Wednesday, October 14, 2026
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RTI Act: भ्रष्टाचार के मामलों में सतर्कता एजेंसियां RTI से पूर्ण छूट का दावा नहीं कर सकतीं; बंद जांच के रिकॉर्ड सौंपने का तमिलनाडु सूचना आयोग का आदेश बरकरार

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  1. धारा 24(4) के तहत भ्रष्टाचार अपवाद (Corruption Exception):न्यायमूर्ति हेमंत चंदनगौडर ने निर्णय में स्पष्ट किया: “विस्तृत जांच DVAC द्वारा जांचे गए भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित है। इसलिए, RTI अधिनियम की धारा 24(4) का सहारा लेकर मांगी गई जानकारी को पूरी तरह रोकने (Blanket Bar) के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता।”
  2. आंतरिक निर्देश RTI एक्ट को निष्प्रभावी नहीं कर सकते:कोर्ट ने माना कि DVAC मैन्युअल जैसे विभागीय या प्रशासनिक निर्देश (Internal Administrative Instructions) संसद द्वारा पारित RTI एक्ट के दायरे से बाहर जाकर नई छूट या गोपनीयता की शर्तें नहीं बना सकते।
  3. सामान्य या काल्पनिक खतरा काफी नहीं (Section 8(1)(g)):राज्य सरकार के ‘गवाहों की सुरक्षा के खतरे’ वाले तर्क पर कोर्ट ने कहा कि बिना किसी ठोस सबूत के केवल एक सामान्य दावा करना धारा 8(1)(g) की छूट पाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
  4. विभाज्यता का सिद्धांत (Principle of Severability – Section 10):अदालत ने राज्य के इस तर्क को खारिज कर दिया कि चूंकि फाइलें बहुत मोटी हैं, इसलिए तीसरे पक्षों की जानकारी छिपाना मुश्किल होगा। कोर्ट ने कहा कि धारा 10 के तहत ‘विभाज्यता लागू करने’ की मेहनत से बचने के लिए सार्वजनिक जानकारी को रोका नहीं जा सकता।
  5. जांच बंद होने का लाभ:चूंकि पूर्व DGP के खिलाफ जांच आखिरकार उनके पक्ष में बंद (Closed) हो चुकी थी, इसलिए उन्हें अपने खिलाफ हुई कार्यवाही के रिकॉर्ड प्राप्त करने का पूरा अधिकार है।

चेन्नई: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005 – RTI Act) की धारा 24(4) के तहत सुरक्षा एवं खुफिया संगठनों को प्राप्त छूट की सीमाएं, भ्रष्टाचार के आरोपों और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी सूचनाओं के प्रकटीकरण की अनिवार्यता (Proviso to Section 24(4)), धारा 8(1)(g) के तहत गवाहों की सुरक्षा के नाम पर सामान्य दावे की अस्वीकार्यता, तथा आंतरिक प्रशासनिक नियमावली (DVAC Manual) बनाम वैधानिक RTI कानून के टकराव पर मद्रास हाईकोर्ट ने एक पारदर्शी और मील का पत्थर साबित होने वाला निर्णय दिया है।

सेवानिवृत्त DGP एस.आर. जांगिड़ को उनके विरुद्ध संचालित भ्रष्टाचार जांच से संबंधित अभिलेख

न्यायमूर्ति हेमंत चंदनगौदर की एकल पीठ ने तमिलनाडु सरकार द्वारा राज्य सूचना आयोग (TNSIC) के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका को खारिज करते हुए सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक (DGP) एस.आर. जांगिड़ को उनके विरुद्ध संचालित भ्रष्टाचार जांच से संबंधित अभिलेख, रिपोर्ट और बयान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि जिस मामले की जांच अधिकारी के पक्ष में बंद (Closed in his favour) हो चुकी है, उस जांच के रिकॉर्ड पाने का उसे पूर्ण विधिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (Directorate of Vigilance and Anti-Corruption – DVAC) भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़े मामलों में सूचना देने से पूर्ण छूट का दावा नहीं कर सकता।

उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘धारा 24(4) भ्रष्टाचार के आरोपों की जानकारी मांगने में पूर्ण बाधा नहीं बन सकती’

