Friday, October 9, 2026
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Partner Suicide: ब्रेकअप पर हर व्यक्ति अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है; लिव-इन पार्टनर से शादी से इनकार करना और आत्महत्या का केस पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी विचार

  1. ब्रेकअप और मानवीय प्रतिक्रिया:रिश्तों में दरार और उसके परिणामों पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा:“विभिन्न परिस्थितियों में लोग अलग-अलग प्रतिक्रिया देते हैं। यदि कोई ब्रेकअप आत्महत्या के साथ समाप्त होता है, तो उसे हमेशा आत्महत्या का उकसावा नहीं कहा जा सकता। शादी से इनकार करने का उद्देश्य महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करना नहीं था, और न ही आरोपी को यह जानकारी हो सकती थी कि ऐसे इनकार पर वह आत्महत्या कर लेगी।”
  2. उकसावे (Instigation) और मंशा (Intent) का अभाव:अदालत ने कहा कि IPC की धारा 306 के तहत अपराध का गठन होने के लिए आरोपी द्वारा प्रत्यक्ष उकसावा या जानबूझकर ऐसा माहौल बनाना आवश्यक है जिससे व्यक्ति के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प न बचे। इस मामले में ऐसी कोई मंशा या उकसावा साबित करने वाली सामग्री मौजूद नहीं थी।

नई दिल्ली: लिव-इन रिलेशनशिप टूटने, वैवाहिक वादे या प्रस्ताव से मुकरने के बाद साथी द्वारा आत्महत्या कर लेने, तथा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 / भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 108 के तहत ‘आत्महत्या के दुष्प्रेरण’ (Abetment of Suicide) के गठन हेतु विमर्शित मानसिक स्थिति (Mens Rea) और प्रत्यक्ष उकसावे (Instigation) के अनिवार्य विधिक तत्वों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

आपराधिक कानून के तहत आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अपराध नहीं माना जा सकता

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने तेलंगाना उच्च न्यायालय और निचली अदालत के आदेशों को खारिज करते हुए छह आरोपियों—जिनमें मृतका का लिव-इन पार्टनर, उसके माता-पिता, बहन और अन्य रिश्तेदार शामिल थे—के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को पूर्णतः निरस्त (Quash) कर दिया। पीठ ने रेखांकित किया कि यदि ब्रेकअप का दुखद अंत आत्महत्या के रूप में होता है, तो केवल इस आधार पर संबंध तोड़ने वाले पक्षकार पर आपराधिक दायित्व नहीं थोपा जा सकता, जब तक कि उसने मृतका को जान देने के लिए सीधे तौर पर उकसाया न हो। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि केवल विवाह से इनकार करना—बिना इस प्रत्यक्ष आशय या पूर्व ज्ञान के कि इस कदम से साथी आत्महत्या कर लेगा—आपराधिक कानून के तहत आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अपराध नहीं माना जा सकता।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘हर व्यक्ति परिस्थितियों पर अलग प्रतिक्रिया देता है—ब्रेकअप अपने आप में दुष्प्रेरण नहीं’ न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने मानवीय संबंधों और आपराधिक जवाबदेही का विश्लेषण करते हुए कहा:“लोग विभिन्न परिस्थितियों पर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। यदि किसी रिश्ते के टूटने (Breakup) का अंत आत्महत्या में परिणत होता है, तो इसे हमेशा आत्महत्या के लिए उकसाना (Abetment to suicide) नहीं कहा जा सकता। विवाह से इनकार करना इस इरादे के साथ नहीं किया गया था कि महिला आत्महत्या कर ले, और न ही आरोपियों पर यह ज्ञान (Knowledge) मढ़ा जा सकता है कि उनके इनकार करने पर वह ऐसा आत्मघाती कदम उठा ही लेगी।”

2. प्रत्यक्ष उकसावे (Instigation) का पूर्ण अभाव: अदालत ने शिकायतकर्ता के आरोपों का बारीकी से परीक्षण करते हुए दर्ज किया:

  • भले ही अभियोजन और शिकायतकर्ता के सभी आरोपों को अक्षरशः सत्य मान लिया जाए, फिर भी रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य या तथ्य नहीं है जो यह स्थापित करे कि आरोपियों ने महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करने हेतु कोई प्रत्यक्ष सक्रिय कृत्य किया।
  • पीठ ने निष्कर्ष निकाला:“हम आरोपियों/अपीलकर्ताओं द्वारा मृतका को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करने वाला कोई भी उकसावा (Instigation) पाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। यह न तो उनका इरादा था और न ही इसे कानूनन दुष्प्रेरण कहा जा सकता है।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: लिव-इन रिलेशन से कानूनी लड़ाई तक

