Tuesday, October 13, 2026
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POCSO Act: पॉक्सो कानून जमीनी वास्तविकताओं की अनदेखी करता है; स्पेशल जजों को सजा तय करने का विवेकाधिकार और सामुदायिक सेवा का विकल्प देने का सुझाव

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष और विधि आयोग को सुझाव

  1. “अज्ञानता में बने परिवारों का विनाश न हो”:अदालत ने 8 अक्टूबर 2026 के अपने फैसले में माना:“कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं है (Ignorance of law is no excuse), लेकिन अगर इस सिद्धांत को विशुद्ध रूप से विद्वतापूर्ण तरीके से लागू किया जाएगा, तो 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की सुरक्षा के नाम पर POCSO एक्ट के तहत ऐसे परिवारों का अनावश्यक विनाश होगा जो गरीबी और अशिक्षा के कारण बने हैं।”
  2. सजा तय करने का विवेकाधिकार (Sentencing Discretion):हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट/विशेष न्यायाधीशों को ऐसी स्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए जहाँ सजा के विवेकाधिकार के अभाव में वे उस व्यक्ति को कठोर सजा देने के लिए मजबूर हों जो वर्तमान में पीड़िता का पति है और उसके बच्चे का पिता है—केवल इसलिए क्योंकि वह बालिग होने से पहले उसके साथ भाग गया था।
  3. सामुदायिक सेवा (Community Service) जैसे वैकल्पिक दंड:पीठ ने सुझाव दिया कि लॉ कमीशन को सामुदायिक सेवा जैसे वैकल्पिक दंडों के प्रावधान की जांच करनी चाहिए ताकि किशोर उम्र में आकर्षण के कारण बने परिवारों और नवजात बच्चों के भविष्य को आपराधिक न्याय प्रणाली के चंगुल से बचाया जा सके।
  4. अदालत का अंतिम आदेश (Release of Corpus):चूंकि लड़की की उम्र का कोई पक्का दस्तावेज (जैसे जन्म प्रमाण पत्र) नहीं था और ऑसिफिकेशन (अस्थि) परीक्षण रिपोर्ट में उसकी उम्र लगभग 18 वर्ष बताई गई थी, इसलिए हाईकोर्ट ने उसे बालिग मानते हुए अदालत परिसर से ही अपने पति के साथ जाने की अनुमति दे दी। हालांकि, पति के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले की सुनवाई कानून के अनुसार चलने का निर्देश दिया।

प्रयागराज: लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (Protection of Children from Sexual Offences Act – POCSO Act) के अनम्य दंडात्मक प्रावधानों (Rigid Penal Provisions), किशोर वय में आपसी सहमति/प्रेम प्रसंग के मामले (Consensual Teenage Romantic Relationships), भारत की जमीनी सामाजिक व आर्थिक वास्तविकताओं (Socio-Economic Realities & Illiteracy), विधि की अनभिज्ञता के सिद्धांत (Ignorance of Law is No Excuse) के संकीर्ण अनुप्रयोग से उपजने वाले अन्याय, तथा विशेष अदालतों के पास सजा तय करने के विवेकाधिकार (Sentencing Discretion) के अभाव पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत गंभीर, विचारोत्तेजक और नीतिगत रूप से दूरगामी फैसला सुनाया है।

पति द्वारा अपनी कथित नाबालिग पत्नी को नारी निकेतन/बाल गृह से मुक्त कराने के लिए दायर याचिका

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने एक पति द्वारा अपनी कथित नाबालिग पत्नी को नारी निकेतन/बाल गृह से मुक्त कराने के लिए दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) का निस्तारण करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। अदालत ने पाया कि दोनों का दो महीने का एक नवजात शिशु है, और मेडिकल/ऑसिफिकेशन टेस्ट (Ossification Test) में लड़की की उम्र लगभग 18 वर्ष पाई गई है। पीठ ने युवती को बालिग मानते हुए उसे अदालत परिसर से ही सीधे अपने पति के साथ जाने की अनुमति दे दी। अदालत ने भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) से आग्रह किया है कि वह पॉक्सो कानून में उपयुक्त विधायी संशोधनों की सिफारिश करे ताकि कानून के कड़ाई से लागू होने पर बेकसूर परिवारों को बिखरने से बचाया जा सके।

उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘लॉ कमीशन संशोधन की सिफारिश करे; जजों को सजा का विवेकाधिकार और सामुदायिक सेवा का विकल्प मिले’

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने विधि आयोग का ध्यान आकर्षित करते हुए दर्ज किया: “इस कानून में ऐसे संशोधन किए जाने पर विचार किया जाना चाहिए, जिनमें असाधारण मामलों में मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उचित सजा का निर्धारण करने के लिए POCSO अदालत के विशेष न्यायाधीश को पर्याप्त विवेकाधिकार (Adequate Sentencing Discretion) प्रदान करना शामिल हो। सामुदायिक सेवा (Community Service) सहित सजा के वैकल्पिक रूपों की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है, ताकि POCSO कानून के प्रावधानों की अनभिज्ञता से उपजी परिस्थितियों में बने किसी परिवार को 18 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं की सुरक्षा के नाम पर अनावश्यक रूप से उजाड़ा (Unnecessarily Disrupted) न जाए।”

