विवाद का कारण और सुप्रीम कोर्ट की स्पष्टीकरण
- मई 2026 का बिहार SIR फैसला बनाम नया फॉर्म 6:न्यायमूर्ति बागची और मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों का जवाब देते हुए कहा:“जब 27 मई 2026 को बिहार SIR का निर्णय सुनाया गया था, तब नया फॉर्म 6 अस्तित्व में ही नहीं था। इसलिए उस फैसले में इसे मंजूरी देने या खारिज करने का प्रश्न ही नहीं उठता। अदालत ने इस पर कोई न्यायिक निर्णय (No Adjudication) नहीं दिया है।”
- चुनाव आयोग (ECI) का दावा और विवाद:विवाद तब शुरू हुआ जब ईसीआई ने 26 सितंबर को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने मई फैसले में विशेष पुनरीक्षण (SIR) के लिए अतिरिक्त घोषणा पत्र को बरकरार रखा है। हालांकि, नए डिजिटल फॉर्म 6 पर नए आवेदकों से यह अनिवार्य रूप से मांगा गया कि क्या वे या उनके माता-पिता/दादा-दादी पिछले SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) में दर्ज थे या नहीं।
- चुनाव आयुक्तों की आंतरिक आपत्ति:रिपोर्ट्स के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) ने इस संशोधन पर आपत्ति जताई थी कि निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) में केंद्र सरकार द्वारा संशोधन किए बिना वैधानिक फॉर्म 6 को बदला नहीं जा सकता।
याचिका में उठाए गए मुख्य बिंदु
- सामूहिक निर्णय लेने में विफलता (Violation of Collective Decision-making): याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लगभग 10 महीनों में 14 महत्वपूर्ण फैसले लिए।
- अनुच्छेद 324 का उल्लंघन: याचिका में मांग की गई है कि आयोग के सभी 14 फैसलों (नोटिफिकेशन, फॉर्म बदलाव और SIR निर्देश) को रद्द किया जाए और संविधान के अनुच्छेद 324 और बहुमत/सामूहिक विचार-विमर्श के नियमों के अनुसार उनकी समीक्षा की जाए।
- दस्तावेजों की मांग: याचिकाकर्ताओं ने इन 14 फैसलों से जुड़े मूल रिकॉर्ड, जैसे बैठक के मिनट्स, एजेंडा, वोटिंग रिकॉर्ड और चुनाव आयुक्तों के असहमति पत्र (Dissent Notes) अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश मांगा है।
नई दिल्ली: निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता पंजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले वैधानिक फॉर्म 6 (Statutory Form 6 for Voter Registration) में किए गए नए घोषणा-पत्र संशोधनों, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR), भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर लगाए गए एकतरफा निर्णय लेने के आरोपों, तथा निर्वाचन आयोग में सामूहिक निर्णय लेने की संवैधानिक प्रक्रिया (Collective Decision-Making under Article 324) पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत अहम स्पष्टीकरण दिया है।
फॉर्म 6: वैधानिकता पर स्वतंत्र रूप से न्यायिक परीक्षण (Adjudication) करेगी
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने सोमवार को प्रिया मिश्रा द्वारा दायर रिट याचिका पर मौखिक टिप्पणियां करते हुए वकीलों को अदालत के शब्दों को संदर्भ से बाहर खींचने से बचने की नसीहत दी। पीठ ने याचिका पर औपचारिक नोटिस जारी करते हुए मामले को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर अन्य संबद्ध याचिकाओं के साथ 27 अक्टूबर 2026 को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि उसने नए फॉर्म 6 को न तो स्वीकृत (Approved) किया है और न ही अस्वीकृत (Disapproved); अदालत इसकी वैधानिकता पर स्वतंत्र रूप से न्यायिक परीक्षण (Adjudication) करेगी।
सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां
1. ‘बिहार SIR फैसले के समय नया फॉर्म 6 था ही नहीं; कोई न्यायिक निर्णय नहीं हुआ’
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने दलील दी कि चुनाव आयोग का यह दावा गलत है कि सुप्रीम कोर्ट ने नए फॉर्म 6 को मंजूरी दी है, और 5 अक्टूबर को अदालत ने कहा था कि यह स्वीकृत नहीं है, तब न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया: “नए फॉर्म 6 पर अदालत द्वारा कोई न्यायिक निर्णय (No Adjudication) नहीं दिया गया है। हमने केवल इतना ही कहा था—चाहे वह स्वीकृत हो या अस्वीकृत…माननीय मुख्य न्यायाधीश का कहने का तात्पर्य केवल यह था कि जब मई 2026 में बिहार SIR का फैसला सुनाया गया था, तब यह नया फॉर्म 6 अस्तित्व में ही नहीं था। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे मंजूरी दी है या इसे खारिज किया है। हम इसकी वैधानिकता का अलग से परीक्षण करेंगे।”
