Friday, October 9, 2026
HomeDecision 30'sCourt Video: कोर्ट की लाइव-स्ट्रीमिंग के दुरुपयोग...अदालती वीडियो का व्यावसायिक दुरुपयोग; यूट्यूब...

Court Video: कोर्ट की लाइव-स्ट्रीमिंग के दुरुपयोग…अदालती वीडियो का व्यावसायिक दुरुपयोग; यूट्यूब पर सनसनीखेज क्लिपिंग्स और निजी प्रचार कतई बर्दाश्त नहीं

अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ और कानूनी चिंताएँ

  1. व्यावसायिक दोहन और भ्रामक प्रचार पर रोक (CJI सूर्या कांत):याचिका में जब अधिवक्ता मैथ्यूज नेदुम्परा ने दलील दी कि लोगों को अदालत में होने वाली कार्यवाही जानने का अधिकार है, तो CJI सूर्या कांत ने स्पष्ट किया:“किसी की आवाज़ दबाने या लाइव-स्ट्रीमिंग को रोकने का कोई सवाल ही नहीं है। लेकिन व्यावसायिक दोहन को रोकना होगा। कोर्ट की कार्यवाही जनता को जागरूक करने के लिए है, न कि व्यावसायिक लाभ कमाने के लिए। जजों के बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना (Misquoting) लाइव स्ट्रीमिंग का उद्देश्य नहीं है।”
  2. वकालत के पेशे की आचार संहिता का उल्लंघन (जस्टिस जॉयमाल्या बागची):जस्टिस बागची ने रेखांकित किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियम वकीलों को स्व-प्रचार (Self-Promotion) करने से रोकते हैं:“आज अदालत की कार्यवाहियों के अंशों को अपलोड करने का बड़ा हिस्सा निजी प्रचार और व्यावसायिक लाभ के लिए किया जा रहा है। यह वकालत और कानूनी पेशे को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत है। हम लाइव-स्ट्रीमिंग डेटा को सुरक्षित रखने के लिए क्लाउड स्टोरेज और RTI जैसे तंत्र पर काम कर रहे हैं, लेकिन तकनीक का दुरुपयोग रोकना ज़रूरी है।”
  3. पूरा वीडियो बनाम 4-मिनट की कांट-छांट (वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन):वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने सुझाव दिया कि यदि अदालत की कार्यवाही को कहीं भी दिखाया जाए, तो उसे पूरा (Entirety में) दिखाया जाए, न कि सनसनीखेज हेडलाइन और भ्रामक टाइटल के साथ 4-4 मिनट की कटिंग चलाकर।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश और अगला कदम

  • सॉलिसिटर जनरल को निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को निर्देश दिया कि वे सभी हाईकोर्ट्स, राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों (Stakeholders) से इस विषय पर सुझाव मंगाएं।
  • प्रस्तावित गाइडलाइंस: केंद्र सरकार इन सुझावों के आधार पर एक व्यापक प्रस्ताव और जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) अदालत के समक्ष पेश करेगी, ताकि लाइव-स्ट्रीमिंग के अनधिकृत दोहन और व्यावसायिक इस्तेमाल को रोकने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश (Guidelines) तय किए जा सकें।
  • पत्रकारिता पर प्रभाव नहीं: पीठ ने पूर्व में ही स्पष्ट कर दिया था कि मान्यता प्राप्त समाचार संगठनों (Recognized News Publications) द्वारा निष्पक्ष और सटीक अदालती रिपोर्टिंग जारी रहेगी और इस नियमन से मीडिया रिपोर्टिंग प्रभावित नहीं होगी।

नई दिल्ली: न्यायालयीन कार्यवाही के सीधे प्रसारण (Live-Streaming of Court Proceedings) की सामग्री के अनधिकृत निष्कर्षण (Unauthorized Extraction), सोशल मीडिया और यूट्यूब (YouTube) चैनलों द्वारा आर्थिक लाभ व मोनेटाइजेशन (Monetisation) हेतु सनसनीखेज शीर्षकों के साथ वीडियो क्लिपिंग्स के व्यावसायिक उपयोग, वकीलों द्वारा निजी पेशेवर प्रचार (Self-Promotion & Canvassing), तथा भारतीय विधिक व्यवस्था की संस्थागत साख के क्षरण पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता व्यक्त की है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-सदस्यीय विशेष पीठ ने शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026 को इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता को निर्देश दिया कि वे देश के सभी उच्च न्यायालयों और हितधारकों (सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, बार काउंसिल आदि) से व्यापक सुझाव संकलित करें। अदालत ने केंद्र सरकार को इन सुझावों के आधार पर एक समग्र नियामक प्रस्ताव और जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने दो-टूक कहा है कि लाइव-स्ट्रीमिंग जनता की जागरूकता और विधिक समझ के लिए है, न कि किसी के व्यावसायिक मुनाफे या जजों के बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के लिए।

