हाईकोर्ट की मुख्य व महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- व्यापारिक गतिविधि में दुराशय का अभाव:अदालत ने माना कि बिना किसी दुर्भावना के व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए धार्मिक प्रतीकों का उपयोग करना अपराध नहीं है:“धार्मिक प्रतीकों से जुड़ी व्यावसायिक गतिविधि, जो किसी भड़काऊ भाषण, आपत्तिजनक कृत्य या किसी धार्मिक विश्वास को नीचा दिखाने की स्पष्ट मंशा के बिना की गई हो, IPC की धारा 295A के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में नहीं आती।”
- पल्लू या बॉर्डर पर चित्र का अर्थ अपराध नहीं:अदालत ने कहा कि कपड़ों पर कलात्मक चित्र छापना व्यापारिक रुझान का हिस्सा हो सकता है:“किसी पोशाक के निचले बॉर्डर या पल्लू पर किसी देवता या श्रद्धेय प्रतीक का कलात्मक चित्रण छापना या बेचना स्वतः ही एक ऐसा कृत्य नहीं माना जा सकता जो दुर्भावना से प्रेरित हो या सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने के लिए किया गया हो।”
- IPC की धारा 295A के मुख्य तत्व अनुपस्थित:न्यायाधीश ने नोट किया कि धारा 295A को लागू करने के लिए “जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादा” (Deliberate and Malicious Intention) होना अनिवार्य है, जो इस मामले में पूरी तरह गायब था।
अहमदाबाद: कपड़ों और परिधानों पर धार्मिक प्रतीकों व पूजनीय विभूतियों के कलात्मक चित्रण (Artistic Depictions), व्यापारिक गतिविधियों में धार्मिक रूपांकनों (Religious Motifs) के प्रयोग, और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A / भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 के तहत ‘विमर्शित और विद्वेषपूर्ण आशय’ (Deliberate and Malicious Intention) की विधिक कसौटी पर गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
सूरत के कपड़ा व्यापारी भरतभाई हीरजीभाई शंकर द्वारा दायर याचिका स्वीकार
न्यायमूर्ति पी.एम. रावल की एकल पीठ ने सूरत के कपड़ा व्यापारी भरतभाई हीरजीभाई शंकर द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ वर्ष 2017 में दर्ज आपराधिक प्राथमिकी और पूरी कार्यवाही को निरस्त (Quash) कर दिया। व्यापारी पर आरोप लगाया गया था कि वह ऐसी साड़ियां बेच रहा था जिनके पल्लू और निचले बॉर्डर पर भगवान गौतम बुद्ध की तस्वीरें मुद्रित थीं, जिससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची। उच्च न्यायालय ने पाया कि मामले में धारा 295A के मूलभूत तत्व और आपराधिक मानसिक स्थिति (Mens Rea) पूरी तरह नदारद हैं। अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि किसी धार्मिक मान्यता को अपमानित करने के प्रत्यक्ष इरादे या भड़काऊ कृत्य के बिना की गई सामान्य व्यावसायिक गतिविधि को आपराधिक श्रेणी में नहीं डाला जा सकता।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘पल्लू पर भगवान की तस्वीर होना स्वतः विद्वेषपूर्ण कृत्य नहीं’ न्यायमूर्ति पी.एम. रावल ने धार्मिक रूपांकनों वाले वस्त्रों की बिक्री और आपराधिक दायित्व का विश्लेषण करते हुए कहा: “किसी देवता या पूज्य प्रतीक के कलात्मक चित्रण वाले वस्त्रों को केवल छापना या बेचना—भले ही वह परिधान के निचले बॉर्डर या पल्लू पर ही क्यों न दिखाई दे—स्वतः दुर्भावनापूर्ण कृत्य (Deliberate malice) या सार्वजनिक शांति भंग करने के इरादे से किया गया कृत्य नहीं माना जा सकता। धार्मिक रूपांकनों से जुड़ी व्यावसायिक गतिविधि, जो किसी प्रत्यक्ष कृत्य (Overt act), भड़काऊ बयानबाजी या किसी धार्मिक विश्वास को नीचा दिखाने के प्रत्यक्ष इरादे के बिना की गई हो, धारा 295A के तहत आपराधिक रूप से दंडनीय अपमान की दहलीज को पार नहीं करती।”
2. कानून का असंवैधानिक विस्तार नहीं किया जा सकता: अदालत ने आपराधिक कानूनों के अनपेक्षित विस्तार पर आगाह करते हुए दर्ज किया:
- यदि बिना किसी आपराधिक आशय (Mens Rea) के ऐसी नियमित व्यावसायिक प्रथाओं को दंडनीय बनाया जाएगा, तो यह आपराधिक कानून को उसकी अभीष्ट संवैधानिक सीमाओं से बाहर विस्तारित करने जैसा होगा।
- पीठ ने रेखांकित किया:“याचिकाकर्ता एक वाणिज्यिक व्यापारी है जो बाजार के मौजूदा रुझानों और डिजाइनों के आधार पर साड़ियों और ड्रेस सामग्री का नियमित व्यापार कर रहा था। रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि उसका उद्देश्य किसी धर्म या वर्ग की धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना था।”
3. धारा 295A की आधारभूत आवश्यकताएं नदारद:
- अदालत ने दोहराया कि धारा 295A के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए केवल धार्मिक भावनाएं आहत होना पर्याप्त नहीं है; बल्कि आरोपी का प्राथमिक और प्रत्यक्ष उद्देश्य जानबूझकर व दुर्भावनापूर्वक किसी धर्म का अपमान करना होना चाहिए।
- वर्तमान मामले में यह दुर्भावनापूर्ण इरादा पूर्णतः अनुपस्थित था।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: सूरत का 2017 का विवाद
