सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और प्रशासनिक चुनौतियां
- फंड आवंटन पर प्रशासनिक सीमाएँ:CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि विधिक सेवा प्राधिकरणों को मिलने वाले बजट और राज्य सरकारों द्वारा दिए जाने वाले अनुदान के इस्तेमाल पर कई प्रशासनिक शर्तें होती हैं:“हम इन प्रतिबंधों पर विचार किए बिना सीधे भुगतान का आदेश नहीं दे सकते। कभी-कभी एक मद में सरप्लस फंड होता है और दूसरी मद में फंड की कमी होती है। ये ऐसी चुनौतियाँ हैं जिन्हें प्रशासनिक स्तर पर ही सुलझाया जाना चाहिए।”
- NALSA गवर्निंग काउंसिल को भेजा मामला:हाईकोर्ट जाने का विकल्प दिए जाने पर जब वादी पक्ष ने बताया कि उच्च न्यायालयों ने इसे वापस राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को भेज दिया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को सभी सदस्यों का एक संयुक्त प्रतिनिधित्व (Representation) माना और इसे NALSA गवर्निंग काउंसिल के समक्ष निर्णय के लिए भेजने का आदेश दिया।
नई दिल्ली: विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत स्थापित स्थायी लोक अदालतों (Permanent Lok Adalats) के सदस्यों के पारिश्रमिक ढांचे (Remuneration Model), कार्यभार व आर्थिक क्षेत्राधिकार (Pecuniary Jurisdiction) में हुए भारी विस्तार, फंड आवंटन से जुड़ी वित्तीय सीमाओं, तथा न्यायिक बनाम प्रशासनिक क्षेत्राधिकार के नाजुक संतुलन पर सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक रुख अपनाया है।
14 स्थायी लोक अदालत सदस्यों द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-सदस्यीय विशेष पीठ ने 14 स्थायी लोक अदालत सदस्यों द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि विधिक सेवा प्राधिकरणों को मिलने वाले बजटीय आवंटन और राज्य सरकारों के अनुदानों की उपयोगिता पर कई सांविधिक और प्रशासनिक पाबंदियां होती हैं, जिन्हें दरकिनार कर सीधे भुगतान बढ़ाने का न्यायिक आदेश पारित करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। शीर्ष अदालत ने स्थायी लोक अदालत के सदस्यों द्वारा वर्तमान में मिल रहे लगभग ₹2,500 प्रति बैठक के मानदेय को संशोधित कर सम्मानजनक मासिक वेतनमान देने की मांग वाली याचिका पर सीधे न्यायिक निर्देश जारी करने से इनकार करते हुए, इस मामले को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की गवर्निंग काउंसिल के समक्ष विचारार्थ भेजने का निर्देश दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘फंड आवंटन में बदलाव की व्यावहारिक चुनौतियां—सीधे निर्देश जारी करना संभव नहीं’ मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को सहानुभूतिपूर्वक सुनते हुए भी वित्तीय सीमाओं को रेखांकित किया: “भले ही मैं आपके तर्कों को स्वीकार करना चाहूं, लेकिन मैं ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं कर सकता क्योंकि इसमें बजटीय फंड के आवंटन में बदलाव शामिल है। यह एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती है। कई बार एक मद (Head) के तहत अतिरिक्त (Surplus) फंड होता है और दूसरी मद के तहत अपर्याप्त फंड। ये ऐसी चुनौतियां हैं जिन्हें प्रशासनिक स्तर पर ही सुलझाया जाना आवश्यक है, न्यायिक आदेशों से नहीं।”
2. राज्यों से प्राप्त अनुदान और उच्च न्यायालयों की भूमिका:
- सीजेआई ने सुझाव दिया कि बेहतर यह होता कि संबंधित उच्च न्यायालयों का दरवाजा खटखटाया जाता, जो अपने-अपने राज्यों से प्राप्त वास्तविक अनुदानों और वित्तीय स्थिति के आधार पर इसका मूल्यांकन कर सकते थे।
- उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें भी शर्तों के साथ धन उपलब्ध कराती हैं, अतः इन सीमाओं की अनदेखी कर कोई वित्तीय भार नहीं लादा जा सकता।
3. नालसा गवर्निंग काउंसिल के समक्ष प्रतिवेदन के रूप में भेजने का निर्देश: पीठ ने आदेश पारित करते हुए निर्देश दिया:
- वर्तमान याचिका को याचिकाकर्ताओं और उनके जैसे सभी स्थायी लोक अदालत सदस्यों की ओर से एक संयुक्त प्रतिवेदन (Common Representation) माना जाए।
- याचिका की प्रति राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) के सदस्य सचिव को भेजी जाए, जो इसे उचित निर्णय और नीतिगत सिफारिश के लिए नालसा गवर्निंग काउंसिल (NALSA Governing Council) के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी की प्रमुख दलीलें
याचिकाकर्ताओं (स्थायी लोक अदालत के 14 सदस्यों) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने पीठ के समक्ष सदस्यों की दयनीय वित्तीय स्थिति और उनके विस्तारित कार्यक्षेत्र के आंकड़े प्रस्तुत किए:
- कार्यभार और क्षेत्राधिकार में भारी वृद्धि:
