Friday, October 9, 2026
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Jantar Mantar: जंतर-मंतर पर न शौचालय की सुविधा है, न आपात स्थिति में एम्बुलेंस पहुंच सकती है; केंद्र सरकार को जंतर-मंतर के विकल्प पर विचार करने का निर्देश

सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणियाँ और पक्षकारों की दलीलें

  1. जंतर-मंतर पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव और सुरक्षा चिंताएँ:सुनवाई के दौरान जब यह मुद्दा उठा कि पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया, तो CJI सूर्या कांत ने टिप्पणी की:“वहाँ आसपास सरकारी आवास हैं। सामने की गली में कई सांसद (MPs) रहते हैं। इसके अलावा प्रदर्शनकारियों को भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है; उन्हें वहाँ शौचालय तक उपलब्ध नहीं होते।”
  2. आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस पहुँचने की समस्या:सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि जंतर-मंतर पर आपातकालीन चिकित्सा सहायता प्रदान करना अत्यंत कठिन है। यदि कोई प्रदर्शनकारी बीमार पड़ता है, तो संकीर्ण और भीड़भाड़ वाली जगह होने के कारण एम्बुलेंस का वहाँ पहुँचना लगभग असंभव हो जाता है।
  3. वैकल्पिक स्थल पर सहमति (Kapil Sibal & Prashant Bhushan):
    • वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यदि जंतर-मंतर पर अनुमति नहीं दी जा रही थी, तो अधिकारियों को रामलीला मैदान जैसे वैकल्पिक स्थल पर प्रदर्शन की अनुमति देनी चाहिए थी।
    • सभी पक्षों की सहमति के बाद अदालत ने दर्ज किया कि अब समय आ गया है कि जहाँ सभी बुनियादी सुविधाएँ (Basic Amenities) उपलब्ध हों, ऐसा कोई उपयुक्त स्थान पहचाना और अधिसूचित किया जाए।

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों (Peaceful Protests) के लिए निर्दिष्ट स्थलों (Designated Protest Sites), संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) व 19(1)(b) के तहत प्रदर्शनकारियों के बुनियादी अधिकारों, वीवीआईपी/आवासीय क्षेत्रों में प्रदर्शनों से उत्पन्न होने वाली सुरक्षा व ढांचागत बाधाओं, तथा विपक्षी दलों के प्रदर्शनों के मद्देनजर दिल्ली आने वाली रेलगाड़ियों व मेट्रो सेवाओं के निलंबन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने दूरगामी प्रशासनिक निर्देश दिए हैं।

CJP द्वारा विरोध मार्च से पहले दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को रोके जाने को चुनौती

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-सदस्यीय विशेष पीठ ने उस याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश पारित किया, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ विपक्षी दलों और ‘सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ (CJP) द्वारा आहूत विरोध मार्च से पहले दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को रोके जाने को चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल सहित सभी पक्षों की सहमति के बाद अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को नए वैकल्पिक स्थल पर विचार कर उचित निर्णय लेने का आदेश दिया। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि वह जंतर-मंतर (Jantar Mantar) के स्थान पर किसी ऐसे वैकल्पिक स्थल की पहचान करने पर विचार करे जहां प्रदर्शनकारियों के लिए शौचालय, पेयजल और आपातकालीन चिकित्सा जैसी सभी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों।

शीर्ष अदालत के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां

1. ‘प्रदर्शनकारियों को शौचालय तक नहीं मिलते, सामने सांसदों के आवास हैं’

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शनों के दौरान उत्पन्न होने वाली व्यावहारिक समस्याओं और बुनियादी सुविधाओं के घोर अभाव को रेखांकित करते हुए कहा:“वहां सरकारी आवास और रिहायशी इलाके हैं। सामने वाली लेन में कई सांसद (MPs) रहते हैं। स्वयं प्रदर्शनकारियों को भी वहां भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें वहां शौचालयों (Toilets) तक की सुविधा नहीं मिलती।”

2. आपातकालीन चिकित्सा और एम्बुलेंस पहुंचने में बाधा (सॉलिसिटर जनरल की दलील):

  • केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को अवगत कराया कि जंतर-मंतर का क्षेत्र संकरा और सघन है।
  • यदि प्रदर्शन के दौरान कोई प्रदर्शनकारी बीमार पड़ जाए या भगदड़/आपात स्थिति बन जाए, तो वहां एम्बुलेंस (Ambulance) या आपातकालीन चिकित्सा वाहनों का पहुंचना अत्यंत कठिन हो जाता है।
  • एसजी मेहता ने अदालत से अनुरोध किया कि केंद्र सरकार द्वारा जंतर-मंतर के स्थान पर किसी अन्य उपयुक्त स्थल को निर्दिष्ट करने के प्रस्ताव पर विचार करने के बयान को औपचारिक आदेश में दर्ज किया जाए।

3. सहमति के आधार पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश:

पीठ ने आदेश में दर्ज किया:“सुनवाई के दौरान यह सुझाव भी दिया गया, और दोनों पक्षों के विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता/अधिवक्ता इस बात पर एकमत (Ad Idem) हैं कि अब समय आ गया है कि किसी ऐसे उपयुक्त स्थान की पहचान और निर्धारण किया जाए जहां शांतिपूर्ण और वैध प्रदर्शनकारियों के लिए सभी बुनियादी सुविधाएं (Basic Amenities) प्रदान की जा सकें। सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) इस सुझाव पर विचार करे और उचित निर्णय ले।”

