सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ
- “सावधानी न बरतने पर हर वाहन एक ‘किलिंग मशीन’ है”:निजी बस ऑपरेटरों द्वारा शेड्यूल समय सीमा (Timings) बनाए रखने के बहाने पर तीखा ऐतराज़ जताते हुए जस्टिस रामचंद्रन ने कहा:“क्या समय सीमा बनाए रखना कोई बहाना हो सकता है? क्या कोई किसी की जान लेने के बहाने के रूप में यह कह सकता है? बस, कार या कोई भी वाहन एक ‘किलिंग मशीन’ (हत्यारा साधन) बन जाता है यदि उसे सावधानी से न चलाया जाए।”
- अधिकारियों के आश्वासन और ज़मीनी हकीकत पर सवाल:कोच्चि और कन्नूर में निजी बसों द्वारा पैदल यात्रियों और बच्चों को टक्कर मारने की घटनाओं का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि पूर्व में अधिकारियों ने भारी वाहनों को ओवरटेक न करने और लेन में चलाने का आश्वासन दिया था, लेकिन ज़मीन पर कोई सुधार नहीं दिखा।“अगर केवल रैश ड्राइविंग (Rash & Negligent Driving) का मामला दर्ज होता है, तो चालकों में कानून का कोई डर नहीं रहता। वे सड़क पर कुछ भी कर सकते हैं।”
- कानून लागू करना अधिकारियों की जिम्मेदारी:अदालत ने स्पष्ट किया कि वह अधिकारियों के काम में सूक्ष्म प्रबंधन (Micromanage) नहीं करना चाहती, बल्कि आम नागरिकों की चिंताएँ रख रही है:“अदालतें जो चाहें कह सकती हैं, लेकिन प्रवर्तन (Enforcement) आपके हाथों में है। अगर उन्हें प्रवर्तन का डर नहीं होगा, तो वे कानून से नहीं डरेंगे।”
अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस अधिकारियों को सड़क सुरक्षा और यातायात नियमों को सख्ती से लागू करने के ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर 2026 को होगी।
कोच्चि: केरल की सार्वजनिक सड़कों की दुर्दशा, निजी बसों (Private Buses) द्वारा समय-सारणी (Schedule Timings) बनाए रखने के बहाने की जाने वाली जानलेवा व अनियंत्रित ड्राइविंग, पैदल यात्रियों और बच्चों की सुरक्षा, तथा मोटर वाहन विभाग व ट्रैफिक पुलिस द्वारा नियमों के लचर प्रवर्तन (Slack Enforcement) पर केरल हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति देवन रामचंद्रन की एकल पीठ ने राज्य में सड़कों की स्थिति और सड़क सुरक्षा से जुड़ी रिट याचिकाओं पर 9 अक्टूबर 2026 को सुनवाई करते हुए ट्रैफिक पुलिस और मोटर वाहन प्राधिकरणों से सख्त सवाल पूछे। पीठ ने पहले दिए गए आश्वासनों के बावजूद ज़मीनी स्तर पर कोई सुधार न दिखने पर गहरा असंतोष व्यक्त किया और स्पष्ट किया कि यदि चालकों के मन में पुलिस प्रवर्तन का खौफ नहीं होगा, तो वे कभी कानून का सम्मान नहीं करेंगे। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सड़क पर समय का पालन करना किसी की जान लेने का बहाना नहीं हो सकता, और यदि सावधानी न बरती जाए तो कोई भी वाहन सड़क पर एक “किलिंग मशीन” (Killing Machine) में तब्दील हो जाता है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां
1. ‘समय-सारणी का बहाना किसी की जान लेने का लाइसेंस नहीं बन सकता’
बस ऑपरेटरों द्वारा शेड्यूल टाइमिंग बनाए रखने के बहाने बेलगाम रफ्तार को सही ठहराने की दलील पर न्यायमूर्ति देवन रामचंद्रन ने सख्त ऐतराज जताते हुए कहा:
“क्या शेड्यूल टाइमिंग बनाए रखना (Maintaining timings) लापरवाही से गाड़ी चलाने का कोई बहाना हो सकता है? क्या कोई किसी की जान लेने के लिए इसे बहाने के रूप में पेश कर सकता है? एक बस, कार या कोई भी वाहन यदि सावधानीपूर्वक न चलाया जाए, तो वह सीधे तौर पर एक “किलिंग मशीन” (Killing Machine) बन जाता है।”
2. ‘यदि केवल लापरवाही का मामला दर्ज होगा, तो चालकों में डर कैसा?’
