हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
- अपराध के तत्वों की अनुपस्थिति:अदालत ने पोस्ट की सामग्री का विश्लेषण करने के बाद कहा:“कानूनी प्रावधानों के तत्वों और फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किए गए संदेश को ध्यान से पढ़ने पर, इस अदालत को ऐसा कोई आधार नहीं मिलता कि बड़वनहल्ली पुलिस स्टेशन द्वारा की गई स्वतः संज्ञान (suo moto) कार्रवाई में आगे किसी जांच की आवश्यकता है।”
- कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग:अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ने देना, जहां अपराध के बुनियादी तत्व ही न बनते हों, कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process of Law) होगा।
बेंगलुरु: सोशल मीडिया पोस्टों पर पुलिस द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर दर्ज की जाने वाली प्राथमिकियों, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने) और धारा 505(2) (विभिन्न वर्गों के बीच शत्रुता या घृणा को बढ़ावा देने) के आवश्यक विधिक तत्वों, तथा भाषण व अभिव्यक्ति में इस्तेमाल किए गए शब्दों के संदर्भ की न्यायिक जांच पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है।
फेसबुक पेज ‘हिंदू सम्राट धर्मसेने’ (Hindu Samrat Dharmasene) पर पोस्ट का मामला
न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता अतुल कुमार सबरवाल द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए तुमकुरु जिले के बडवनहल्ली पुलिस स्टेशन (Badavanahalli Police Station) द्वारा दर्ज आपराधिक प्राथमिकी और संपूर्ण कार्यवाहियों को निरस्त (Quash) कर दिया। पुलिस के सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल ने फेसबुक पेज ‘हिंदू सम्राट धर्मसेने’ (Hindu Samrat Dharmasene) पर एक पोस्ट देखकर यह दावा किया था कि इसमें ‘जिहादी’ शब्द का इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को आहत करने और वैमनस्य फैलाने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय ने पाया कि पोस्ट की सामग्री आईपीसी की धारा 295A या 505(2) के दायरे में नहीं आती। अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि जब किसी पोस्ट से अपराध के बुनियादी वैधानिक तत्व ही सिद्ध न होते हों, तो उस पर आपराधिक मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘अपराध के आवश्यक तत्वों के अभाव में जांच जारी रखने की आवश्यकता नहीं’ न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद ने कानूनी धाराओं और फेसबुक पोस्ट की विषय-वस्तु की तुलना करते हुए कहा: “उक्त अपराधों के आवश्यक तत्वों और याचिकाकर्ता के ‘हिंदू सम्राट धर्मसेने’ नामक फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किए गए संदेश के तुलनात्मक विश्लेषण के बाद, यह न्यायालय यह पाता है कि बडवनहल्ली पुलिस स्टेशन द्वारा शुरू की गई स्वतः संज्ञान (Suo Moto) कार्रवाई में उन अपराधों को आकर्षित करने वाले आवश्यक तत्वों का पूर्ण अभाव (Want of necessary ingredients) है; अतः इसमें आगे किसी जांच की आवश्यकता नहीं है।”
2. कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process of Law):
- अदालत ने रेखांकित किया कि जब किसी प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों से पहली नजर में कोई संज्ञेय अपराध बनता ही न दिखे, तो नागरिक को आपराधिक मुकदमे के फेर में फंसाए रखना न्यायिक सिद्धांतों के प्रतिकूल है।
- पीठ ने 21 सितंबर 2026 के अपने आदेश में दर्ज किया:“ऐसी कार्यवाहियों को आगे चलने की अनुमति देना, जिनमें अपराध के बुनियादी तत्व ही पूरे नहीं होते हों, सीधे तौर पर कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of process of the law) होगा।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: फेसबुक पोस्ट और पुलिस की स्वतः संज्ञान कार्रवाई
- अप्रैल 2026 की घटना और पुलिस मॉनिटरिंग सेल:
- अप्रैल 2026 में कर्नाटक पुलिस के सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल के एक पुलिसकर्मी ने सोशल मीडिया निगरानी के दौरान ‘हिंदू सम्राट धर्मसेने’ नामक फेसबुक अकाउंट पर एक पोस्ट देखी।
- विवादित फेसबुक पोस्ट की सामग्री:
