सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- नियमों में सीधे टकराव पर चिंता:सीजेआई सूर्यकांत और पीठ ने कहा:“एक ऐसे अधिकारी को भी राज्य के DGP पद पर नियुक्ति के लिए पात्र बना दिया गया है, जिसकी सेवानिवृत्ति में शेष सेवा 6 महीने से कम है। ऐसा प्रावधान प्रथम दृष्टया इस अदालत द्वारा प्रकाश सिंह मामले में तय किए गए कानून के सीधे विपरीत प्रतीत होता है।”
- अदालत का संवैधानिक दायित्व:न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया:“हमारी चिंता यह नहीं है कि केंद्र या राज्य में कौन सत्ता में है। हमारा प्राथमिक कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि इस अदालत द्वारा घोषित कानून को कमजोर न किया जाए।”
- सभी राज्यों के DGP कानूनों की होगी समीक्षा:झारखंड सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि केंद्र सरकार केवल एक राज्य को निशाना बना रही है, जबकि बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे अन्य राज्यों में भी ऐसे ही नियम लागू हैं।इस पर सुप्रीम कोर्ट ने न्याय मित्र (Amicus Curiae) राजू रामचंद्रन को निर्देश दिया कि वे केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि भारत के सभी राज्यों द्वारा बनाए गए DGP नियुक्ति नियमों और उनके तहत हुई नियुक्तियों की जांच कर रिपोर्ट सौंपें।
नई दिल्ली: देश में पुलिस सुधारों पर ऐतिहासिक प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) के दिशा-निर्देशों, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की संलिप्तता को दरकिनार कर राज्यों द्वारा मनमाने नियमों के जरिए पुलिस महानिदेशक (DGP) नियुक्त करने की परिपाटी, तथा सेवानिवृत्ति से ठीक पहले अधिकारियों को 2 साल का तय कार्यकाल (Fixed Tenure) देने के लिए न्यूनतम छह महीने की शेष सेवा (Residual Service of 6 Months) की अनिवार्य शर्त के उल्लंघन पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
झारखंड सरकार को अपने विवादित नियमों पर पुनर्विचार करने व बचाव करने के लिए समय दिया
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-सदस्यीय विशेष पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा दायर उस आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह गंभीर अवलोकन किया, जिसमें ‘झारखंड पुलिस महानिदेशक एवं महानिरीक्षक (पुलिस बल प्रमुख) चयन एवं नियुक्ति विनियम, 2025’ और उसके तहत की गई नियुक्तियों को चुनौती दी गई है। अदालत ने झारखंड सरकार को अपने विवादित नियमों पर पुनर्विचार करने अथवा अगली तारीख पर उनका बचाव करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। इसके साथ ही अदालत ने वर्तमान डीजीपी तदाशा मिश्रा (Tadasha Mishra) को भी नोटिस जारी कर उनका जवाब तलब किया है। शीर्ष अदालत ने झारखंड सरकार द्वारा बनाए गए DGP नियुक्ति नियमों को प्रथम दृष्टया प्रकाश सिंह फैसले के सिद्धांतों के विपरीत पाया है।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘6 महीने से कम शेष सेवा वाले को DGP बनाना प्रकाश सिंह फैसले के सीधे विपरीत’ पीठ ने झारखंड के नियमों और डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति के समय का संज्ञान लेते हुए कहा: “एक अधिकारी को राज्य के पुलिस महानिदेशक के रूप में नियुक्ति के लिए तब भी पात्र बना दिया गया है, जब अधिवर्षिता (Superannuation) से पूर्व उसकी अवशिष्ट सेवा छह महीने से भी कम बची हो। प्रथम दृष्टया, ऐसा प्रावधान इस न्यायालय द्वारा प्रकाश सिंह मामले में निर्धारित विधि के सीधे टकराव (Direct conflict with the law) में प्रतीत होता है।”
2. ‘केंद्र या राज्य में किसकी सत्ता है, इससे कोई सरोकार नहीं—कानून का क्षरण बर्दाश्त नहीं’:
- न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने न्यायिक निष्पक्षता को रेखांकित करते हुए दो-टूक कहा:“हमारी चिंता यह नहीं है कि केंद्र में किसकी सरकार है या राज्य में किसकी सत्ता है। हमारा अनिवार्य संवैधानिक कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि इस न्यायालय द्वारा घोषित विधि को किसी भी तरह कमजोर या क्षीण (Law declared by this Court is not diluted) न किया जाए।”
3. डीजीपी तदाशा मिश्रा के अधिकारों पर सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणी: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान डीजीपी को सुनवाई का अवसर देना प्राकृतिक न्याय के तहत अनिवार्य है:
