उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- “अनुपातिक” नहीं, “पर्याप्त” प्रतिनिधित्व की संवैधानिक गारंटी:राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि राज्य में SC/ST और OBC आबादी 90% से अधिक है, इसलिए आरक्षण उनकी आबादी के अनुपात में होना चाहिए। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा:“संविधान के तहत आरक्षण का उद्देश्य ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ (Adequate Representation) प्रदान करना है, न कि ‘आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व’ (Proportionate Representation)। यदि इस तर्क को स्वीकार कर लिया गया, तो यह संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को पूरी तरह नष्ट कर देगा।”
- असाधारण परिस्थितियों की व्याख्या:अदालत ने माना कि केवल आबादी में वृद्धि होना या पिछड़ापन दर्शाने वाला डेटा एकत्र होना कोई ऐसी “असाधारण परिस्थिति” (Extraordinary Circumstances) नहीं है जिसके आधार पर 50% की संवैधानिक सीमा को तोड़ा जा सके।
- अनुच्छेद 338(9) और 338A(9) के तहत अनिवार्य परामर्श की अनदेखी:हाईकोर्ट ने माना कि आरक्षण नीति में कोई भी बड़ा बदलाव करने से पहले राज्य सरकार के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) से पूर्व परामर्श (Prior Consultation) करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है। राज्य द्वारा कानून पारित होने और कोर्ट में मामला आने के बाद (2025/2026 में) की गई पत्राचार की औपचारिकता पूर्व परामर्श का स्थान नहीं ले सकती।
बेंगलुरु: आरक्षण की अधिकतम 50 प्रतिशत की संवैधानिक सीमा (50% Ceiling Limit on Reservations), इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) में निर्धारित सीमा का उल्लंघन, संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत समानता व समान अवसर का अधिकार, तथा अनुसूचित जातियों व जनजातियों से जुड़े प्रमुख नीतिगत निर्णयों से पूर्व राष्ट्रीय आयोगों के साथ अनिवार्य परामर्श (Mandatory Prior Consultation under Article 338/338A) के विधिक प्रश्नों पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
राज्य की सरकारी सेवाओं/पदों पर नियुक्तियों में आरक्षण
मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति के.एस. हेमालेखा की खंडपीठ ने पारित अपने निर्णय में अधिनियम की धारा 3 (शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण) और धारा 4 (राज्य की सरकारी सेवाओं/पदों पर नियुक्तियों में आरक्षण) को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन मानते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने कर्नाटक राज्य द्वारा वर्ष 2022 में बनाए गए उस कानून के प्रमुख प्रावधानों को रद्द कर दिया है, जिसके तहत अनुसूचित जातियों (SC) का आरक्षण 15% से बढ़ाकर 17% और अनुसूचित जनजातियों (ST) का आरक्षण 3% से बढ़ाकर 7% किया गया था, जिससे कुल आरक्षण 50% से बढ़कर 56% हो गया था।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘50% सीमा पार करने का तर्क समानता के सिद्धांत को नष्ट कर देगा’
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि कर्नाटक की 90% से अधिक आबादी SC, ST और OBC वर्गों से है, इसलिए आरक्षण उनकी आबादी के अनुपात को प्रतिबिंबित करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति के.एस. हेमालेखा की खंडपीठ ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए व्यवस्था दी: “इस दलील को स्वीकार करना संविधान के तहत निहित समानता के सिद्धांत के लिए विनाशकारी (Destructive of the principle of equality enshrined under the Constitution) होगा। 50% की सीमा पिछड़े वर्गों की केवल संख्यात्मक शक्ति (Numerical Strength) पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) और समानता की संवैधानिक गारंटी के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए राज्य की आरक्षण देने की शक्ति को सीमित (Circumscribed) करती है।”
2. अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और जनसंख्या वृद्धि सीमा तोड़ने का आधार नहीं:
- अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि विभिन्न आयोगों की रिपोर्टें SC/ST वर्गों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को दर्शाती हैं, लेकिन यह साक्ष्य संविधान के भीतर 50% के दायरे में रहकर आरक्षण देने का समर्थन कर सकता है। यह राज्य को 50% की सीलिंग को पार करने की अनुमति नहीं देता।
- पीठ ने माना:“असाधारण परिस्थितियों (Extraordinary Circumstances) के अपवाद का सहारा केवल इसलिए नहीं लिया जा सकता क्योंकि कुछ समुदायों का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है या वर्षों में उनकी जनसंख्या में वृद्धि हुई है।”
- अदालत ने रेखांकित किया कि नागमोहन दास आयोग और अन्य समितियों का मात्रात्मक डेटा (Quantifiable Data) आंतरिक आरक्षण (Internal Reservation) जैसे वर्गीकरण का आधार बन सकता है, पर समग्र 50% की कानूनी दीवार को लांघने का अधिकार नहीं देता।
3. अनुच्छेद 338(9) और 338A(9) का उल्लंघन — पूर्व परामर्श अनिवार्य था:
हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) के साथ अनिवार्य पूर्व परामर्श की संवैधानिक शर्त पूरी नहीं की थी:
- राज्य ने वर्ष 2025 और 2026 में आयोगों को लिखे गए पत्रों का हवाला देकर परामर्श का दावा किया।
