचन आयोग में प्रतिनियुक्ति (Statutorily deemed to be on deputation to the Election Commission) पर माने जाते हैं।”
3. ‘कक्षा शिक्षण में वास्तविक बाधा का कोई ठोस साक्ष्य नहीं’:
- अदालत ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ताओं ने पत्रावली पर ऐसा कोई तथ्यात्मक या सांख्यिकीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया है जिससे यह सिद्ध हो सके कि उन्हें बीएलओ का प्रभार सौंपे जाने के कारण उनके विद्यालयों में कक्षा शिक्षण प्रत्यक्ष रूप से बाधित हुआ है या छात्रों की पढ़ाई को अपूरणीय क्षति पहुंची है।
- अदालत ने माना कि असाधारण रिट अधिकारिता (अनुच्छेद 226) का प्रयोग ऐसे नीतिगत और अनिवार्य संवैधानिक दायित्वों में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं किया जा सकता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर (Justice Vinod Diwakar) (एकल पीठ) |
| निर्णय की तिथि | नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | अजरा परवीन व 4 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य [Writ – A No. … / 2026] |
| याचिकाकर्तागण | अजरा परवीन (Azra Parveen) एवं 4 अन्य — सहारनपुर जिले के जूनियर और सीनियर बेसिक विद्यालयों में कार्यरत सहायक अध्यापक (Assistant Teachers)। |
| याचिकाकर्ताओं के अधिवक्तागण | अधिवक्ता नरेंद्र कुमार (Advocate Narendra Kumar) एवं शोभित सिंह (Advocate Shobhit Singh)। |
| प्रतिवादी पक्ष | 1. उत्तर प्रदेश राज्य (बेसिक शिक्षा विभाग) 2. जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA), सहारनपुर 3. जिला निर्वाचन अधिकारी / जिलाधिकारी, सहारनपुर व अन्य। |
| राज्य सरकार के मुख्य विधि अधिकारी | मुख्य स्थायी अधिवक्ता (Chief Standing Counsel) जय प्रकाश सिंह (Jay Prakash Singh)। |
| विवादित प्रशासनिक आदेश | जिला प्रशासन एवं निर्वाचन प्राधिकारियों द्वारा शिक्षकों को बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) नियुक्त करने और मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के कार्य में लगाने का आदेश। |
| याचिकाकर्ताओं के मुख्य तर्क | 1. सेवा नियमावली की सीमा: उनकी सेवा शर्तों और नियुक्ति नियमों में गैर-शैक्षणिक कार्य करने का कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है। 2. अनुच्छेद 21A व RTE का उल्लंघन: शिक्षकों को स्कूल से हटाकर मतदाता सूची बनाने में झोंकने से बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का उनका मूल संवैधानिक दायित्व कुंठित होता है। 3. विभागीय परिपत्र (3 सितंबर 2012): 2012 के विभागीय आदेश का हवाला दिया गया, जिसमें शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से अलग रखने की बात कही गई थी। |
| राज्य सरकार का विधिक रुख | मतदाता सूची तैयार करना और चुनाव कराना एक संवैधानिक दायित्व है; आरटीई अधिनियम की धारा 27 स्पष्ट रूप से चुनाव संबंधी कार्यों को अपवाद बनाती है; आरपीए की धारा 13CC के तहत कर्मचारी चुनाव आयोग की प्रतिनियुक्ति पर होते हैं; अतः याचिका निराधार है। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | रिट याचिका पूर्णतः खारिज (Dismissed); शिक्षकों को बीएलओ ड्यूटी से छूट देने से इनकार; आदेश दिया गया कि बीएलओ का कार्य आरटीई अधिनियम की धारा 27 के तहत वैध अपवाद है। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘RTE धारा 27, RPA धारा 13CC और सेंट मैरी स्कूल नज़ीर’
- RTE अधिनियम, 2009 की धारा 27 का स्पष्ट विधायी अधिदेश:
