उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष और टिप्पणियां
- “जहाँ शरीर सक्षम और दिल तैयार है”: हाईकोर्ट ने मानवीय संवेदनाओं और संवैधानिक अधिकारों का सामंजस्य बिठाते हुए कहा:“जहाँ शरीर सक्षम रहता है और दिल तैयार रहता है, वहाँ माता-पिता बनने की इच्छा को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि उसका समय बीत चुका है।”
- धारा 21(g) का कठोर/यांत्रिक विश्लेषण गलत:जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने स्पष्ट किया कि ART अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो यह कहे कि यदि एक जीवनसाथी (पति) आयु सीमा पार कर लेता है, तो दूसरा जीवनसाथी (पत्नी)—जो स्वतंत्र रूप से आयु मानदंड पूरा करती है—स्वचालित रूप से अपात्र हो जाएगी।“पति की उम्र को पत्नी के ART उपचार के लिए पूर्ण प्रतिबंध मानना कानून में एक ऐसी ‘संयुक्त आयु सीमा’ (Composite Age Restriction) को लागू करना होगा जो अधिनियम की धारा 21(g) में स्पष्ट रूप से परिकल्पित ही नहीं है।”
- अनुच्छेद 21 के तहत ‘प्रजनन स्वायत्तता’ (Reproductive Autonomy):अदालत ने जोर देकर कहा कि प्रजनन का चयन और माता-पिता बनने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अभिन्न हिस्सा है। एक कठोर और यांत्रिक व्याख्या से महिला के प्रजनन विकल्पों को छीनना असंगत है।
- उपचार के दौरान उम्र 50 वर्ष पार होने पर छूट:अदालत ने एक और महत्वपूर्ण राहत देते हुए निर्देश दिया कि यदि कोर्ट के आदेश के तहत चल रहे उपचार चक्र के दौरान महिला की उम्र 50 वर्ष (महिलाओं के लिए तय ऊपरी सीमा) पार भी हो जाती है, तो केवल 50 की उम्र छूने के आधार पर इलाज नहीं रोका जाएगा, जब तक कि डॉक्टर इसे चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित मानते हैं।
बिलासपुर (छत्तीसगढ़): सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (Assisted Reproductive Technology (Regulation) Act, 2021 – ART Act) के अंतर्गत निर्धारित ऊपरी आयु सीमा की वैधानिक व्याख्या, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) व माता-पिता बनने के अधिकार, तथा पति द्वारा आयु सीमा पार कर लेने पर स्वतंत्र रूप से पात्र पत्नी के इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) उपचार के विधिक अधिकार पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।
विवाहित निःसंतान दंपति को आईवीएफ प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि ART कानून की धारा 21(g) में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है जो यह कहे कि यदि किसी एक जीवनसाथी ने आयु सीमा पार कर ली है, तो दूसरा जीवनसाथी—जो स्वतंत्र रूप से निर्धारित आयु सीमा के भीतर आता है—स्वतः उपचार के लिए अयोग्य हो जाएगा। अदालत ने 22 वर्षों से विवाहित निःसंतान दंपति को आईवीएफ प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है, भले ही पति की उम्र कानून में पुरुषों के लिए निर्धारित ऊपरी आयु सीमा (55 वर्ष) को पार कर 57 वर्ष हो चुकी थी।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं व्याख्या
1. ‘शरीर सक्षम और मन इच्छुक हो तो माता-पिता बनने की इच्छा खारिज नहीं की जा सकती’
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने माता-पिता बनने की मानवीय व संवैधानिक आकांक्षा को रेखांकित करते हुए भावनात्मक व विधिक टिप्पणी की:“जहां शरीर सक्षम बना रहता है और दिल/मन इच्छुक रहता है (Where the body remains capable and the heart remains willing), वहां माता-पिता बनने की इच्छा को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि इसका समय बीत चुका है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अभिन्न पहलू प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) है।”
2. धारा 21(g) में ‘संयुक्त आयु प्रतिबंध’ (Composite Age Restriction) जोड़ना अनुचित:
अदालत ने अधिनियम के विधिक प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए माना:“याचिकाकर्ता संख्या 2 (पति) की आयु को याचिकाकर्ता संख्या 1 (पत्नी) के एआरटी उपचार के लिए पूर्ण बाधा (Absolute Bar) मानना ART अधिनियम की धारा 21(g) में एक ‘संयुक्त आयु प्रतिबंध’ (Composite Age Restriction) को जबरन जोड़ने के समान होगा, जिसकी परिकल्पना इस वैधानिक प्रावधान में स्पष्ट रूप से नहीं की गई है। ऐसी कठोर व्याख्या का परिणाम यह होगा कि याचिकाकर्ता संख्या 1 (पत्नी) द्वारा स्वतंत्र रूप से निर्धारित आयु मानदंड को पूरा करने के बावजूद उसके प्रजनन विकल्प और अधिकार को काफी हद तक छीन लिया जाएगा।”
3. यांत्रिक व्याख्या से माता-पिता बनने के अधिकार का हनन नहीं होना चाहिए:
- पीठ ने जोर दिया कि आयु सीमा की कठोर और यांत्रिक (Rigid and mechanical) व्याख्या उस स्थिति में लागू नहीं की जानी चाहिए जहां एक जीवनसाथी स्वतंत्र रूप से पात्रता पूरी करता हो और प्रस्तावित उपचार चिकित्सकीय रूप से अनुमेय (Medically Permissible) हो।
