उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष और कड़े शब्द
- अवैध गिरफ्तारी पर कोर्ट की मजबूरी:न्यायमूर्ति एन. रमेश ने पुलिस की लापरवाही पर कड़ा एतराज जताते हुए कहा:“जब कोई गिरफ्तारी प्रक्रियागत रूप से दूषित (Vitiated) होती है, तो अदालत के पास आरोपी को रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता—चाहे आरोप कितना भी गंभीर क्यों न हो। गंभीर मामलों में आरोपी इसलिए रिहा हो रहे हैं क्योंकि मामला कमजोर है, बल्कि इसलिए क्योंकि पुलिस ने गिरफ्तारी के समय वह नहीं किया जो कानून की मंशा है।”
- पीड़ितों का नुकसान और पुलिस की उदासीनता:अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारियों की इस अज्ञानता या उदासीनता का खामियाजा 262 अभिभावकों (पीड़ितों) और निष्पक्ष जांच प्रणाली को भुगतना पड़ रहा है।
- मौखिक विवरण लिखित कारण का स्थान नहीं ले सकता:पुलिस के इस तर्क को खारिज करते हुए कि आरोपी को अंग्रेजी में मेमो समझा दिया गया था, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस मेमो में खुद कोई कारण नहीं लिखे हों, उसे मौखिक रूप से समझाना कानून की नजर में ‘लिखित रूप में गिरफ्तारी के कारणों का संचार’ (Communication of Grounds in Writing) नहीं माना जा सकता।
- उत्तर भारतीय होने के आधार पर फरार होने की आशंका पर सवाल:अदालत ने पुलिस द्वारा यह तर्क दिए जाने की भी तीखी आलोचना की कि याचिकाकर्ता “उत्तर भारतीय” है इसलिए उसके फरार होने की संभावना थी।
DGP को मद्रास हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश
- विभागीय कार्रवाई का आदेश: तमिलनाडु DGP को निर्देश दिया गया है कि वे सभी पुलिस थानों में परिपत्र (Circular) जारी करें कि गिरफ्तारी के विस्तृत लिखित कारण न देना पुलिस अधिकारी की गंभीर चूक माना जाएगा और उन पर विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
- पुराने फॉर्म्स पर रोक: 7 सितंबर के कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद पुराने अरेस्ट फॉर्म इस्तेमाल करने पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने नए व विस्तृत अरेस्ट मेमो लागू करने का आदेश दिया।
- अनुपालन रिपोर्ट: राज्य सरकार और DGP को 10 नवंबर 2026 तक इस निर्देश के अनुपालन की रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया है।
चेन्नई: संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के आधारों को लिखित रूप में सूचित करने की अनिवार्य संवैधानिक शर्त (Constitutional Mandate of Communicating Grounds of Arrest in Writing), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 47 (पूर्ववर्ती CrPC धारा 50), प्रबीर पुरकायस्थ और पंकज बंसल मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित बाध्यकारी दिशानिर्देशों का उल्लंघन, तथा पुलिस की प्रक्रियात्मक लापरवाही के कारण अवैध हुई रिमांड (Illegal Remand) पर मद्रास हाईकोर्ट ने एक अत्यंत कड़ा और ऐतिहासिक आदेश पारित किया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब गिरफ्तारी की प्रक्रिया ही कानूनी रूप से दूषित (Vitiated) हो जाती है, तो आरोप चाहे कितने भी जघन्य या गंभीर क्यों न हों, अदालत के पास आरोपी को रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। न्यायमूर्ति एन. रमेश की एकल पीठ ने तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) को परिपत्र जारी कर यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि आरोपी को गिरफ्तारी के लिखित आधार न देने वाले जांच अधिकारियों के खिलाफ कर्तव्य में घोर लापरवाही (Dereliction of Duty) मानते हुए अनिवार्य विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई (Departmental Proceedings) शुरू की जाए।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘कानून की अवहेलना से गंभीर मामलों में भी आरोपी छूट रहे हैं; भुगतना पीड़ितों को पड़ता है’