Also Read; Lord Budha Pix: साड़ी के पल्लू या बॉर्डर पर भगवान बुद्ध का कलात्मक चित्रण छापना स्वतः दुर्भावनापूर्ण नहीं; सूरत के कपड़ा व्यापारी ने ऐसा क्या किया, जानिए

शीर्ष अदालत के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां

1. ‘संस्था को कितनी क्षति पहुंच रही है, इसका किसी को अंदाजा नहीं’

पीठ ने अदालती बहसों की अधूरी और भ्रामक क्लिपिंग्स के वायरल होने पर गहरा क्षोभ व्यक्त करते हुए टिप्पणी की: “आपको कतई अंदाजा नहीं है कि इससे बार और बेंच… तथा स्वयं इस न्यायिक संस्था (Bar & Bench… the institution in itself) को कितना भारी नुकसान पहुंचा है। अदालती कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण जनता के देखने, कार्यवाहियों को समझने और अदालतों में क्या हो रहा है इसके प्रति नागरिकों को बेहतर जागरूक बनाने के लिए है। कुछ चैनल इन कार्यवाहियों का खुला व्यावसायिक दोहन (Commercial Exploitation) कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि हम इस पर रोक नहीं लगाएंगे? लोक-कल्याण के लिए बनाई गई किसी भी व्यवस्था का व्यावसायिक दोहन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

2. ‘जजों के बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना लाइव-स्ट्रीमिंग का उद्देश्य नहीं’

  • मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया:“जजों के बयानों को अनुचित संदर्भ में उद्धृत करना (Misquoting) या गलत तरीके से प्रस्तुत करना (Misrepresenting) लाइव स्ट्रीमिंग का उद्देश्य नहीं है। रिपोर्टिंग निष्पक्ष और सटीक होनी चाहिए, और इस प्रकार के दुरुपयोग से निपटने के ठोस रास्ते निकाले जाएंगे।”
  • सीजेआई ने यह भी साफ किया कि अदालत किसी भी प्रकार की सेंसरशिप या लाइव-स्ट्रीमिंग को बंद करने के पक्ष में नहीं है:“हम सभी इस बात पर सहमत हैं कि किसी भी चीज़ का गला घोंटने (Gagging) या लाइव-स्ट्रीमिंग को प्रतिबंधित करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। परंतु इसका दुरुपयोग—निजी प्रचार, मोनेटाइजेशन, विज्ञापन और गलत बयानी—गंभीर चिंता के विषय हैं।”

3. जस्टिस जॉयमाल्या बागची: ‘निजी प्रचार और वकालत की आचार संहिता का सीधा उल्लंघन’

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने वकालत पेशे के विधिक मानकों को रेखांकित करते हुए कहा:

  • बीसीआई आचार संहिता का उल्लंघन: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियम अधिवक्ताओं को पेशेवर लाभ या विज्ञापन के लिए प्रचार करने से स्पष्ट रूप से रोकते हैं। आज कई वीडियो केवल वकीलों के निजी प्रचार और क्लाइंट्स आकर्षित करने के लिए काटे और अपलोड किए जा रहे हैं।
  • क्लाउड स्टोरेज और तकनीकी चुनौतियां:“हम लाइव-स्ट्रीमिंग डेटा को संरक्षित करने के लिए पर्याप्त स्टोरेज स्पेस (क्लाउड स्टोरेज आदि) की व्यवस्था करने की प्रक्रिया में हैं, जिसे आरटीआई (RTI) या उचित माध्यम से उपलब्ध कराया जा सकता है। परंतु जब तकनीकी सीमाओं के कारण कोई स्क्रीन रिकॉर्ड कर लेता है और वीडियो काटकर निजी प्रोफाइल पर डाल देता है, तो यह वकालत पेशे के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को इस पर समाधान देना होगा।”

अदालत कक्ष में विधिक बहस: पक्ष-विपक्ष के तर्क

  • अधिवक्ता मैथ्यूज नेदुमपारा का तर्क:
    • उन्होंने दलील दी कि जनता को अदालत में होने वाली हर घटना और बातचीत को जानने का लोकतांत्रिक अधिकार है और सरकार या अदालत लोगों की राय या विचारों को खामोश नहीं कर सकती।
  • सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का रुख:
    • एसजी मेहता ने रेखांकित किया कि कई यूट्यूब चैनल अदालती कार्यवाहियों को काटकर व्यावसायिक रूप से चला रहे हैं।
    • उन्होंने कहा: “मुझे नहीं लगता कि अदालती कार्यवाही अपलोड करने वाले ऐसे यूट्यूब चैनलों को इसे तुरंत बंद करने का निर्देश देने में किसी को कोई विरोध होना चाहिए।”
  • अधिवक्ता प्रशांत भूषण का बिंदु:
    • उन्होंने अदालत का ध्यान आकर्षित किया कि केंद्र सरकार ने अभी तक इस मामले में अपना औपचारिक जवाब दाखिल नहीं किया है।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन के दो महत्वपूर्ण सुझाव:
    1. पूर्ण प्रसारण की अनिवार्यता: 30 मिनट की सुनवाई में से केवल 4 मिनट का असंबंधित हिस्सा काटकर सनसनी फैलाई जाती है। यदि कोई अदालती कार्यवाही अपलोड होती है, तो वह पूरी की पूरी (Entirety) होनी चाहिए, अधूरी नहीं।
    2. शीर्षक व विवरण पर पूर्ण प्रतिबंध: वीडियो पर कोई भ्रामक, क्लिकबेट या सनसनीखेज शीर्षक (Titles or Descriptions) जोड़ने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।