- सीजेआई ने कहा:“उनके पक्ष में पहले ही एक विधिक अधिकार सृजित हो चुका है। यदि हम नियम को सीधे रद्द करते हैं, तो इसका प्रभाव उनकी नियुक्ति पर पड़ सकता है। अन्यथा, हम नियम को भविष्यलक्षी प्रभाव (Prospectively) से निरस्त कर सकते हैं और कह सकते हैं कि अधिकारी अपने पद पर बनी रहें। इसलिए उनका पक्ष सुना जाना आवश्यक है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: सेवानिवृत्ति से ठीक 1 दिन पहले नियुक्ति का विवाद
- 2025 की नियमावली और अचानक संशोधन:
- झारखंड सरकार ने वर्ष 2025 में पुलिस बल प्रमुख (DGP/HoPF) के चयन हेतु नए नियम बनाए।
- केंद्र सरकार का आरोप है कि नियमों में पहले 6 महीने की न्यूनतम सेवा अनिवार्य थी, परंतु सरकार ने नियमों में संशोधन कर उस शर्त को शिथिल कर दिया ताकि निकट भविष्य में सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारियों को पद पर बैठाया जा सके।
- डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति (30 दिसंबर 2025):
- 1994 बैच की वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी तदाशा मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को 2 वर्ष के कार्यकाल के लिए झारखंड का नियमित डीजीपी नियुक्त किया गया।
- उल्लेखनीय है कि उनकी सामान्य सेवानिवृत्ति की तिथि 31 दिसंबर 2025 (अगले ही दिन) निर्धारित थी। इससे पहले वह पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) लेने के बाद कार्यवाहक डीजीपी के रूप में काम कर रही थीं।
- केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) की आपत्ति:
- केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि अनुराग गुप्ता और तदाशा मिश्रा दोनों की नियुक्तियों में सुप्रीम कोर्ट के 2019 के आदेश का खुला उल्लंघन हुआ है।
- दोनों अधिकारियों के पास नियुक्ति के समय 6 महीने की न्यूनतम शेष सेवा नहीं बची थी।
- केंद्र ने दलील दी कि झारखंड सरकार ने प्रकाश सिंह फैसले से केवल ‘दो साल के तय कार्यकाल’ का लाभ उठाया, परंतु उसी फैसले में अनिवार्य की गई यूपीएससी पैनल प्रक्रिया और छह महीने की न्यूनतम सेवा शर्त को मनमाने ढंग से छोड़ दिया।
अदालत में तीखी विधिक बहस: सिब्बल बनाम सॉलिसिटर जनरल
सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार और केंद्र सरकार के वकीलों के बीच जोरदार तकरार देखने को मिली:
- कपिल सिब्बल का पलटवार—’केवल झारखंड को ही निशाना क्यों? बिहार और बंगाल के कानून भी देखें’:
- झारखंड सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने केंद्र के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा:“सॉलिसिटर जनरल केवल झारखंड को चुनौती देने के लिए इतने उत्साही क्यों हैं? बिहार और अन्य राज्यों में ऐसे कानून बने हैं जो इससे भी बदतर हैं और वे इस अदालत के समक्ष लंबित हैं। पश्चिम बंगाल में अप्रैल में रिटायर होने वाले अधिकारी को मार्च में डीजीपी बनाया गया और केंद्र सरकार ने स्वयं उन्हें 6 महीने का सेवा विस्तार दिया। क्या केंद्र वहां भी याचिका दायर करेगा?”
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का जवाब:
- एसजी मेहता ने कहा कि केंद्र कोई ‘पिक एंड चूज’ (चयनात्मक) नीति नहीं अपना रहा है:“यदि अन्य राज्य भी हैं, चाहे वहां किसी भी दल की सरकार हो, और उनके कानून इतने ही खराब या उससे बदतर हैं, तो उन्हें भी जाना होगा। मैं चयनात्मक नहीं हो सकता।”
- पीठ की चुटकी:
- जब सिब्बल ने कहा कि वे अन्य राज्यों के ऐसे नियम केंद्र के संज्ञान में लाएंगे, तो न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने चुटकी लेते हुए कहा: “यही हमारी विरोधात्मक न्याय प्रणाली (Adversarial System) की सुंदरता है।”
अखिल भारतीय स्तर पर होगी जांच: एमिकस क्यूरी को बड़ा दायित्व
विवाद को केवल एक राज्य तक सीमित न रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पूरे देश के परिप्रेक्ष्य में इसका संज्ञान लिया है:
- सभी राज्यों के DGP नियमों की जांच: अदालत ने मामले में न्याय मित्र (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन को निर्देश दिया कि वे न केवल झारखंड के विनियमों की जांच करें, बल्कि भारत के सभी राज्यों द्वारा बनाए गए DGP चयन कानूनों, नियमों और उनके तहत की गई नियुक्तियों का समग्र परीक्षण करें।
- एमिकस क्यूरी का पूर्व रुख: एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन ने पहले ही अदालत को अवगत कराया था कि सेवानिवृत्ति से एक दिन पूर्व तदाशा मिश्रा को डीजीपी बनाना प्रकाश सिंह निर्णय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
- झारखंड सरकार को एक सप्ताह की मोहलत: राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह तय करे कि वह इस नियम पर पुनर्विचार कर इसे वापस लेगी या अदालत में इसका बचाव करेगी।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है प्रकाश सिंह फैसला?