2. ‘कानून बनाते समय भारत की सामाजिक वास्तविकताओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया’:

  • पीठ ने रेखांकित किया कि कानून का निर्माण करते समय देश की जमीनी परिस्थितियों की उपेक्षा की गई, जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी अशिक्षित या अर्ध-शिक्षित है, जिसे अपने अधिकारों, कर्तव्यों या किसी आचरण के कानूनी परिणामों का कोई भान नहीं होता।
  • अदालत ने टिप्पणी की:“वर्तमान मामले के तथ्य ऐसी स्थिति को प्रकट करते हैं जहां मानव विकास का स्वाभाविक क्रम (Natural course of human development) कानून की कठोरता (Rigours of law) के साथ सीधे टकराव में आ गया है।लगभग 15 वर्ष की आयु के किसी बच्चे के लिए, शारीरिक और भावनात्मक परिपक्वता प्राप्त करने पर, विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित होना पूरी तरह स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में बच्चे से यह उम्मीद करना कि वह अपने आचरण से उत्पन्न कानूनी दायित्वों को समझेगा, न्यायसंगत नहीं है।”

3. ‘कानून की अनभिज्ञता कोई बहाना नहीं’ के यांत्रिक प्रयोग से न्याय के बजाय अन्याय:

  • अदालत ने स्वीकार किया कि विधिक सिद्धांत के अनुसार कानून की अज्ञानता कोई बचाव नहीं है (Ignorance of law is no excuse)।
  • परंतु अदालत ने सचेत किया:“यदि इस सिद्धांत को विशुद्ध रूप से पांडित्यपूर्ण/यांत्रिक तरीके (Purely Pedantic Manner) से लागू किया जाता है, तो कुछ तथ्यात्मक स्थितियों में POCSO कानून का क्रियान्वयन ऐसे परिणामों को जन्म दे सकता है जो न्याय को आगे बढ़ाने के बजाय अन्याय (Advance Injustice rather than Justice) को बढ़ावा देते प्रतीत होते हैं।”

4. विधायिका की चुप्पी और उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर चिंता:

  • अदालत ने क्षोभ व्यक्त किया कि पॉक्सो कानून के इस अव्यावहारिक पहलू पर विधायिका के समक्ष पहले भी सवाल उठाए गए हैं, लेकिन विधायिका इस विषय पर लगातार मौन बनी हुई है।
  • अदालत ने यूपी के शिक्षा तंत्र पर तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि यह बेहद स्तब्ध करने वाला है कि कक्षा 5 तक पढ़ी लड़की अपनी मातृभाषा में एक अखबार भी नहीं पढ़ सकती और केवल हस्ताक्षर कर पाती है। अदालत ने सवाल किया कि राज्य सरकार उसे 12वीं तक अनिवार्य शिक्षा दिलाने में क्यों विफल रही?

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: भागकर शादी, 2 महीने का बच्चा और मजदूरी की पृष्ठभूमि

विवरणतथ्य एवं घटनाक्रम
पारिवारिक पृष्ठभूमिलड़की का पिता एक अनपढ़ मजदूर है, जो महीने में ₹10,000 से ₹12,000 कमाता है। उसके चार अन्य बच्चे हैं और वह वृद्ध माता-पिता की देखभाल करता है। लड़की केवल 5वीं तक पढ़ी है और हिंदी अखबार भी नहीं पढ़ सकती।
प्रेम विवाह और प्राथमिकीपरिवार की असहमति के कारण दोनों भाग गए और विवाह कर लिया। लड़की के पिता ने नाबालिग होने और हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ‘सपिंड संबंध’ (Sapinda Relationship) होने का दावा करते हुए मामला दर्ज कराया।
संस्थान में निरुद्ध और संतान का जन्मलड़की को 18 वर्ष से कम मानकर बाल गृह (Children’s Home) भेज दिया गया। संस्था में रहने के दौरान ही उसने एक बच्चे को जन्म दिया, जो सुनवाई के समय 2 महीने का नवजात शिशु था। याचिकाकर्ता पति ही उस बच्चे का जैविक पिता है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकापति ने पत्नी को गैर-कानूनी हिरासत से छुड़ाने और बच्चे के साथ पारिवारिक जीवन बहाल करने के लिए हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की।