  • लिव-इन रिलेशनशिप और शादी का प्रस्ताव (2022):
    • मृतका और पहला आरोपी बचपन के दोस्त थे। दोनों सहमति से प्रेम संबंध में थे और आरोपी के आवास पर लगभग तीन महीने तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे।
    • अभियोजन पक्ष के अनुसार, पहले आरोपी ने विवाह का प्रस्ताव रखा था, जिसे शुरुआत में मृतका और उसके परिवार ने स्वीकार कर लिया था।
  • पारिवारिक असहमति और विवाद:
    • इसके बाद कथित तौर पर आरोपी के एक दोस्त ने मृतका के चरित्र पर सवाल उठाए और आरोपी की बहन के होने वाले पति ने भी इस शादी का विरोध किया।
    • आरोप था कि आरोपी के माता-पिता, बहन और अन्य रिश्तेदारों ने उस पर यह संबंध खत्म करने का दबाव बनाया, जिसके चलते उसने शादी करने से मना कर दिया।
  • अंतिम बातचीत और दुखद घटना:
    • मृतका ने अपनी बड़ी बहन को फोन पर बताया कि उसके पार्टनर ने शादी से इनकार कर दिया है और यदि अगले दिन शादी नहीं हुई तो वह अपनी जान दे देगी।
    • अभियोजन के अनुसार, आरोपी के घर पर दोनों पक्षों में कहासुनी और बहस हुई, जिसके तुरंत बाद मृतका ने कमरे में खुद को बंद कर लिया और फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
  • प्राथमिकी और निचली अदालतों का रुख:
    • मृतका के परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 सहपठित धारा 34 के तहत प्राथमिकी दर्ज की।
    • आरोपियों ने मामले से आरोपमुक्ति (Discharge) की मांग की, जिसे निचली अदालत ने दिसंबर 2024 में खारिज कर दिया।
    • तेलंगाना उच्च न्यायालय ने भी फरवरी 2026 में उनकी पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए कहा था कि विवादित तथ्यों का फैसला पूर्ण सुनवाई (Trial) के बाद ही हो सकता है।
    • इसके बाद आरोपियों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की थी।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 सहपठित धारा 107 (BNS की धारा 108 सहपठित धारा 45):
    • धारा 107 के तहत दुष्प्रेरण (Abetment) के तीन घटक:
      1. उकसाना (Instigation): किसी व्यक्ति को किसी कार्य को करने के लिए सक्रिय रूप से भड़काना या प्रेरित करना।
      2. षड्यंत्र (Conspiracy): उस कार्य को कराने के लिए योजना बनाना।
      3. जानबूझकर सहायता करना (Intentional Aiding): उस कार्य को संभव बनाने में मदद करना।
    • कानून की सुस्थापित स्थिति है कि किसी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए विवश करने की स्थिति तब तक नहीं बनती, जब तक कि आरोपी का कृत्य इतना असहनीय और निरंतर न हो कि पीड़ित के पास जान देने के अलावा कोई दूसरा रास्ता न बचे।
  • सकारात्मक कृत्य और आपराधिक आशय (Mens Rea):
    • शादी से मना करना, प्रेम संबंध तोड़ना या पारिवारिक असहमति जताना एक व्यक्तिगत सामाजिक निर्णय है। इसमें कोई सकारात्मक आपराधिक आशय (Positive Overt Act) नहीं होता जिसका उद्देश्य दूसरे पक्ष को मरने के लिए प्रेरित करना हो।
  • सर्वोच्च न्यायालय की सुसंगत न्यायिक नजीरें:
    • जियो वैंकटेश बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2021, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि कोई व्यक्ति अति-संवेदनशील होने के कारण किसी सामान्य विवाद या संबंध टूटने पर आत्महत्या कर लेता है, तो दूसरे पक्ष को धारा 306 के तहत जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।’
    • सनोज कुमार बनाम बिहार राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘विवाह से इनकार करना अपने आप में धारा 306 के तहत आत्महत्या का दुष्प्रेरण नहीं है, जब तक कि मृतका को आत्महत्या के बिंदु तक पहुंचाने के लिए कोई सक्रिय भड़काऊ कृत्य न किया गया हो।’

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: लिव-इन पार्टनर व अन्य बनाम राज्य व अन्य [आपराधिक अपील – सर्वोच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (खंडपीठ)
  • निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • शिकायतकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट, साथ में अधिवक्ता यश एस. विजय, शिखर अग्रवाल, जोशुआ टॉम थॉमस एवं सारांश खंडेलवाल
    • अपीलार्थियों (आरोपियों) की ओर से: अधिवक्ता देविना सहगल, यथार्थ कंसल, श्रीकांत वर्मा मुदुनुरु, सैयद अहमद सौद, मो. परवेज डबास, मीर मुकर्रम अली, दानिश अहमद सैयद, उज़मी जमील हुसैन एवं मो. शाहिब
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 306 (आत्महत्या का दुष्प्रेरण) सहपठित धारा 107 (दुष्प्रेरण की परिभाषा) एवं धारा 34 (सामान्य आशय)
    • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 227 / 239 (उन्मोचन / Discharge) एवं धारा 482
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • अमलेन्दु पाल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2010, सुप्रीम कोर्ट) — ‘धारा 306 के तहत दोषसिद्धि के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि अभियुक्त ने ऐसा कोई कृत्य किया जिससे पीड़ित के पास आत्महत्या करने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा था।’
    • उमाकांत दास बनाम ओडिशा राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘प्रेम संबंध विच्छेद या विवाह से मुकरना स्वतः उकसावे की श्रेणी में नहीं आता।’
  • अंतिम परिणाम: अपील पूर्णतः स्वीकार; तेलंगाना उच्च न्यायालय और ट्रायल कोर्ट के आदेश निरस्त; लिव-इन पार्टनर और उसके परिवार के सभी छह सदस्यों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही रद्द।

Partner Suicide:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन)
मामला/धारातत्कालीन IPC की धारा 306 (34 के साथ) — आत्महत्या के लिए उकसाना
निचली अदालतों का रुखट्रायल कोर्ट (दिसंबर 2024) और तेलंगाना हाईकोर्ट (फरवरी 2026) ने डिस्चार्ज याचिका खारिज कर दी थी
सुप्रीम कोर्ट का फैसलातेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए सभी 6 आरोपियों के खिलाफ आपराधिक केस रद्द किया
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