2. सीजेआई की वकीलों को हिदायत: ‘इस तरह शब्दों को न पकड़ें’:
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अधिवक्ताओं द्वारा अदालत की मौखिक टिप्पणियों को मनमाने ढंग से व्याख्यायित करने पर टोकते हुए कहा: “अदालत के शब्दों को इस तरह संदर्भ से अलग करके न पकड़ें (Don’t pick up words like this…)।”
- पीठ ने साफ किया कि अदालत का काम वैधानिक प्रक्रियाओं के आधार पर परीक्षण करना है, न कि प्रशासनिक दावों या बयानों पर पूर्वग्रह बनाना।
विवाद का मूल कारण: क्या है नया फॉर्म 6 और चुनाव आयोग का दावा?
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब मीडिया रिपोर्टों और आंतरिक अभिलेखों से यह बात सामने आई कि मतदाता पंजीकरण फॉर्म में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं:
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│ फॉर्म 6 (Form 6) में संशोधन से जुड़ा विवाद │
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【नया घोषणा-पत्र (New Declaration)】 【चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्ति】
• नए मतदाता को यह घोषित करना अनिवार्य किया गया • चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और
कि क्या वह या उसके माता-पिता/दादा-दादी पूर्व विवेक जोशी ने कथित तौर पर इस पर
के SIR में मैप (सूचीबद्ध) थे या नहीं। आपत्ति जताई थी।
• पहले अन्य राज्यों के SIR फॉर्म में ऐसी पूर्व-शर्त • तर्क: निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960
नहीं मांगी जाती थी। (1960 Rules) में केंद्र सरकार द्वारा संशोधन
किए बिना ऐसा वैधानिक फॉर्म नहीं बदला जा सकता।
- चुनाव आयोग की प्रेस विज्ञप्ति (26 सितंबर 2026): चुनाव आयोग ने एक आधिकारिक प्रेस नोट जारी कर सुझाव दिया था कि सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 के बिहार SIR फैसले में फॉर्म 6 घोषणा-पत्र को सही ठहराया है।
- सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण: चूंकि नया फॉर्म 6 मई 2026 के फैसले के बाद (जुलाई में) लागू किया गया था, इसलिए बिहार फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पास इस नए फॉर्म का परीक्षण करने का कोई अवसर ही नहीं था। अतः आयोग का यह दावा कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे मंजूरी दी है, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।
वर्तमान रिट याचिका की प्रमुख मांगें और आधार
याचिकाकर्ता प्रिया मिश्रा और मध्य प्रदेश के पूर्व कानून मंत्री पी.सी. शर्मा द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में निम्नलिखित गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं:
- सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया (Collective Decision-Making) का उल्लंघन:
- याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने निर्वाचन आयोग की सामूहिक विचार-विमर्श की अनिवार्य परंपरा और विधिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
- आरोप है कि लगभग 10 महीनों की अवधि में लगभग 14 बड़े नीतिगत और प्रशासनिक निर्णय दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) की औपचारिक सहमति या अनुमोदन के बिना लिए गए।
- अनुच्छेद 324 और स्वायत्तता का हनन:
- भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय (Three-Member Constitutional Body) है। संविधान के अनुच्छेद 324 और चुनाव आयोग (कार्य संचालन) नियमों के तहत सभी महत्वपूर्ण निर्णय बहुमत या सर्वसम्मति से होने चाहिए।
- मूल रिकॉर्ड पेश करने की मांग:
- याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि इन 14 विवादित निर्णयों से संबंधित मूल फाइलें, एजेंडा, मिनट्स (बैठक की कार्यवाही), असहमति नोट (Dissenting Notes) और पत्राचार अदालत के समक्ष मंगाए जाएं।