- पोस्ट में लिखा गया था:“यदि जिहादियों की संख्या बढ़ती है, तो कोई कानून, कोई नियम, जाति, पैसा या सत्ता आपकी रक्षा नहीं करेगी। हिंदुओ सावधान रहो, आपकी सुरक्षा आपके अपने हाथों में है। चाहे आप एक बड़े पुलिस अधिकारी हों, या आईएएस या आईपीएस—आपको भी एक दिन सेवानिवृत्त होना है। जिहादी की उस तलवार से सावधान रहें जो आपकी गर्दन काट देगी।”
- बडवनहल्ली पुलिस का आरोप और एफआईआर:
- पुलिस का तर्क था कि पोस्ट में ‘जिहादी’ (Jihadi) शब्द का इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करने और विभिन्न समुदायों के बीच द्वेष पैदा करने के उद्देश्य से किया गया था।
- पुलिस ने याचिकाकर्ता अतुल कुमार सबरवाल के खिलाफ आईपीसी की धारा 295A और 505(2) के तहत स्वतः संज्ञान लेते हुए प्राथमिकी दर्ज कर ली।
- हाईकोर्ट में चुनौती:
- आरोपी ने अधिवक्ता मधुसूदन आदिगा बी. के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि पोस्ट में किसी धर्म विशेष का नाम नहीं लिया गया है और यह केवल चरमपंथ/कट्टरपंथ (जिहाद) के संदर्भ में आत्मरक्षा की सामान्य चेतावनी थी, न कि किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं का अपमान।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- आईपीसी की धारा 295A (धार्मिक भावनाओं को आहत करने का विमर्शित आशय):
- धारा 295A के तहत किसी कृत्य को अपराध बनाने के लिए ‘विमर्शित और विद्वेषपूर्ण आशय’ (Deliberate and Malicious Intention) सिद्ध होना अनिवार्य है।
- कानून हर उस टिप्पणी या चेतावनी को अपराध नहीं मानता जो किसी को अप्रिय लग सकती है; इसका मुख्य उद्देश्य उन कृत्यों को दंडित करना है जो लोक व्यवस्था को सीधे खतरे में डालते हैं।
- आईपीसी की धारा 505(2) (वर्गों के बीच शत्रुता या घृणा पैदा करने वाले कथन):
- इसके तहत ऐसा कोई बयान, अफवाह या रिपोर्ट प्रसारित करना अपराध है जिसका सीधा उद्देश्य विभिन्न धर्मों, जातियों या समुदायों के बीच द्वेष, घृणा या वैमनस्य (Ill-will or Enmity) भड़काना हो।
- यदि किसी पोस्ट में चरमपंथी या हिंसक प्रवृत्तियों (‘जिहादी हिंसा’) के विरुद्ध सतर्क रहने की बात कही गई हो, तो उसे स्वतः पूरे समुदाय के खिलाफ शत्रुता फैलाने वाला बयान नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसमें किसी मान्यता प्राप्त धार्मिक समुदाय को सामूहिक रूप से निशाना न बनाया गया हो।
- सर्वोच्च न्यायालय की सुसंगत न्यायिक नजीरें:
- भजन लाल बनाम हरियाणा राज्य (1992, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि एफआईआर में वर्णित तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य मानने पर भी अपराध के तत्व नहीं दर्शाते, तो हाईकोर्ट को धारा 482 के तहत एफआईआर रद्द कर देनी चाहिए।’
- महेन्द्र सिंह धोनी केस (2017) एवं रामजी लाल मोदी (1957) — ‘धारा 295A केवल गंभीर और सुनियोजित दुर्भावनापूर्ण कृत्यों पर ही लागू होती है।’
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अतुल कुमार सबरवाल बनाम राज्य [आपराधिक याचिका – कर्नाटक उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 21 सितंबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता मधुसूदन आदिगा बी.
- राज्य (कर्नाटक) की ओर से: अतिरिक्त राज्य लोक अभियोजक (Addl. SPP) सूर्य मुकुंदराज
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का दुर्भावनापूर्ण आशय)
- भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 505(2) (विभिन्न वर्गों के बीच शत्रुता, घृणा या दुर्भावना पैदा करने वाले कथन)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 482 [उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां]
- अंतिम परिणाम: आपराधिक याचिका स्वीकृत; बडवनहल्ली पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी और आपराधिक कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए पूर्णतः निरस्त।
Jihadi Sword: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति वी. श्रीशानंद) |
| याचिकाकर्ता | अतुल कुमार सबरवाल (फेसबुक पेज: ‘Hindu Samrat Dharmasene’) |
| शिकायतकर्ता | बड़वनहल्ली पुलिस स्टेशन (सोशल मीडिया मॉनिटरिंग सेल की स्वतः संज्ञान कार्रवाई) |
| लगाई गई धाराएं | IPC की धारा 295A और धारा 505(2) |
| हाईकोर्ट का फैसला | FIR रद्द की गई; अपराध के कानूनी तत्व सिद्ध न होने पर जांच जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। |