- प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006, सुप्रीम कोर्ट) के ऐतिहासिक दिशानिर्देश:
- UPSC पैनल की अनिवार्यता: राज्य सरकार को सेवानिवृत्ति से पूर्व सबसे वरिष्ठतम अधिकारियों के नाम यूपीएससी को भेजने होंगे, जो योग्यता और सत्यनिष्ठा के आधार पर 3 नामों का पैनल तैयार करेगी।
- न्यूनतम 2 वर्ष का कार्यकाल: राजनीतिक हस्तक्षेप रोकने के लिए डीजीपी को कम से कम 2 वर्ष का तय कार्यकाल मिलना चाहिए।
- कार्यवाहक DGP (Acting DGP) पर रोक: राज्यों द्वारा नियमित डीजीपी के बजाय मनपसंद अधिकारियों को कार्यवाहक डीजीपी बनाने की प्रथा को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया।
- मार्च 2019 का स्पष्टीकरण आदेश (6 महीने की न्यूनतम सेवा):
- कई राज्यों द्वारा सेवानिवृत्ति के अंतिम दिन अपने पसंदीदा अधिकारी को डीजीपी बनाकर 2 साल का सेवा विस्तार देने की विकृति सामने आने के बाद, तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की पीठ ने स्पष्ट व्यवस्था दी थी:“केवल उन्हीं अधिकारियों के नामों पर विचार किया जाएगा जिनके पास डीजीपी के पद पर विचार किए जाने की तिथि पर कम से कम छह महीने की अवशिष्ट सेवा (Residual Service) शेष हो।”
- सुप्रीम कोर्ट की पूर्व अनुमति आवश्यक:
- शीर्ष अदालत ने यह भी तय किया था कि यदि कोई राज्य इन नियमों में कोई बदलाव या संशोधन करना चाहता है, तो उसे पहले सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना होगा। झारखंड ने ऐसा कोई पूर्व अनुमोदन प्राप्त नहीं किया था।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ [विविध आवेदन — झारखंड डीजीपी नियुक्ति नियमावली, 2025 की वैधता]
- पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (3-जज विशेष पीठ)
- आदेश की तिथि: 8 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- केंद्र सरकार की ओर से: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता
- झारखंड सरकार की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल
- न्यायालय मित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन
- प्रासंगिक कानून एवं विनियम:
- झारखंड पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक (पुलिस बल प्रमुख) चयन एवं नियुक्ति नियमावली, 2025
- अखिल भारतीय सेवाएं (DCRB) नियम, 1958 (सेवानिवृत्ति एवं सेवा विस्तार)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 141, 142 एवं अनुच्छेद 144
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006, 2018 एवं 2019 आदेश, सुप्रीम कोर्ट) — ‘डीजीपी की नियुक्ति में यूपीएससी की अनिवार्य भूमिका; सेवानिवृत्ति से पूर्व न्यूनतम 6 महीने की सेवा का सिद्धांत अनिवार्य; कार्यवाहक डीजीपी की व्यवस्था अवैध।’
- वर्तमान स्थिति: झारखंड सरकार को नियमावली पर पुनर्विचार या बचाव के लिए 1 सप्ताह का समय; डीजीपी तड़ाशा मिश्रा को नोटिस जारी; एमिकस क्यूरी को पूरे देश के सभी राज्यों की डीजीपी नियुक्ति व्यवस्थाओं की रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश।
Jharkhand DGP: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (CJI सूर्यकांत, जस्टिस जयमाल्या बागची, जस्टिस वी. मोहना) |
| याचिकाकर्ता | केंद्र सरकार (सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| प्रतिवादी | झारखंड सरकार (वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल द्वारा प्रतिनिधित्व) और राज्य DGP तडाशा मिश्रा |
| विवादित नियम | Jharkhand DGP Regulations, 2025 (जिसमें 6 महीने से कम शेष सेवा वाले अफसरों को भी DGP बनाने का प्रावधान है) |
| सुप्रीम कोर्ट का निर्देश | झारखंड सरकार को 1 सप्ताह के भीतर नियम में संशोधन करने या बचाव करने का निर्देश; देश के सभी राज्यों के DGP नियमों की जांच का आदेश। |