पूर्व का अंतरिम आदेश और मान्यता प्राप्त मीडिया को छूट

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके विनियामक कदमों का उद्देश्य पेशेवर पत्रकारिता को बाधित करना नहीं है:

  • मान्यता प्राप्त मीडिया को छूट: पूर्व के आदेश में स्पष्ट किया गया था कि अदालती आदेशों और कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग करने वाले मान्यता प्राप्त समाचार संगठनों (Recognised News Organisations) पर कोई पाबंदी नहीं है।
  • अनधिकृत सर्कुलेशन पर रोक: हालांकि, बिना पूर्व अनुमति के अदालती वीडियो को डाउनलोड/एक्सट्रैक्ट कर सोशल मीडिया पर व्यावसायिक इस्तेमाल या मीम्स बनाने पर पहले से अंतरिम रोक लागू है।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • स्वप्निल त्रिपाठी बनाम सुप्रीम कोर्ट (2018, 3-जज पीठ):
    • सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 (खुली अदालत का सिद्धांत – Open Court Principle) और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत न्याय प्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए अदालती कार्यवाहियों की लाइव-स्ट्रीमिंग को स्वीकृति दी थी।
    • परंतु उसी फैसले में स्पष्ट किया गया था कि लाइव-स्ट्रीमिंग की सामग्री कॉपीराइट संरक्षित होगी और उसका व्यावसायिक उपयोग या विरूपण अदालत की अवमानना माना जाएगा।
  • बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियम (BCI Rules) – नियम 36:
    • कोई भी अधिवक्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपने पेशे का विज्ञापन या प्रचार (Canvassing for professional work) नहीं कर सकता। अदालती तर्कों की क्लिपिंग्स को सोशल मीडिया पर वायरल कर फॉलोअर्स और क्लाइंट्स जुटाना व्यावसायिक कदाचार (Professional Misconduct) के दायरे में आता है।
  • न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971):
    • अदालती कार्यवाहियों या न्यायाधीशों की टिप्पणियों को संदर्भ से काटकर दुर्भावनापूर्ण ढंग से प्रस्तुत करना न्यायिक गरिमा को कलंकित (Scandalising the Court) करने की श्रेणी में आता है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: हर्षिता ग्रोवर बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
  • पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (3-जज विशेष पीठ)
  • आदेश की तिथि: 9 अक्टूबर 2026
  • विधिक सहभागिता:
    • केंद्र सरकार की ओर से: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता
    • वरिष्ठ व प्रमुख अधिवक्तागण: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन, अधिवक्ता प्रशांत भूषण, अधिवक्ता मैथ्यूज नेदुमपारा
  • प्रासंगिक कानून एवं नियम:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 21 एवं अनुच्छेद 142
    • बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियम (अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण के नियम – नियम 36)
    • न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971
    • सुप्रीम कोर्ट लाइव स्ट्रीमिंग रूल्स, 2021
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीर:
    • स्वप्निल त्रिपाठी बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘लाइव स्ट्रीमिंग का अधिकार पारदर्शिता का माध्यम है, लेकिन इसके व्यावसायिक उपयोग और विरूपण पर पूर्ण विधिक पाबंदी है।’
  • वर्तमान स्थिति: सॉलिसिटर जनरल को सभी उच्च न्यायालयों और हितधारकों (सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स आदि) से सुझाव संकलित कर ठोस विनियामक प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश; केंद्र सरकार अगली सुनवाई पर विस्तृत प्रस्ताव और जवाबी हलफनामा दाखिल करेगी।

Court Video:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठCJI सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना
याचिकाकर्ताहर्षिता ग्रोवर (अदालती वीडियो के अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग पर रोक की मांग)
मुख्य बिंदुलाइव-स्ट्रीमिंग का व्यावसायिक दोहन, जजों के बयानों को गलत तरीके से पेश करना और वकीलों द्वारा स्व-प्रचार
अदालत का रुखलाइव-स्ट्रीमिंग पर कोई रोक/सेंसरशिप नहीं होगी; केवल व्यावसायिक दुरुपयोग और भ्रामक क्लिपिंग को रोकने के लिए गाइडलाइंस बनेंगी।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
broken clouds
26.8 ° C
26.8 °
26.8 °
71 %
0.8kmh
63 %
Fri
27 °
Sat
31 °
Sun
31 °
Mon
33 °
Tue
34 °

Recent Comments