न्यायमूर्ति रामचंद्रन ने पुलिस द्वारा केवल रस्म अदायगी के तौर पर धारा 281 BNS (या पूर्ववर्ती 279 IPC – उतावलेपन या उपेक्षा से गाड़ी चलाना) के तहत मामला दर्ज करने की विफलता पर सवाल उठाया:
- “हम आए दिन दुर्घटनाएं देखते हैं। कोई वाहन बाईं ओर से आता है और किसी को लगभग कुचल ही देता है, और फिर आप चालक पर केवल उतावलेपन व लापरवाही से गाड़ी चलाने का मामला दर्ज कर लेते हैं। तब उस चालक के मन में आपके लिए या कानून के लिए क्या सम्मान रह जाएगा? यदि केवल लापरवाही का मामला ही दर्ज होना है, तो डरने की कोई बात ही नहीं बचती। सड़क पर कुछ भी किया जा सकता है।”
3. ‘अदालतें चाहे जो कहें, प्रवर्तन आपके हाथों में है’
अदालत ने पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय करते हुए दो-टूक कहा: “अदालतें चाहे जो कुछ भी कहें, कानून का वास्तविक प्रवर्तन (Enforcement) आपके हाथों में है। यदि वाहन चालकों के मन में प्रवर्तन का डर (Fear of enforcement) नहीं होगा, तो उनके मन में कानून का भी कोई डर नहीं रहेगा।”
4. हॉर्न से डराने और लेन अनुशासन के उल्लंघन पर चिंता:
- अदालत ने भारी वाहनों को शहरों और नगर पालिका क्षेत्रों के भीतर धीमी लेन (Slow Lane) में सीमित रखने और ओवरटेकिंग पर रोक लगाने के पूर्व आदेशों की अनदेखी पर सवाल उठाया।
- पीठ ने चालकों में नागरिक बोध (Civic Sense) के अभाव, विशेष रूप से ओवरटेक करते समय अन्य सड़क उपयोगकर्ताओं को डराने के लिए अत्यधिक हॉर्न बजाने की प्रवृत्ति पर भी नाराजगी जताई।
- अदालत ने पूछा कि सड़कों पर लगे कैमरा सर्विलांस नेटवर्क का उपयोग ऐसे उल्लंघनों की पहचान और चालान के लिए प्रभावी ढंग से क्यों नहीं किया जा रहा है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: कोच्चि और कन्नूर की खौफनाक घटनाएं
अदालत का यह सख्त रुख पूर्व सुनवाई में सामने आई दो दर्दनाक घटनाओं के संज्ञान के बाद आया:
- कोच्चि की घटना: एक निजी बस ने दूसरी बस को ओवरटेक करने की होड़ में फुटपाथ/पैदल यात्री क्षेत्र (Pedestrian Area) में बस घुसा दी, जिससे सामने चल रहे एक नागरिक को अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा।
- कन्नूर की घटना: एक निजी बस ने मुख्य सड़क पर दो मासूम बच्चों को टक्कर मार दी और चालक बच्चों को तड़पता छोड़कर मौके से फरार हो गया।
- अदालत ने इन घटनाओं को “भयावह” बताते हुए अधिकारियों से जवाब मांगा था। हालांकि अधिकारियों ने भारी वाहनों के ओवरटेकिंग पर रोक लगाने और लेन अनुशासन लागू करने का आश्वासन दिया था, लेकिन ज़मीन पर उल्लंघन लगातार जारी रहे।
अदालत का रुख: माइक्रो-मैनेजमेंट नहीं, नागरिक सुरक्षा की चिंता
- न्यायमूर्ति देवन रामचंद्रन ने स्पष्ट किया कि अदालत का इरादा पुलिस या परिवहन विभाग के कार्यों को अपने हाथ में लेने या उनका माइक्रो-मैनेजमेंट (Micromanagement) करने का नहीं है।
- अधिकारियों को अदालत में इसलिए बुलाया गया ताकि उन्हें आम नागरिकों द्वारा प्रतिदिन झेले जा रहे सड़क सुरक्षा के गंभीर खतरों से सीधे अवगत कराया जा सके और उनसे प्रभावी कदम उठाने की अपेक्षा की जा सके।
- मामले की अगली विस्तृत सुनवाई 16 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 21 (सड़क सुरक्षा और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार):
- सर्वोच्च न्यायालय ने सड़क सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट समिति (रिट याचिका 13029/1985) और डॉ. एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ में स्पष्ट रूप से स्थापित किया है कि सुरक्षित सड़कें और गैर-लापरवाह सार्वजनिक परिवहन नागरिकों के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं।
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act, 1988):
- धारा 112 एवं 183: निर्धारित गति सीमा का उल्लंघन करने पर दंड।
- धारा 184 (खतरनाक ड्राइविंग): जनता के लिए खतरनाक तरीके से वाहन चलाने पर भारी जुर्माना और कारावास।
- धारा 19 (ड्राइविंग लाइसेंस का निलंबन/रद्द करना): यदि कोई चालक बार-बार अनियंत्रित व खतरनाक ड्राइविंग करता है, तो लाइसेंसिंग प्राधिकारी उसका लाइसेंस निलंबित या रद्द करने के लिए बाध्य है।
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 281: लोक मार्ग पर उतावलेपन या उपेक्षा से वाहन चलाना जिससे मानव जीवन संकटापन्न हो।
- धारा 106: उपेक्षा द्वारा मृत्यु कारित करना (पूर्ववर्ती IPC धारा 304A), जिसमें हिट-एंड-रन मामलों के लिए कठोर प्रावधान शामिल हैं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सी.पी. अजितकुमार व अन्य बनाम केरल राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – केरल उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति देवन रामचंद्रन (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 9 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 16 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- राज्य (केरल सरकार) की ओर से: सरकारी प्लीडर मनु थॉमस
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धाराएं 112, 184 एवं 19
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 281 व 106 (या IPC 279/304A)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 एवं अनुच्छेद 226
- वर्तमान स्थिति: केरल हाईकोर्ट ने निजी बसों की बेलगाम ड्राइविंग पर ट्रैफिक पुलिस को कड़ी फटकार लगाई; 16 अक्टूबर 2026 को सुरक्षित सड़कों और लेन प्रवर्तन पर ठोस कार्ययोजना प्रस्तुत करने का निर्देश।
Reckless Drivers:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति देवन रामचंद्रन) |
| मामला | केरल में सार्वजनिक सड़कों की स्थिति और निजी बसों की लापरवाही से जुड़ी सड़क सुरक्षा याचिका |
| मुख्य बिंदु | समय पर बस पहुँचाने के बहाने रैश ड्राइविंग; बसों को धीमी लेन में चलाने और कड़े प्रवर्तन पर ज़ोर |
| अगली सुनवाई | 16 अक्टूबर 2026 |