आयु निर्धारण और उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश

  1. आयु के दस्तावेजी साक्ष्य का अभाव: अदालत ने पाया कि लड़की के नाबालिग होने का कोई भी ठोस, वैधानिक और विश्वसनीय दस्तावेजी रिकॉर्ड (जैसे नगर निगम जन्म प्रमाण पत्र या वैध स्कूल रिकॉर्ड) मौजूद नहीं था।
  2. ऑसिफिकेशन टेस्ट (हड्डी जांच): विश्वसनीय दस्तावेजों के अभाव में मेडिकल बोर्ड द्वारा किए गए ऑसिफिकेशन टेस्ट में लड़की की अनुमानित उम्र लगभग 18 वर्ष निर्धारित की गई।
  3. युवती की रिहाई का आदेश: चूंकि लड़की बालिग पाई गई और उसने स्पष्ट रूप से अपने पति और 2 महीने के बच्चे के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की, अदालत ने उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।“कॉर्पस (याचिकाकर्ता संख्या 2) को अदालत परिसर से ही सीधे अपने पति (याचिकाकर्ता संख्या 1) के साथ जाने की अनुमति दी जाती है।”
  4. ट्रायल कोर्ट को निर्देश: अदालत ने स्पष्ट किया कि पति के खिलाफ लंबित पॉक्सो आपराधिक मामले का विचारण ट्रायल कोर्ट पूरी तरह कानून के अनुसार और केवल रिकॉर्ड पर पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर ही निष्पक्षता से करेगा।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • सहमति से बने किशोर संबंधों में POCSO की कठोरता:
    • पॉक्सो कानून की धारा 3, 4, 5 और 6 में ‘सहमति’ (Consent) का कोई स्थान नहीं है; यदि पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से एक दिन भी कम है, तो शारीरिक संबंध को गंभीर दुष्कर्म (Aggravated Penetrative Sexual Assault) माना जाता है, जिसमें न्यूनतम 20 वर्ष के कठोर कारावास या आजीवन कारावास का अनिवार्य प्रावधान है।
  • सजा के विवेकाधिकार का अभाव (Lack of Sentencing Discretion):
    • भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 4/23 के तहत सामुदायिक सेवा (Community Service) को एक वैकल्पिक सजा के रूप में मान्यता दी गई है, लेकिन POCSO एक विशेष कानून (Special Law) होने के कारण अनिवार्य न्यूनतम सजा थोपता है। न्यायाधीशों के पास यह अधिकार नहीं होता कि वे परिस्थितियों (जैसे विवाह हो जाना या बच्चे का जन्म) को देखते हुए कम सजा दे सकें।
  • लॉ कमीशन की 283वीं रिपोर्ट (पूर्व संदर्भ):
    • विधि आयोग ने अपनी पूर्व रिपोर्ट में भी 16 से 18 वर्ष के बीच के प्रेम प्रसंग वाले मामलों में अदालतों को सजा में कुछ सीमित विवेक देने पर विमर्श किया था, लेकिन कोई अंतिम विधायी संशोधन संसद द्वारा पारित नहीं किया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश विधायिका की इसी अनम्यता पर सीधी चोट करता है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: पति (याचिकाकर्ता संख्या 1) एवं कॉर्पस (याचिकाकर्ता संख्या 2) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट याचिका – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव (खंडपीठ)
  • निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (पति) की ओर से: अधिवक्ता राकेश कुमार मिश्रा
    • राज्य सरकार की ओर से: अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता (AGA) दीपक कपूर
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) — कठोर न्यूनतम दंड प्रावधान
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) / CrPC — हेबियस कॉर्पस एवं आयु परीक्षण सिद्धांत
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — धारा 4 (सामुदायिक सेवा का वैकल्पिक दंड)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट) एवं अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता व पारिवारिक जीवन)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • POCSO में सामाजिक वास्तविकताओं की प्रासंगिकता: ‘किशोरावस्था के स्वाभाविक प्रेम और अशिक्षा से बने परिवारों को कानून की यांत्रिक व्याख्या से जेल भेजकर तबाह नहीं किया जाना चाहिए; विधि आयोग को स्पेशल जजों को विवेकाधिकार और सामुदायिक सेवा जैसी वैकल्पिक सजा देने हेतु POCSO में संशोधन प्रस्तावित करने चाहिए।’
  • अंतिम परिणाम: हेबियस कॉर्पस याचिका स्वीकार; मेडिकल जांच में 18 वर्ष की पाए जाने पर पत्नी को 2 महीने के बच्चे सहित पति के साथ घर जाने की अनुमति; लॉ कमीशन को कानून में संशोधन की सिफारिश करने का औपचारिक न्यायिक आह्वान।

POCSO Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठन्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति अचल सचदेव
मामलानाबालिग पत्नी की रिहाई हेतु पति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
पारिवारिक पृष्ठभूमिकक्षा 5 तक पढ़ी लड़की (जो अखबार भी नहीं पढ़ सकती), पिता दिहाड़ी मजदूर
वर्तमान स्थितिदंपत्ति का 2 महीने का बच्चा है; ऑसिफिकेशन टेस्ट (Ossification Test) में उम्र ~18 वर्ष पाई गई।
अदालत का फैसलालड़की को बालिग मानकर पति के साथ जाने की अनुमति; लॉ कमीशन से POCSO में संशोधन की सिफारिश।
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