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सुनवाई का मुख्य मुद्दा: परिवहन सेवाओं पर पूर्ण रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से दिल्ली पुलिस और प्रशासन द्वारा विरोध-प्रदर्शन को विफल करने के लिए रेलगाड़ियों और मेट्रो सेवाओं को निलंबित करने के कदम को चुनौती दी थी:

  • याचिकाकर्ताओं के तर्क (वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल एवं प्रशांत भूषण):
    • माकपा (CPI-M) नेता एम.ए. बेबी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि जंतर-मंतर पूर्व से ही कानूनी रूप से निर्दिष्ट स्थल है, परंतु पुलिस ने सीजेपी और युवा कांग्रेस को अनुमति देने से इनकार कर दिया।
    • उन्होंने कहा कि यदि जंतर-मंतर पर अनुमति नहीं दी जा रही थी, तो कम से कम रामलीला मैदान जैसे वैकल्पिक स्थल पर विचार किया जाना चाहिए था, जिसे प्रशासन ने पूरी तरह दरकिनार कर दिया।
    • अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि नागरिकों के राजधानी आने के आवागमन तंत्र (Trains & Metro) को ठप करना अलोकतांत्रिक और मनमाना है।
  • सुप्रीम कोर्ट का आदेश:
    • पीठ ने केंद्र सरकार और प्रशासन को निर्देश दिया कि वे ट्रेन और मेट्रो सेवाओं को पूरी तरह बंद (Completely Stop) न करें।
    • अदालत ने आदेश दिया कि सार्वजनिक आवागमन को बाधित किए बिना परिवहन सेवाओं को विनियमित और नियंत्रित तरीके से (Regulated Manner) संचालित होने दिया जाए, ताकि आम यात्रियों को असुविधा न हो।

जंतर-मंतर का कानूनी इतिहास: ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ (2018) फैसला

  • बोट क्लब से जंतर-मंतर: 1993 तक इंडिया गेट के पास ‘बोट क्लब’ दिल्ली का मुख्य प्रदर्शन स्थल था, जिसे बाद में सुरक्षा कारणों से बंद कर जंतर-मंतर पर स्थानांतरित कर दिया गया था।
  • 2017 का एनजीटी प्रतिबंध और 2018 का सुप्रीम कोर्ट फैसला:
    • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने ध्वनि प्रदूषण के आधार पर जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाकर रामलीला मैदान जाने को कहा था।
    • परंतु वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले में व्यवस्था दी थी कि प्रदर्शन करने के अधिकार पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को विनियमित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करने का आदेश दिया था।
  • ताजा याचिकाएं: हाल ही में जंतर-मंतर के रिहायशी इलाके में प्रदर्शनों से स्थानीय निवासियों को होने वाली असुविधा को लेकर एक अन्य याचिका पर भी शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) एवं 19(1)(b) (शांतिपूर्ण सभा का अधिकार):
    • नागरिकों को बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्रित होने और सरकार की नीतियों का विरोध करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
    • अनीता ठाकुर बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (2016) और शाहीन बाग फैसला (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि विरोध का अधिकार पूर्ण (Absolute) नहीं है; इसे अनुच्छेद 19(3) के तहत लोक व्यवस्था (Public Order) और अन्य नागरिकों के आवागमन व शांति के अधिकार के साथ संतुलित करना आवश्यक है।
  • राज्य का सकारात्मक दायित्व (Positive Obligation):
    • केवल विरोध-प्रदर्शनों की अनुमति देना पर्याप्त नहीं है; राज्य का यह दायित्व है कि वह प्रदर्शनकारियों के लिए मानवीय गरिमा के अनुकूल बुनियादी सुविधाएं—जैसे स्वच्छ पेयजल, मोबाइल शौचालय और प्राथमिक चिकित्सा—सुनिश्चित करे। संकरे रिहायशी इलाकों में इन सुविधाओं का अभाव प्रदर्शनकारियों और स्थानीय निवासियों दोनों के अधिकारों का हनन करता है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: एम.ए. बेबी व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
  • पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (3-जज विशेष पीठ)
  • आदेश की तिथि: 9 अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • केंद्र सरकार की ओर से: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता
    • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल एवं अधिवक्ता प्रशांत भूषण
  • प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(b) (शांतिपूर्ण सभा का अधिकार) एवं अनुच्छेद 21
    • दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 (प्रदर्शनों के विनियमन की शक्तियां)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) बनाम भारत संघ (2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘विरोध-प्रदर्शन के अधिकार पर पूर्ण पाबंदी असंवैधानिक है; संतुलित विनियमन अनिवार्य।’
    • अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त [शाहीन बाग मामला] (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सार्वजनिक रास्तों या अनिर्दिष्ट स्थलों पर अनिश्चितकालीन धरना नहीं दिया जा सकता; प्रदर्शन केवल निर्दिष्ट स्थलों पर ही होने चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जंतर-मंतर के विकल्प के रूप में बुनियादी सुविधाओं से लैस नए प्रदर्शन स्थल के निर्धारण पर निर्णय लेने को कहा; दिल्ली में ट्रेन व मेट्रो सेवाओं को पूरी तरह बंद न कर विनियमित रूप से चलाने का अंतरिम निर्देश दिया।

Jantar Mantar: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठCJI सूर्या कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना
मूल याचिकादिल्ली मेट्रो/ट्रेन रोकने का विरोध और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति न मिलना
मुख्य मुद्दाजंतर-मंतर पर शौचालय, आपातकालीन चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव व वीआईपी क्षेत्र
अदालत का आदेशकेंद्र सरकार प्रदर्शनकारियों के लिए मूलभूत सुविधाओं वाले वैकल्पिक स्थल का चयन करे।
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