- अदालत ने नोट किया कि पति कानून के विपरीत जाकर अपने लिए कोई स्वतंत्र पात्रता नहीं मांग रहा है, बल्कि दंपति पति की सहमति व भागीदारी से और पत्नी के माध्यम से एआरटी उपचार को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
4. उपचार के दौरान महिला के 50 वर्ष पार करने पर भी रोक नहीं:
- अदालत ने एक दूरगामी निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि यदि वर्तमान न्यायिक आदेश के अनुपालन में चल रहे उपचार चक्र (Ongoing Treatment Cycle) के दौरान महिला की आयु 50 वर्ष को पार कर जाती है, तो केवल 50 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेना अपने आप में उपचार को रोकने का आधार नहीं बनेगा, बशर्ते यह चिकित्सकीय रूप से उचित हो और अन्य विधिक आवश्यकताएं पूरी होती हों।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: 22 साल का संघर्ष
| विवरण | तथ्य एवं कालक्रम |
| विवाह एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि | दंपति का विवाह लगभग 22 वर्ष पूर्व हुआ था और उनकी कोई जीवित संतान नहीं है। |
| पिछला चिकित्सीय इतिहास | महिला ने 2013 में उपचार कराया था और 2015 में गर्भधारण किया था, परंतु लगभग 4 महीने के गर्भ के बाद दुर्भाग्यपूर्ण गर्भपात (Miscarriage) हो गया था। |
| एआरटी क्लिनिक का रुख | दंपति ने आईवीएफ के लिए एआरटी क्लिनिक से संपर्क किया। चिकित्सकीय परीक्षण और काउंसलिंग के बाद क्लिनिक ने उन्हें मेडिकली उपयुक्त पाया। |
| अस्वीकृति का कारण | क्लिनिक और सक्षम अधिकारियों ने अनुमति देने से इनकार कर दिया क्योंकि पति की आयु 57 वर्ष थी, जो कानून में पुरुषों के लिए निर्धारित 55 वर्ष की सीमा से अधिक थी (जबकि पत्नी की आयु 50 वर्ष के भीतर थी)। |
| हाईकोर्ट में चुनौती | दंपति ने इस अस्वीकृति आदेश को मनमाना और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताते हुए उच्च न्यायालय में चुनौती दी। |
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है ART अधिनियम, 2021?
- सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 की धारा 21(g):
- धारा 21(g) के अनुसार, क्लिनिक केवल उन्हीं व्यक्तियों को एआरटी सेवाएं प्रदान कर सकते हैं जब:
- महिला की आयु: 21 वर्ष से अधिक और 50 वर्ष से कम हो।
- पुरुष की आयु: 21 वर्ष से अधिक और 55 वर्ष से कम हो।
- धारा 21(g) के अनुसार, क्लिनिक केवल उन्हीं व्यक्तियों को एआरटी सेवाएं प्रदान कर सकते हैं जब:
- अदालत द्वारा वैधानिक व्याख्या:
- कानून दोनों के लिए अलग-अलग आयु सीमाएं तय करता है, लेकिन यह स्पष्ट रूप से नहीं कहता कि पति की आयु 55 पार होते ही पत्नी की गर्भाधान क्षमता और इलाज का अधिकार भी स्वतः समाप्त हो जाएगा।
- जहां पत्नी निर्धारित 50 वर्ष की सीमा के भीतर है और चिकित्सा विशेषज्ञों ने उसे गर्भधारण के लिए शारीरिक रूप से सक्षम पाया है, वहां पति की उम्र को आधार बनाकर पत्नी के मातृत्व के अधिकार को नकारना असंगत और अन्यायपूर्ण है।
- संविधान का अनुच्छेद 21 एवं प्रजनन अधिकार (सुचित्रा श्रीवास्तव बनाम चंडीगढ़ प्रशासन, 2009 – SC):
- सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि महिला का प्रजनन विकल्प चुनने का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत निजता, गरिमा और शारीरिक अखंडता के अधिकार का मूल हिस्सा है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: दंपति (याचिकाकर्तागण) बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- संबद्ध पक्षकार: 22 वर्षों से विवाहित निःसंतान दंपति (पति की आयु 57 वर्ष, पत्नी 50 वर्ष से कम)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (ART Act, 2021) की धारा 21(g)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार, प्रजनन स्वायत्तता एवं मातृत्व का अधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- प्रजनन स्वायत्तता और लचीली व्याख्या: ‘पति की ऊपरी आयु सीमा स्वतंत्र रूप से पात्र पत्नी के एआरटी उपचार में पूर्ण बाधा नहीं बन सकती; कानून की यांत्रिक व्याख्या से मातृत्व के अधिकार को नहीं छीना जा सकता।’
- अंतिम परिणाम: अस्वीकृति आदेश रद्द; एआरटी क्लिनिक और अधिकारियों को सभी वैधानिक व चिकित्सा सुरक्षा उपायों के अधीन दंपति को आईवीएफ उपचार आगे बढ़ाने की स्पष्ट अनुमति देने का निर्देश जारी।
IVF Right: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (High Court of Chhattisgarh) |
| पीठ | न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद |
| याचिकाकर्ता | 22 साल से शादीशुदा दंपत्ति (पत्नी की उम्र पात्रता सीमा के भीतर, पति की उम्र 57 वर्ष) |
| संबंधित कानून | सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 की धारा 21(g) |
| मुख्य कानूनी आधार | संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत ‘प्रजनन स्वायत्तता’ (Reproductive Autonomy) मौलिक अधिकार है। |
| अदालत का आदेश | क्लिनिक और अधिकारियों को आईवीएफ (IVF) प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति देने का कड़ा निर्देश। |