- अदालत ने इसे अस्वीकार करते हुए व्यवस्था दी:“परामर्श, अर्थपूर्ण और प्रभावी होने के लिए, निर्णय लिए जाने से पूर्व (Must precede the decision) होना अनिवार्य है। कानून लागू होने के तीन साल बाद और हाईकोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद किया गया पत्राचार पूर्व, सार्थक परामर्श का विकल्प नहीं हो सकता।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं आरक्षण का ढांचा
| श्रेणी | पूर्व आरक्षण प्रतिशत | 2022 अधिनियम द्वारा प्रस्तावित | परिणामी स्थिति |
| अनुसूचित जाति (SC) | 15% | 17% (+2%) | वृद्धि की गई |
| अनुसूचित जनजाति (ST) | 3% | 7% (+4%) | वृद्धि की गई |
| अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) | 32% | 32% (अपरिवर्तित) | यथावत |
| कुल समग्र आरक्षण | 50% | 56% | 50% सीमा का उल्लंघन |
- अधिनियम का इतिहास: ‘कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों और राज्य के अधीन सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 2022’ को 11 जनवरी 2023 को राज्यपाल की स्वीकृति मिली थी और इसे 1 नवंबर 2022 से भूतलक्षी प्रभाव से लागू माना गया था।
- याचिकाकर्ताओं की चुनौतियां:
- डॉ. अंबेडकर अनुसूचित जाति महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र कुमार मित्रा ने याचिका दायर की।
- दूसरी याचिका बीबीएमपी (BBMP) में सहायक अभियंता (सिविल) पद के अभ्यर्थियों सागर एच.आर. और अन्य द्वारा दायर की गई, जिन्होंने खुली प्रतियोगिता और समानता के अधिकार के हनन का आरोप लगाया।
- राज्य सरकार का बचाव: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रो. रविवर्मा कुमार ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) नागमोहन दास आयोग, न्यायमूर्ति सुभाष बी. आदि समिति और रत्नप्रभा समिति की रिपोर्टों का हवाला देकर तर्क दिया था कि दशकों से आरक्षण अनुपात नहीं बदला था और असाधारण परिस्थितियों में 50% की सीमा कोई अनम्य (Inflexible) नियम नहीं है।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992, 9-जज संविधान पीठ):
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता। अत्यधिक दूरदराज के क्षेत्रों या असाधारण स्थितियों में ही असाधारण छूट दी जा सकती है, लेकिन सामान्य जनसंख्या वृद्धि या सामान्य अपर्याप्त प्रतिनिधित्व कोई असाधारण स्थिति नहीं है।
- डॉ. जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल बनाम मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र (2021 – मराठा आरक्षण मामला):
- 5-जजों की संविधान पीठ ने दोहराया था कि 50% की सीमा का उल्लंघन संविधान के बुनियादी संतुलन को बिगाड़ता है। यदि प्रत्येक राज्य अपनी जनसांख्यिकी के आधार पर सीमा लांघने लगेगा, तो अनुच्छेद 14 के तहत योग्यता और गैर-आरक्षित वर्गों का अधिकार समाप्त हो जाएगा।
- अनुच्छेद 338(9) व 338A(9) का अधिदेश:
- केंद्र और राज्य सरकारों के लिए यह अनिवार्य है कि वे अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्रभावित करने वाले सभी प्रमुख नीतिगत मामलों पर संबंधित राष्ट्रीय आयोगों से पूर्व परामर्श करें। पूर्व परामर्श के अभाव में बनाई गई नीति प्रक्रियात्मक रूप से शून्य हो जाती है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: महेंद्र कुमार मित्रा व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य [संबद्ध रिट याचिकाएं – कर्नाटक उच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति के.एस. हेमालेखा (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026
- विवादित कानून: कर्नाटक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों और राज्य के अधीन सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 2022
- रद्द किए गए प्रावधान: धारा 3 (शैक्षणिक संस्थानों में 50% से अधिक आरक्षण) एवं धारा 4 (सरकारी नौकरियों में आरक्षण वृद्धि)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. राजगोपाल, अधिवक्ता विनायक एस. पंडित, वरिष्ठ अधिवक्ता उदय होल्ला
- राज्य सरकार की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रो. रविवर्मा कुमार, वरिष्ठ अधिवक्ता रूबेन जैकब, सीजीएससी हर्षा पी. बानाड
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का प्रतिषेध), अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता), अनुच्छेद 338(9) एवं अनुच्छेद 338A(9) (राष्ट्रीय आयोगों से परामर्श)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992, SC) — ‘आरक्षण की 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा का कड़ाई से पालन अनिवार्य है।’
- मराठा आरक्षण निर्णय (2021, SC) — ‘जनसांख्यिकीय आंकड़े 50% सीमा को तोड़ने का वैध आधार नहीं बन सकते।’
- अंतिम परिणाम: रिट याचिकाएं स्वीकार; SC/ST आरक्षण को बढ़ाकर 56% करने वाले अधिनियम के प्रावधान असंवैधानिक घोषित कर निरस्त किए गए।
Reservation Limit: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश विभू बाखरू एवं न्यायमूर्ति के. एस. हेमलेखा |
| चुनौतीपूर्ण कानून | Karnataka SC/ST (Reservation of Seats in Educational Institutions & Appointments) Act, 2022 |
| आरक्षण में बदलाव | SC आरक्षण: 15% से बढ़ाकर 17%; ST आरक्षण: 3% से बढ़ाकर 7% (कुल कोटा 50% से बढ़कर 56%) |
| अदालत का फैसला | कानून की धारा 3 और 4 रद्द; आरक्षण की 50% सीमा का उल्लंघन असंवैधानिक है। |