न्यायमूर्ति हेमंत चंदनगौदर ने RTI अधिनियम की धारा 24(4) के परंतुक (Proviso) की व्याख्या करते हुए दर्ज किया: “डीवीएसी द्वारा की गई विस्तृत जांच (Detailed Enquiry) भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच से संबंधित है। अतः धारा 24(4) को द्वितीय प्रतिवादी (सेवानिवृत्त डीजीपी) द्वारा मांगी गई जानकारी के रास्ते में एक पूर्ण विधिक बाधा (Complete Bar) के रूप में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। यद्यपि धारा 24(4) के तहत DVAC जैसी एजेंसियों को सामान्य तौर पर अधिनियम से छूट प्राप्त है, परंतु यह छूट भ्रष्टाचार के आरोपों और मानवाधिकार उल्लंघनों से जुड़ी सूचनाओं पर विस्तारित नहीं होती है।”

2. ‘गवाहों की सुरक्षा का सामान्य दावा धारा 8(1)(g) आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं’:

राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि दस्तावेज सार्वजनिक करने से गवाहों और गोपनीय स्रोतों की जान को खतरा हो सकता है। अदालत ने इसे खारिज करते हुए व्यवस्था दी: “एक सामान्य दावा (General Assertion) कि प्रकटीकरण से गवाहों या तीसरे पक्षों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है, धारा 8(1)(g) को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

  • पीठ ने पाया कि राज्य सरकार अदालत के समक्ष ऐसा कोई विशिष्ट साक्ष्य या सामग्री पेश करने में विफल रही जिससे यह साबित हो सके कि किसी गवाह को कोई ठोस या वास्तविक खतरा था।

3. आंतरिक मैनुअल RTI के वैधानिक प्रावधानों को सीमित नहीं कर सकता:

सरकार ने DVAC मैनुअल के नियम 29 का हवाला देते हुए कहा था कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री गोपनीय होती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया: “जांच के दौरान एकत्र की गई जानकारी को गोपनीय रखने का निर्देश देने वाला कोई भी आंतरिक प्रशासनिक निर्देश (Internal Administrative Instruction) RTI अधिनियम में स्पष्ट रूप से मान्यता प्राप्त छूटों से परे कोई नई छूट नहीं बना सकता।”

4. ‘दस्तावेज भारी होने या विवरण छिपाने की मशक्कत छूट का आधार नहीं बन सकती’:

राज्य सरकार की इस दलील पर कि दस्तावेज अत्यधिक विशाल हैं और अन्य अधिकारियों के नाम छिपाना (Masking) बहुत कठिन होगा, अदालत ने कड़ा रुख अपनाया: “वैधानिक पृथक्करणीयता (Statutory Requirement of Severability – Section 10) को लागू करने में लगने वाला प्रयास और मशक्कत किसी अन्य रूप से प्रकटीकरण योग्य जानकारी को छूट प्राप्त जानकारी में नहीं बदल सकती।”

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं कालक्रम

विवरणतथ्य एवं कालक्रम
संबंधित अधिकारीएस.आर. जांगिड़, आईपीएस (सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक – DGP, तमिलनाडु)।
जांच की पृष्ठभूमिडीवीएसी (DVAC) ने जांगिड़ के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की विस्तृत जांच (Detailed Enquiry) की थी, जो अंततः उनके पक्ष में बंद (Closed) कर दी गई।
RTI आवेदन (जनवरी 2021)जांगिड़ ने 30 दिसंबर 2013 और 6 अगस्त 2015 की जांच रिपोर्टों, गवाहों के बयानों, सरकार द्वारा मांगी गई स्पष्टीकरणों और जांच के दौरान जुटाए गए दस्तावेजों की प्रतियां मांगीं।
डीवीएसी द्वारा अस्वीकृतिडीवीएसी ने धारा 24(4) (छूट प्राप्त एजेंसी) और धारा 8(1)(g) (गवाहों की सुरक्षा व गोपनीय स्रोत) का हवाला देकर सूचना देने से इनकार कर दिया।
राज्य सूचना आयोग का आदेश (मई 2024)तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग (TNSIC) ने डीवीएसी के आदेश को पलटते हुए निर्देश दिया कि दो अन्य अधिकारियों के नाम और संवेदनशील विवरण छिपाकर (Masking) जांगिड़ को रिकॉर्ड सौंपे जाएं।
हाईकोर्ट में चुनौतीतमिलनाडु सरकार ने सूचना आयोग के आदेश को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

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उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश एवं सुरक्षा मानक