- प्राथमिकी और शिकायत (2017):
- सूरत के एक कपड़ा व्यापारी भरतभाई हीरजीभाई शंकर के खिलाफ सूरत पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 295A के तहत मामला दर्ज किया था।
- यह प्राथमिकी ‘समस्त युवा अंबेडकर समाज’ के अध्यक्ष द्वारा दी गई शिकायत के आधार पर दर्ज की गई थी।
- शिकायतकर्ता के आरोप:
- शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सूरत के कपड़ा व्यापारी भगवान गौतम बुद्ध की मुद्रित तस्वीरों वाली साड़ियां और कपड़े बेच रहे हैं।
- आरोप था कि साड़ियों के पल्लू और निचले हिस्से पर भगवान बुद्ध की छवि छापने से पूजनीय विभूति का अनादर होता है और इससे बौद्ध व अंबेडकरवादी समुदाय के सदस्यों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं।
- हाईकोर्ट में चुनौती (2018 से 2026 तक का सफर):
- व्यापारी ने अधिवक्ता राजेश के. कनानी के माध्यम से 2018 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और एफआईआर रद्द करने की प्रार्थना की।
- लगभग 8 वर्षों के न्यायिक विचार-विमर्श के बाद हाईकोर्ट ने व्यापारी को राहत देते हुए आपराधिक मामला खत्म कर दिया।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A (BNS की धारा 299):
- अपराध के आवश्यक तत्व:
- भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का विमर्शित और विद्वेषपूर्ण आशय (Deliberate and Malicious Intention)।
- उच्चारित या लिखित शब्दों, संकेतों या दृश्यरूपणों द्वारा अपमान करना या उसका प्रयास करना।
- ‘लापरवाही’ या ‘व्यावसायिक उपयोग’ धारा 295A में नहीं आते:
- कानून हर उस कृत्य को दंडित नहीं करता जिससे किसी की भावनाएं आहत हो सकती हों; यह केवल सोची-समझी विद्वेषपूर्ण दुर्भावना को अपराध मानता है।
- अपराध के आवश्यक तत्व:
- सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक नजीर—रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1957, संविधान पीठ):
- संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि धारा 295A धर्म का अपमान करने के हर प्रयास को दंडित नहीं करती, बल्कि केवल उन सुनियोजित एवं कटु प्रयासों को दंडित करती है जिनका उद्देश्य लोक व्यवस्था को बाधित करना हो।
- महेंद्र सिंह धोनी केस (महेंद्र सिंह धोनी बनाम येर्रगुंटला श्यामासुंदर, 2017, सुप्रीम कोर्ट):
- पत्रिका के कवर पर भगवान विष्णु के रूप में कई उत्पादों के साथ चित्रित होने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया था कि जब तक जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को अपमानित करने का विद्वेषपूर्ण आशय सिद्ध न हो, तब तक धारा 295A की कार्यवाही उत्पीड़न का साधन बन जाती है और उसे रद्द किया जाना चाहिए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: भरतभाई हीरजीभाई शंकर बनाम गुजरात राज्य [आपराधिक विविध आवेदन (FIR क्वैशिंग) – गुजरात उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति पी.एम. रावल (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: 7 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (कपड़ा व्यापारी) की ओर से: अधिवक्ता राजेश के. कनानी
- राज्य (गुजरात) की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) के.एम. अंतानी
- प्रत्यर्थी/शिकायतकर्ता की ओर से: अधिवक्ता एन.के. मजूमदार
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 295A (धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से दुर्भावनापूर्ण कृत्य)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 482 [उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां]
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार व व्यवसाय की स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 21
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1957, संविधान पीठ, सुप्रीम कोर्ट) — ‘धारा 295A केवल गंभीर और सोची-समझी दुर्भावनापूर्ण हरकतों पर लागू होती है, अनजाने या व्यावसायिक कृत्यों पर नहीं।’
- महेंद्र सिंह धोनी बनाम येर्रगुंटला श्यामासुंदर (2017, सुप्रीम कोर्ट) — ‘विमर्शित दुर्भावनापूर्ण आशय के अभाव में धारा 295A के तहत कार्यवाही चलाना प्रक्रिया का दुरुपयोग है।’
- अंतिम परिणाम: आपराधिक विविध आवेदन स्वीकृत; कपड़ा व्यापारी के खिलाफ दर्ज सूरत पुलिस की प्राथमिकी और संबंधित आपराधिक कार्यवाही पूर्णतः रद्द।
Lord Budha Pix:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | गुजरात उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति पी. एम. रावल) |
| याचिकाकर्ता | भरतभाई हिरजीभाई शंकर (सूरत के कपड़ा व्यापारी) |
| शिकायतकर्ता | समस्त युवा अंबेडकर समाज के अध्यक्ष (2017 में दर्ज एफआईआर) |
| कानूनी धारा | तत्कालीन IPC की धारा 295A (धार्मिक भावनाएं आहत करने का अपराध) |
| हाईकोर्ट का फैसला | आपराधिक कार्यवाही रद्द; कोई आपराधिक मंशा (Mens Rea) नहीं पाई गई। |