- उन्होंने दलील दी कि जहां पहले स्थायी लोक अदालतें केवल बुनियादी जनोपयोगी सेवाओं (बिजली, पानी, परिवहन आदि) तक सीमित थीं, वहीं अब वे बैंकिंग, एनबीएफसी (NBFCs), हाउसिंग/रियल एस्टेट और शिक्षा से जुड़े बड़े विवादों का भी निपटारा कर रही हैं।
- ₹1 करोड़ का आर्थिक क्षेत्राधिकार और जिला उपभोक्ता आयोग से तुलना:
- स्थायी लोक अदालतों का आर्थिक क्षेत्राधिकार बढ़ाकर ₹1 करोड़ कर दिया गया है (जबकि जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का दायरा ₹50 लाख तक ही है)।
- पिछले एक वर्ष में ही स्थायी लोक अदालतों ने लगभग ₹660 करोड़ मूल्य के विवादों का सफलतापूर्वक निपटारा किया है।
- ₹2,500 प्रति बैठक की अपर्याप्तता:
- सदस्यों को वर्तमान में लगभग ₹2,500 प्रति सिटिंग का मामूली मानदेय दिया जाता है, जो उनकी न्यायिक जिम्मेदारियों, समय और अर्हता के अनुपात में अत्यधिक कम और असम्मानजनक है।
- अध्यक्ष बनाम सदस्यों के वेतन में भेदभाव (नियम 3 की चुनौती):
- याचिका में ‘स्थायी लोक अदालत (अध्यक्ष और अन्य व्यक्तियों की नियुक्ति की अन्य शर्तें) नियमावली, 2003’ के नियम 3 को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी गई, जिसमें अध्यक्ष (जो प्रायः सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश होते हैं) और अन्य सदस्यों के लिए अत्यधिक असमान वेतनमान तय किया गया है।
- हाईकोर्ट से कोई राहत न मिलने का तर्क:
- सुश्री नंदी ने बताया कि यह मुद्दा पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष भी उठाया गया था, परंतु वहां से मामले को संबंधित राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) को वापस भेज दिया गया, जहां नाममात्र की वृद्धि की गई थी। अतः केवल सर्वोच्च न्यायालय ही इसका अखिल भारतीय समाधान निकाल सकता है।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (Legal Services Authorities Act, 1987):
- अध्याय VI-A (स्थायी लोक अदालतें): वर्ष 2002 के संशोधन के माध्यम से धारा 22A से 22E जोड़कर जनोपयोगी सेवाओं (Public Utility Services) के लिए स्थायी लोक अदालतों की स्थापना की गई थी।
- धारा 22C एवं 22E: स्थायी लोक अदालतों को सुलह-समझौते के साथ-साथ गुण-दोष के आधार पर अंतिम फैसला (Award) पारित करने की शक्ति प्राप्त है, जो सिविल कोर्ट की डिक्री के समान अंतिम और बाध्यकारी होता है।
- समान कार्य के लिए समान वेतन और गरिमापूर्ण जीवन (अनुच्छेद 14 व 21):
- अर्द्ध-न्यायिक निकायों में कार्य करने वाले सदस्यों को उनके कार्य की गरिमा के अनुरूप उचित और नियमित मासिक वेतन मिलना न्याय प्रशासन की गुणवत्ता के लिए आवश्यक है, ताकि योग्य और सत्यनिष्ठ व्यक्ति इन पदों पर आकर्षित हो सकें।
- वित्तीय नीतिगत मामलों में न्यायिक संयम (Judicial Restraint):
- सर्वोच्च न्यायालय की सुस्थापित नजीर है कि वेतनमान तय करना और बजटीय आवंटन का पुनर्गठन करना विधायिका और कार्यपालिका का प्रशासनिक कार्यक्षेत्र है। अदालतें सीधे वित्तीय निर्देश जारी करने से बचती हैं और नीतिगत विचार के लिए सक्षम प्राधिकारियों (जैसे NALSA) को निर्देशित करती हैं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: 14 स्थायी लोक अदालत सदस्य बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (3-जज विशेष पीठ)
- आदेश की तिथि: 8 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक नियमावली:
- विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 — धाराएं 22A, 22B, 22C, 22E (स्थायी लोक अदालत का गठन व शक्तियां)
- स्थायी लोक अदालत (अध्यक्ष और अन्य व्यक्तियों की नियुक्ति के अन्य निबंधन और शर्तें) नियम, 2003 — नियम 3 (वेतन एवं मानदेय शर्तें)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14, 21 एवं अनुच्छेद 32
- अंतिम परिणाम: याचिका को संयुक्त प्रतिवेदन के रूप में नालसा (NALSA) के सदस्य सचिव को भेजने का आदेश; नालसा की गवर्निंग काउंसिल स्थायी लोक अदालत के सदस्यों के मानदेय संशोधन और कार्यभार के आधार पर मासिक वेतनमान लागू करने के प्रस्ताव पर प्रशासनिक विचार करेगी।
Lok Adalat: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (CJI सूर्यकांत, जस्टिस जयमाल्या बागची, जस्टिस वी. मोहना) |
| याचिकाकर्ता | स्थायी लोक अदालत के 14 सदस्य (वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| मुख्य मांग | ₹2,500 प्रति बैठक (Per-sitting) मानदेय मॉडल में संशोधन और मासिक वेतन संरचना लागू करना |
| चुनौतीपूर्ण नियम | स्थायी लोक अदालत नियम, 2003 का नियम 3 (अध्यक्ष और सदस्यों के बीच वेतन में असमानता) |
| सुप्रीम कोर्ट का आदेश | याचिका को NALSA के सदस्य सचिव को भेजा जाए, जो इसे NALSA शासी परिषद (Governing Council) के समक्ष रखेंगे। |