न्यायमूर्ति एन. रमेश ने पुलिस की उदासीनता और जांच प्रक्रियाओं में प्रक्रियात्मक खामियों पर तीखी चिंता व्यक्त करते हुए दर्ज किया: “जब कोई गिरफ्तारी कानूनन दूषित (Vitiated) हो जाती है, तो अदालत के पास आरोपी को रिहा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता, भले ही उस पर लगे आरोप कितने भी गंभीर (However grave the accusation) क्यों न हों। अत्यंत गंभीर मामलों में भी आरोपियों को इसलिए नहीं छोड़ा जा रहा है कि उनके खिलाफ मामला कमजोर है, बल्कि इसलिए छोड़ा जा रहा है क्योंकि पुलिस ने गिरफ्तारी के समय वह नहीं किया जो कानून की स्पष्ट मांग थी। इसका खामियाजा अंततः पीड़ितों को भुगतना पड़ता है—यहाँ इस मामले में 262 माता-पिता को—और इससे निष्पक्ष जांच की बुनियाद को झटका लगता है। यह समझ से परे है कि यह अज्ञानता का परिणाम है या पुलिस की संवेदनहीन उदासीनता का। दोनों ही स्थितियों में पुलिस को प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है, और जो अधिकारी यह चूक करता है, उसे इसकी जवाबदेही उठानी ही होगी।”
2. ‘जिस मेमो में आधार ही न हों, उसकी मौखिक व्याख्या लिखित सूचना नहीं मानी जा सकती’:
- पुलिस ने तर्क दिया था कि अंकुर जैन को तमिल में छपा एक गिरफ्तारी मेमो दिया गया था और उसकी सामग्री अंग्रेजी में बोलकर समझाई गई थी।
- अदालत ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए व्यवस्था दी:“एक ऐसे मेमो की केवल मौखिक व्याख्या करना (Oral Explanation) जिसमें स्वयं गिरफ्तारी के कोई विस्तृत आधार दर्ज ही न हों, उस भाषा में लिखित में आधार संप्रेषित करना कतई नहीं माना जा सकता जिसे गिरफ्तार व्यक्ति समझता हो।”
- अदालत ने पाया कि मेमो में केवल अपराध संख्या (Crime Number) और दंडात्मक धाराएं लिखी थीं, जबकि उसमें आरोपी की कथित विशिष्ट भूमिका का कोई उल्लेख नहीं था।
3. ‘उत्तर भारतीय होने के कारण भाग जाएगा’ जैसी पुलिसिया दलील पर फटकार:
- हाईकोर्ट ने पुलिस के इस पूर्वाग्रहपूर्ण तर्क की कड़ी भर्त्सना की जिसमें कहा गया था कि चूंकि आरोपी “उत्तर भारतीय” (North Indian) है, इसलिए उसके फरार होने का जोखिम है।
- अदालत ने ऐसी टिप्पणियों को अनुचित और गैर-पेशेवर करार देते हुए गिरफ्तारी और उसके बाद की न्यायिक रिमांड को पूरी तरह गैर-कानूनी (Illegal) घोषित किया।
4. पुराने फॉर्म बदलने के अदालती आदेश की अनदेखी:
- अदालत ने क्षोभ व्यक्त किया कि 7 सितंबर को दिए गए स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, जिसमें पुराने ढर्रे के गिरफ्तारी फॉर्मों को बदलकर विस्तृत लिखित आधार दर्ज करने वाले नए प्रारूप लागू करने को कहा गया था, पुलिस पुराने फॉर्मों का ही इस्तेमाल कर रही है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: FIITJEE और 262 अभिभावकों से ₹2.62 करोड़ की धोखाधड़ी
| विवरण | तथ्य एवं घटनाक्रम |
| संस्थान एवं स्थान | एफआईआईटीजेईई (FIITJEE Limited) द्वारा कोयंबटूर स्थित सुगुना पीआईपी स्कूल (Suguna PIP School) के सहयोग से कोचिंग कार्यक्रम। |
| धोखाधड़ी का आरोप | आरोप है कि जेईई (JEE) और नीट (NEET) कोचिंग में बच्चों का दाखिला कराने वाले 262 अभिभावकों से ₹1-1 लाख की रिफंडेबल कॉशन मनी (कुल ₹2.62 करोड़) एकत्र की गई। कोर्स खत्म होने के बाद यह धरोहर राशि वापस नहीं लौटाई गई। |
| प्राथमिकी दर्ज | अभिभावकों की शिकायतों पर पुलिस ने मई 2026 में धोखाधड़ी (Cheating) का आपराधिक मामला दर्ज किया। |
| आरोपी की भूमिका | अंकुर कुमार जैन — FIITJEE के तमिलनाडु रीजनल मैनेजिंग पार्टनर। उन पर कंपनी की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर करने का आरोप था। |
| औपचारिक गिरफ्तारी | जैन को 11 अगस्त 2026 को पुझल केंद्रीय कारागार (Puzhal Central Prison) से औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया गया, जहां वह किसी अन्य मामले में पहले से ही बंद थे। |
| कानूनी चुनौती | वरिष्ठ अधिवक्ता ए. रमेश के माध्यम से जैन ने हाईकोर्ट में जमानत अर्जी दाखिल कर दलील दी कि वह केवल एक वेतनभोगी कर्मचारी हैं और उन्हें तमिल भाषा का अप्रमाणिक मेमो दिया गया, जिसे वे पढ़ भी नहीं सकते थे। |
उच्च न्यायालय द्वारा जारी अंतिम निर्देश
- आरोपी को जमानत: गिरफ्तारी और रिमांड की वैधानिक प्रक्रिया शून्य होने के आधार पर अंकुर कुमार जैन को नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया।
- तमिलनाडु DGP को कड़ा निर्देश: पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया गया कि वे राज्यभर के पुलिस अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट सर्कुलर/निर्देश जारी करें, जिसमें यह अनिवार्य किया जाए कि:
- किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसके अपराध के ठोस और लिखित आधार (Detailed Written Grounds of Arrest) उस भाषा में दिए जाएं जिसे वह समझता हो।
- इस संवैधानिक दायित्व का पालन न करने वाले जांच अधिकारी (IO) के खिलाफ कर्तव्य में घोर लापरवाही के तहत विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जाएगी।
- अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report): हाईकोर्ट ने DGP को इस निर्देश पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने के लिए मामले को 10 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध किया है।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 22(1) — मौलिक अधिकार:
- किसी भी गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों से यथाशीघ्र अवगत कराए बिना हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
- सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क निर्णय (पंकज बंसल v. भारत संघ [2023] एवं प्रबीर पुरकायस्थ v. राज्य [2024]):
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित किया है कि केवल मौखिक रूप से बताना या केवल एफआईआर की धाराएं लिख देना पर्याप्त नहीं है।
- आरोपी को लिखित रूप में वे तथ्यात्मक आधार देने होंगे जिनके आधार पर पुलिस ने उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छीनने का निर्णय लिया है, ताकि वह प्रभावी ढंग से अपने वकील से परामर्श कर सके और जमानत का आवेदन कर सके।
- गिरफ्तारी अवैध तो रिमांड स्वतः शून्य:
- यदि प्रारंभिक गिरफ्तारी ही असंवैधानिक है, तो मजिस्ट्रेट द्वारा उस आधार पर दी गई बाद की न्यायिक रिमांड या पुलिस हिरासत का आदेश भी स्वतः गैर-कानूनी (Void ab initio) हो जाता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अंकुर कुमार जैन बनाम राज्य [आपराधिक मूल याचिका / जमानत याचिका – मद्रास उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति एन. रमेश (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- अनुपालन रिपोर्ट की अगली तिथि: 10 नवंबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (अंकुर जैन) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता ए. रमेश एवं अधिवक्ता आर. अश्विन
- राज्य (तमिलनाडु पुलिस) की ओर से: सरकारी अधिवक्ता एम.एम.आई. खलील
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 22(1) (गिरफ्तारी के कारणों को जानने का मौलिक अधिकार)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 47 (पूर्ववर्ती CrPC धारा 50 – गिरफ्तारी के आधार सूचित करने का कर्तव्य)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 318(4) / IPC 420 (धोखाधड़ी)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- पंकज बंसल बनाम भारत संघ (2023, SC) एवं प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (2024, SC) — ‘गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उस भाषा में सौंपना अनिवार्य है जिसे आरोपी समझता हो; इस प्रक्रियात्मक चूक से गिरफ्तारी अवैध हो जाती है।’
- अंतिम परिणाम: जमानत याचिका स्वीकार; गिरफ्तारी प्रक्रियात्मक रूप से अवैध करार; तमिलनाडु डीजीपी को दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच का सर्कुलर जारी करने और 10 नवंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश।
Written Grounds: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (High Court of Madras) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति एन. रमेश |
| याचिकाकर्ता | अंकुर कुमार जैन (FIITJEE तमिलनाडु रीजनल मैनेजिंग पार्टनर) |
| मुख्य आरोप | 262 अभिभावकों से JEE/NEET कोचिंग के नाम पर ₹2.62 करोड़ की कथित धोखाधड़ी |
| संवैधानिक मुद्दा | गिरफ्तारी के समय आरोपी को उसकी समझ में आने वाली भाषा में लिखित कारण न देना (Article 22(1) / BNSS 47) |
| अदालत का आदेश | गिरफ्तारी और रिमांड अवैध घोषित, जमानत मंजूर; लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्देश। |
| अनुपालन रिपोर्ट | 10 नवंबर 2026 को अगली सुनवाई |