अदालत ने राज्य सूचना आयोग के आदेश को यथावत बरकरार रखते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. अभिलेखों का प्रकटीकरण: डीवीएसी जांगिड़ के खिलाफ हुई जांच से संबंधित आवश्यक रिपोर्ट और सामग्री उपलब्ध कराएगी।
  2. मास्किंग (Severability under Section 10): जांच रिकॉर्ड में उल्लिखित अन्य दो अधिकारियों के नाम और पहचान योग्य व्यक्तिगत विवरणों को विधिवत रूप से छिपाया (Mask) जाएगा।
  3. तृतीय पक्ष परामर्श (Section 11): जहां भी लागू हो, अधिनियम की धारा 11 के तहत वैधानिक तीसरे पक्ष परामर्श की प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।
  4. असीमित अधिकार नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश जांच फाइल के प्रत्येक पन्ने को पाने का ‘अप्रतिबंधित अधिकार’ नहीं देता; असंबंधित तीसरे पक्षों की विशुद्ध रूप से निजी जानकारी की गोपनीयता बरकरार रखी जाएगी।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है RTI कानून?

  • RTI अधिनियम की धारा 24(4) और उसका परंतुक (Proviso):
    • धारा 24(4) राज्य सरकारों को अधिसूचना द्वारा खुफिया और सुरक्षा संगठनों को आरटीआई से बाहर रखने का अधिकार देती है (तमिलनाडु ने DVAC को इस सूची में रखा है)।
    • परंतु धारा 24(4) का पहला परंतुक स्पष्ट रूप से कहता है:“बशर्ते कि भ्रष्टाचार के आरोपों और मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित जानकारी को इस उपधारा के तहत छूट नहीं दी जाएगी।”
    • मद्रास हाईकोर्ट ने इस बात पर मुहर लगाई कि सतर्कता ब्यूरो का पूरा काम ही भ्रष्टाचार की जांच करना है, इसलिए भ्रष्टाचार जांच से संबंधित सूचनाओं पर यह छूट प्रभावी नहीं हो सकती।
  • धारा 10 (पृथक्करणीयता का सिद्धांत – Doctrine of Severability):
    • यदि किसी दस्तावेज का एक हिस्सा गोपनीय या छूट प्राप्त है (जैसे किसी तीसरे व्यक्ति का नाम), तो पूरे दस्तावेज को रोकने के बजाय उस हिस्से को हटाकर/छिपाकर शेष सूचना आवेदक को दी जानी चाहिए।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: तमिलनाडु राज्य बनाम तमिलनाडु राज्य सूचना आयोग एवं एस.आर. जांगिड़ [रिट याचिका (सिविल) – मद्रास उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति हेमंत चंदनगौदर (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • तमिलनाडु सरकार की ओर से: राज्य लोक अभियोजक आर. जॉनसत्यन एवं सरकारी अधिवक्ता एन. पलानीवेल
    • राज्य सूचना आयोग (TNSIC) की ओर से: अधिवक्ता सी. विघ्नेश्वरन
    • प्रतिवादी (सेवानिवृत्त DGP जांगिड़) की ओर से: अधिवक्ता नित्येश नटराज एवं वैभव आर. वेंकटेश
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005) की धारा 24(4) (एजेंसियों को छूट एवं भ्रष्टाचार मामलों में अपवाद), धारा 8(1)(g) (सुरक्षा आधार पर छूट), धारा 10 (पृथक्करणीयता) एवं धारा 11 (तृतीय पक्ष)
    • डीवीएसी मैनुअल — नियम 29 (जांच की गोपनीयता)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • भ्रष्टाचार मामलों में कोई पूर्ण छूट नहीं: ‘RTI की धारा 24(4) के तहत छूट प्राप्त सुरक्षा या सतर्कता संगठन भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़े मामलों में सूचना देने से इनकार नहीं कर सकते; प्रशासनिक मैनुअल वैधानिक संसद-निर्मित कानून से ऊपर नहीं हो सकता।’
  • अंतिम परिणाम: राज्य सरकार की रिट याचिका खारिज; सूचना आयोग का आदेश बरकरार; सेवानिवृत्त डीजीपी को आवश्यक विवरण छिपाकर भ्रष्टाचार जांच के रिकॉर्ड सौंपने का निर्देश।

RTI Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति हेमंत चंदनगौडर
याचिकाकर्तातमिलनाडु सरकार (DVAC)
प्रतिवादीतमिलनाडु राज्य सूचना आयोग एवं सेवानिवृत्त DGP एस.आर. जांगिड़
संबंधित कानूनसूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 24(4), धारा 8(1)(g) एवं धारा 10
अदालत का फैसलाराज्य सरकार की याचिका खारिज; DVAC को तीसरे पक्ष के अधिकारियों का नाम व ब्योरा छिपाकर (Masking) पूर्व DGP को जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश।
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