अदालत का रुख और मुख्य टिप्पणी
- नियमों का स्पष्ट उल्लंघन:जस्टिस शुक्ला ने सुनवाई के दौरान वकील के गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर टिप्पणी करते हुए आदेश में दर्ज किया:“विद्वान वकील बगीचे में टहलते हुए इस मामले में पेश हो रहे हैं और कनेक्शन भी ठीक नहीं है। यह इस अदालत के इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस एंड वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूल्स, 2025 का स्पष्ट उल्लंघन है। तदनुसार, याचिकाकर्ता के विद्वान वकील पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया जाता है…”
- सुविधा का अर्थ अदालती शिष्टाचार से समझौता नहीं:न्यायमूर्ति शुक्ला ने स्पष्ट किया कि वर्चुअल सुनवाई की सुविधा (Virtual Convenience) का मतलब यह नहीं है कि अदालत के शिष्टाचार (Courtroom Decorum) से समझौता किया जाए या न्यायिक कार्यवाही में बाधा डाली जाए।
- पूर्व में भी लगाया था जुर्माना:उल्लेखनीय है कि पिछले महीने भी जस्टिस शुक्ला ने चलती कार में बैठकर वर्चुअल सुनवाई में शामिल होने वाले एक अन्य वकील पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया था।
नई दिल्ली: वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और आभासी अदालती कार्यवाहियों (Virtual Court Hearings) के दौरान पेशेवर आचार संहिता, ‘इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य एवं वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2025’ (Electronic Evidence and Video Conferencing Rules, 2025) के अनिवार्य अनुपालन, तथा अदालती मर्यादा और गरिमा (Courtroom Decorum) के क्षरण पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बार फिर कड़ा अनुशासनिक रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की एकल पीठ ने 9 अक्टूबर 2026 को यह आदेश पारित करते हुए अधिवक्ता को निर्देश दिया कि वे यह जुर्माना राशि आज से एक सप्ताह के भीतर ‘दिल्ली उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति’ (DHCLSC) के पास जमा कराएं। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले की अगली सुनवाई यानी 4 नवंबर 2026 को संबंधित वकील को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की अनुमति नहीं होगी और उन्हें अदालत कक्ष में सशरीर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित (Must appear in person) होना होगा। अदालत ने एक मध्यस्थता याचिका (Arbitration Petition) की सुनवाई के दौरान पार्क/बगीचे में टहलते हुए (Walking in the Garden) और अस्थिर इंटरनेट कनेक्शन के साथ ऑनलाइन पेश होने पर याचिकाकर्ता के अधिवक्ता पर ₹10,000 का हर्जाना (Costs) लगाया है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं औपचारिक आदेश
1. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2025 का खुला उल्लंघन
न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला ने वर्चुअल स्क्रीन पर वकील की स्थिति देखकर नाराजगी जताते हुए आदेश में दर्ज किया: “विद्वान अधिवक्ता इस मामले में बगीचे में टहलते हुए (Walking in the Garden) पेश हो रहे हैं और उनका इंटरनेट कनेक्शन भी ठीक नहीं है। यह इस न्यायालय के ‘इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2025’ (Electronic Evidence and Video Conferencing Rules, 2025) का सीधा उल्लंघन है। तदनुसार, याचिकाकर्ता के विद्वान वकील पर ₹10,000/- का हर्जाना लगाया जाता है, जिसे आज से एक सप्ताह के भीतर दिल्ली उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति के पास जमा कराया जाए।”
2. ‘वर्चुअल सुनवाई की सुविधा अदालती मर्यादा की कीमत पर नहीं’
अदालत ने सख्त लहजे में रेखांकित किया कि महामारी के बाद न्याय प्रणाली में वादियों और वकीलों की सुगमता के लिए लागू की गई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की तकनीकी सुविधा को लापरवाही या कैजुअल रवैये का साधन नहीं बनाया जा सकता:
- वीसी की सुविधा का उद्देश्य न्याय तक पहुंच को सुगम बनाना है, न कि न्यायिक कार्यवाही की गरिमा और संचालन को बाधित करना।
- खराब नेटवर्क और चलते-फिरते दलीलें देने से अदालत का बहुमूल्य समय नष्ट होता है और अदालती प्रक्रिया बाधित होती है।
जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला के पूर्ववर्ती सख्त आदेश: चलती कार से पेशी पर ₹1 लाख का जुर्माना
न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला द्वारा वर्चुअल मर्यादा के उल्लंघन पर जुर्माना लगाने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पूर्व भी वे सख्त कदम उठा चुके हैं:
- चलती कार से पेशी पर ₹1 लाख का जुर्माना: पिछले महीने ही (सितंबर 2026 में) जस्टिस शुक्ला ने एक वकील पर उस समय ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) का भारी जुर्माना लगाया था, जब वे एक चलती कार में बैठकर (Sitting in a moving car) वर्चुअल सुनवाई में शामिल हुए थे।
- पीठ ने तब भी स्पष्ट किया था कि वकीलों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने कार्यालय या किसी शांत, स्थिर व गरिमापूर्ण कक्ष से ही अदालत के समक्ष उपस्थित हों।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है नियम?
- इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2025 (Delhi HC Rules):
- दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा अधिसूचित इन नियमों के अनुसार, वर्चुअल सुनवाई में उपस्थित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति और अधिवक्ता को:
- उपयुक्त और शांत वातावरण (Quiet & Enclosed environment) से जुड़ना अनिवार्य है।
- वाहन चलाते हुए, सार्वजनिक स्थानों पर घूमते हुए या शोरगुल वाले स्थानों से लॉग-इन करने की सख्त मनाही है।
- स्थिर और पर्याप्त बैंडविड्थ वाला इंटरनेट कनेक्शन सुनिश्चित करना संबंधित पक्षकार/वकील की जिम्मेदारी है।
- औपचारिक अधिवक्ता वेशभूषा (Dress Code) का अनिवार्य रूप से पालन करना होगा।
- दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा अधिसूचित इन नियमों के अनुसार, वर्चुअल सुनवाई में उपस्थित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति और अधिवक्ता को:
- सर्वोच्च न्यायालय का रुख (इन रे: वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग दिशानिर्देश):
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी समय-समय पर स्पष्ट किया है कि आभासी अदालत केवल एक तकनीकी स्क्रीन नहीं, बल्कि संविधान के तहत स्थापित औपचारिक न्यायालय कक्ष का ही विधिक विस्तार (Extension of Courtroom) है; अतः वहां की अवमानना या अनुचित आचरण पर अदालत को अवमानना या हर्जाना लगाने की पूरी अंतर्निहित शक्ति प्राप्त है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: मध्यस्थता याचिका (Arbitration Petition) – दिल्ली उच्च न्यायालय
- पीठ: न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 9 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 4 नवंबर 2026 (वकील को सशरीर उपस्थित होने का निर्देश)
- अधिरोपित हर्जाना: ₹10,000 (एक सप्ताह के भीतर जमा करने का आदेश)
- भुगतान का स्थान: दिल्ली उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति (Delhi High Court Legal Services Committee – DHCLSC)
- प्रासंगिक कानून एवं नियम:
- दिल्ली उच्च न्यायालय इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य एवं वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2025
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 35A एवं धारा 151
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (पेशेवर आचरण के मानक)
- वर्तमान स्थिति: वकील पर ₹10,000 का हर्जाना अधिरोपित; 4 नवंबर 2026 को अगली सुनवाई पर अधिवक्ता को अदालत में व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने का सख्त आदेश।
Courtroom Decorum: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला) |
| मुख्य मुद्दा | बगीचे में टहलते हुए लापरवाही से वर्चुअल कोर्ट में शामिल होना |
| उल्लंघन | Electronic Evidence and Video Conferencing Rules, 2025 |
| अदालत का आदेश | ₹10,000 का जुर्माना (दिल्ली हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी में 1 सप्ताह में जमा करने का निर्देश) |
| अगली सुनवाई | 4 नवंबर 2026 (वकील को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश) |