- धारा 27 का शीर्षक है: “गैर-शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए शिक्षकों को अभिनियोजित किए जाने का प्रतिषेध”।
- संसद ने इस धारा में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया है:“दस-वार्षिक जनगणना, आपदा राहत कर्तव्यों या यथास्थिति, स्थानीय प्राधिकारी या राज्य विधान-मंडलों या संसद के निर्वाचनों से संबंधित कर्तव्यों से भिन्न किसी गैर-शैक्षणिक प्रयोजन के लिए किसी शिक्षक को अभिनियोजित नहीं किया जाएगा।”
- विधायी भाषा से यह शीशे की तरह साफ है कि संसद ने स्वयं तीन क्षेत्रों—जनगणना, आपदा और चुनाव—को प्राथमिक शिक्षा के सामान्य संरक्षण से बाहर रखा है। चूँकि बीएलओ का कार्य सीधे तौर पर विधानसभा और संसद के चुनावों हेतु शुद्ध मतदाता सूची तैयार करने से जुड़ा है, इसलिए यह सीधे तौर पर धारा 27 के अपवाद में समाहित है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13CC की संवैधानिक शक्ति:
- धारा 13CC यह घोषित करती है कि मतदाता सूची तैयार करने और संशोधित करने वाले अधिकारी/कर्मचारी उस अवधि के दौरान भारत निर्वाचन आयोग के नियंत्रण और अनुशासन के अधीन मानित प्रतिनियुक्ति (Deemed Deputation) पर होते हैं।
- संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने हेतु मशीनरी की आवश्यकता होती है। राज्य सरकार के पास शिक्षकों के अलावा इतना बड़ा जमीनी कैडर उपलब्ध नहीं होता जो घर-घर जाकर सत्यापन कर सके।
- ‘भारत निर्वाचन आयोग बनाम सेंट मैरी स्कूल’ [(2008) 2 SCC 390] का संतुलन:
- सर्वोच्च न्यायालय ने सेंट मैरी स्कूल मामले में यह निर्देश दिया था कि जहां तक संभव हो, शिक्षकों को चुनाव कार्य गैर-शैक्षणिक समय (जैसे छुट्टियों या स्कूल के बाद) में सौंपा जाए, ताकि बच्चों की दैनिक कक्षाएं बंद न हों।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पाया कि सहारनपुर के शिक्षकों ने ऐसा कोई साक्ष्य नहीं दिया कि स्कूल बंद कराए गए हैं या बीएलओ ड्यूटी के कारण कक्षाएं पूरी तरह ठप हो गई हैं। सामान्य रूप से बीएलओ का कार्य सर्वेक्षण, प्रपत्र संकलन और पुनरीक्षण के विशेष अभियानों तक सीमित होता है, जो कक्षा शिक्षण के साथ-साथ अथवा निर्धारित समय के बाद निष्पादित किया जा सकता है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226)
- केस संदर्भ: अजरा परवीन व 4 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य [Writ – A No. … / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर (Justice Vinod Diwakar) (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: रिट याचिका खारिज; प्राथमिक/बेसिक विद्यालयों के सहायक अध्यापकों को बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) और विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) चुनावी कर्तव्यों से छूट देने की मांग नामंजूर।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं (शिक्षकों) की ओर से:
- अधिवक्ता: नरेंद्र कुमार (Advocate Narendra Kumar) एवं शोभित सिंह (Advocate Shobhit Singh)।
- प्रतिवादी उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से:
- मुख्य स्थायी अधिवक्ता (Chief Standing Counsel – CSC) जय प्रकाश सिंह (Jay Prakash Singh)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 21A — 6 से 14 वर्ष के बच्चों हेतु निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का मूल अधिकार
- अनुच्छेद 324 — निर्वाचनों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण भारत निर्वाचन आयोग में निहित होना
- अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की विवेकाधीन रिट अधिकारिता
- निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act, 2009):
- धारा 27 — गैर-शैक्षणिक कार्यों में शिक्षकों की तैनाती पर रोक तथा चुनाव संबंधी कार्यों का वैधानिक अपवाद
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA, 1950):
- धारा 13CC — निर्वाचक नामावली की तैयारी/पुनरीक्षण में लगे मुख्य निर्वाचक अधिकारियों, जिला निर्वाचन अधिकारियों और कर्मचारियों की निर्वाचन आयोग में सांविधिक प्रतिनियुक्ति
- भारत का संविधान:
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- शिक्षा का अधिकार, संप्रभु चुनावी कर्तव्य और शिक्षकों की वैधानिक प्रतिनियुक्ति का विधिक मानक: ‘संविधान के अनुच्छेद 21A के अंतर्गत बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और सतत शिक्षा प्राप्त करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है, किंतु यह अधिकार संप्रभु लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से निरपेक्ष नहीं है; आरटीई अधिनियम, 2009 की धारा 27 विधायिका के स्पष्ट आशय को प्रकट करती है जिसके तहत चुनाव संबंधी कर्तव्यों को गैर-शैक्षणिक कार्यों के सामान्य प्रतिबंध से स्पष्ट रूप से बाहर (Statutory Exception) रखा गया है; बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) द्वारा निर्वाचक नामावली का विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) करना लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13CC के अंतर्गत भारत निर्वाचन आयोग के अधीक्षण में किया जाने वाला एक अनिवार्य संप्रभु दायित्व है; जब तक यह ठोस साक्ष्यों से सिद्ध न हो कि ऐसी तैनाती से स्कूल की शैक्षणिक कार्यप्रणाली पूरी तरह नष्ट हो गई है, तब तक शिक्षक अपनी सेवा शर्तों का हवाला देकर चुनावी कर्तव्यों के निर्वहन से पूर्ण विमुक्ति (Exemption/Detachment) की मांग नहीं कर सकते; तथा लोकतांत्रिक गणराज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदाता सूची का निर्माण राज्य मशीनरी और उसके कर्मचारियों का प्राथमिक संवैधानिक कर्तव्य है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद उत्तर प्रदेश में बेसिक और माध्यमिक शिक्षा परिषदों द्वारा संचालित विद्यालयों के शिक्षकों के लिए बीएलओ ड्यूटी से बचने का रास्ता बंद हो गया है; सहारनपुर जिला प्रशासन द्वारा जारी किए गए बीएलओ नियुक्ति आदेश पूरी तरह प्रभावी रहेंगे और संबंधित अध्यापकों को मतदाता सूची के पुनरीक्षण का कार्य अनिवार्य रूप से करना होगा। यह आदेश राज्य भर के उन शिक्षक संघों और कर्मियों के लिए एक सख्त विधिक नजीर है जो चुनावी ड्यूटियों को चुनौती देकर कक्षाओं तक सीमित रहने की मांग कर रहे थे।
UP Teachers: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर (Justice Vinod Diwakar) |
| केस / पक्षकार | अज़रा परवीन व 4 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य (Azra Parveen & Ors. v. State of UP & Ors.) |
| याचिकाकर्ता | सहारनपुर जिले के बेसिक/जूनियर स्कूलों के 5 सहायक शिक्षक |
| प्रतिनिधित्व | याचिकाकर्ता पक्ष: अधिवक्ता नरेंद्र कुमार एवं शोभित सिंह | राज्य पक्ष: मुख्य स्थायी वकील जय प्रकाश सिंह |
| संबंधित कानून/प्रावधान | RTE Act 2009 की धारा 27, अनुच्छेद 21A, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 13CC एवं संविधान का अनुच्छेद 324 |
| अदालत का अंतिम आदेश | रिट याचिका खारिज (Petition Dismissed): BLO/SIR कर्तव्यों से शिक्षकों को छूट देने से इनकार; चुनाव ड्यूटी को RTE कानून के तहत वैध माना। |