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 का उल्लंघन:
- याचिका में दलील दी गई है कि फॉर्म 6 एक वैधानिक फॉर्म है। केंद्र सरकार द्वारा नियमों में औपचारिक संशोधन किए बिना आयोग के स्तर पर इसमें पूर्वजों के लिंकेज और SIR मैपिंग जैसी बाध्यकारी शर्तें नहीं जोड़ी जा सकतीं।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 324 एवं टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995 – संविधान पीठ):
- सर्वोच्च न्यायालय की 5-जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दो चुनाव आयुक्तों का दर्जा समान है (Equal in Status)। सीईसी केवल ‘समानों में प्रथम’ (Primus Inter Pares) हैं, कोई सर्वोच्च प्राधिकारी नहीं। आयोग के निर्णय सर्वसम्मति से होने चाहिए और मतभेद की स्थिति में बहुमत (Majority View) से निर्णय लिया जाना अनिवार्य है।
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960):
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28 के तहत केंद्र सरकार को चुनाव आयोग के परामर्श से नियम और फॉर्म (जैसे फॉर्म 6, 7, 8) बनाने की शक्ति प्राप्त है। आयोग अपने कार्यकारी निर्देशों द्वारा वैधानिक फॉर्म में ऐसी नई घोषणाएं या शर्तें नहीं जोड़ सकता जो किसी नागरिक के मतदाता सूची में शामिल होने के विधिक अधिकार को अत्यधिक जटिल या सीमित करती हों।
- संविधान का अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार):
- प्रत्येक 18 वर्ष के भारतीय नागरिक को मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का संवैधानिक अधिकार है। पंजीकरण की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून सम्मत होनी चाहिए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: प्रिया मिश्रा व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) संख्या: 1291/2026 – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (विशेष 3-जज खंडपीठ)
- आदेश / मौखिक निर्देश की तिथि: 12 अक्टूबर 2026
- याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा
- संबद्ध पक्षकार: भारत निर्वाचन आयोग (ECI), मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्तगण
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचार), अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग का अधीक्षण व नियंत्रण) एवं अनुच्छेद 326 (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार)
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (फॉर्म 6 – नए मतदाताओं के पंजीकरण हेतु)
- संबद्ध ऐतिहासिक नजीरें:
- टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995, SC) — ‘चुनाव आयोग में सामूहिक विचार-विमर्श और बहुमत का सिद्धांत अनिवार्य है।’
- बिहार SIR निर्णय (27 मई 2026, SC) — ‘मई 2026 के फैसले में नए फॉर्म 6 के विधिक स्वरूप पर कोई न्यायिक राय नहीं दी गई थी।’
- अंतिम परिणाम: याचिका पर औपचारिक नोटिस जारी; स्पष्ट किया गया कि नए फॉर्म 6 की वैधता पर कोई फैसला नहीं हुआ है और अदालत स्वतंत्र रूप से इसका परीक्षण करेगी; अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को तय।
Form 6 Row: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, जस्टिस जयमाल्या बागची एवं जस्टिस वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | प्रिया मिश्रा एवं पूर्व मंत्री पी.सी. शर्मा (अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका) |
| मुख्य मुद्दा | 1. नए फॉर्म 6/घोषणा पत्र में पूर्व SIR मैपिंग का प्रश्न जोड़ना 2. मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा सामूहिक निर्णय (Collective Decision-making) के नियमों का उल्लंघन |
| अदालत का स्पष्टीकरण | मई 2026 में बिहार SIR फैसले के समय नया फॉर्म 6 अस्तित्व में ही नहीं था। अदालत ने इसकी वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया है। |
| अगली सुनवाई | 27 अक्टूबर 2026 (अन्य संबंधित याचिकाओं के साथ) |

