Thursday, October 15, 2026
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Unborn Life: मदर टेरेसा ने कहा था-गर्भपात अजन्मे बच्चे के खिलाफ युद्ध है; जानिए सिपाही की पत्नी की 20 सप्ताह के गर्भपात की याचिका खारिज क्यों हुई

अदालत के मुख्य निष्कर्ष और मदर टेरेसा का उल्लेख

  1. मदर टेरेसा के नोबेल भाषण का उल्लेख:पीठ ने अजन्मे शिशु के जीवन के अधिकार और पवित्रता का संदर्भ देते हुए 5 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में मदर टेरेसा के 1979 नोबेल शांति पुरस्कार भाषण का उद्धरण दिया:“आज शांति का सबसे बड़ा विनाशक गर्भपात है, क्योंकि यह बच्चे के खिलाफ एक युद्ध है, एक निर्दोष बच्चे की सीधी हत्या है…”
  2. संतुलित दृष्टिकोण (Balanced Approach) की आवश्यकता:हाईकोर्ट ने माना कि गर्भावस्था समाप्त करने के अनुरोध पर विचार करते समय महिला के शारीरिक अखंडता के अधिकार और विकसित हो रहे भ्रूण (Foetus) के जीवन के अधिकार के बीच एक संतुलन बनाना आवश्यक है। कोर्ट ने पाया कि मामले में घरेलू हिंसा का कोई ऐसा अकाट्य साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जो यह साबित करे कि गर्भावस्था जारी रखने से महिला के जीवन या मानसिक स्वास्थ्य को कोई गंभीर क्षति पहुंचेगी।
  3. भावनात्मक तनाव का समाधान ‘गर्भपात’ नहीं:न्यायालय ने कहा:“वैवाहिक कलह के कारण उत्पन्न भावनात्मक तनाव का एकमात्र समाधान गर्भपात (Medical Termination) नहीं है। इसके लिए उपयुक्त नैदानिक या वैवाहिक परामर्श दिया जा सकता है।”
  4. पति के वेतन से ₹12,000 प्रति माह की कटौती का आदेश:अदालत ने माना कि महिला बेरोजगार है और अपने माता-पिता पर निर्भर है। चूंकि उसका पति ~₹40,000 प्रतिमाह कमाता है, इसलिए अदालत ने आदेश दिया कि पति के मासिक वेतन से ₹12,000 प्रति माह काटकर सीधे पत्नी के खाते में भेजे जाएं, ताकि वह अपनी देखभाल और चिकित्सा खर्च पूरा कर सके। इसके साथ ही दोनों पक्षकारों को सरकारी स्तर पर निःशुल्क वैवाहिक परामर्श (Free Marital Counselling) उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया।

प्रयागराज: गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 (MTP Act, 1971) के अंतर्गत विवाहित महिला के प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) के अधिकार, अजन्मे बच्चे के जीवन की पवित्रता (Sanctity of Unborn Life), वैवाहिक विवादों व घरेलू कलह के आधार पर गर्भपात की विधिक वैधता, तथा गर्भवती महिला के मानसिक स्वास्थ्य के वास्तविक मूल्यांकन पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और उल्लेखनीय फैसला सुनाया है।

वैवाहिक विवाद या पति-ससुराल पक्ष से अनबन

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने पारित अपने निर्णय में व्यवस्था दी कि वैवाहिक विवाद या पति-ससुराल पक्ष से अनबन के कारण होने वाले भावनात्मक तनाव का एकमात्र समाधान गर्भपात नहीं हो सकता। इसके बजाय, अदालत ने दोनों पक्षों के बीच सुलह के लिए सरकारी मनोवैज्ञानिकों द्वारा मुफ्त वैवाहिक परामर्श (Free Marital Counselling) की व्यवस्था करने तथा गर्भवती महिला के खर्च व इलाज के लिए पुलिस कांस्टेबल पति के मासिक वेतन से ₹12,000 प्रतिमाह की कटौती करने का आदेश दिया। अदालत ने नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मदर टेरेसा के ऐतिहासिक कथन का हवाला देते हुए पुलिस कांस्टेबल की 24 वर्षीय पत्नी द्वारा अपने लगभग 20 सप्ताह के गर्भ को समाप्त कराने की याचिका खारिज कर दी है।

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उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. मदर टेरेसा के वक्तव्य का संदर्भ और ‘अजन्मे जीवन की पवित्रता’

खंडपीठ ने अजन्मे भ्रूण के जीवन की महत्ता को रेखांकित करते हुए 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार स्वीकार करते समय दिए गए मदर टेरेसा के प्रसिद्ध भाषण को उद्धृत किया: “अजन्मे जीवन की पवित्रता को संबोधित करते हुए प्रसिद्ध उद्धरणों में मदर टेरेसा के वे शब्द शामिल हैं, जिन्होंने 1979 के नोबेल शांति पुरस्कार स्वीकृति भाषण में कहा था: ‘आज शांति का सबसे बड़ा विनाशक गर्भपात है, क्योंकि यह बच्चे के खिलाफ एक युद्ध है, एक निर्दोष बच्चे की प्रत्यक्ष हत्या है, स्वयं मां द्वारा की गई हत्या…‘।”

2. प्रजनन विकल्प और अजन्मे भ्रूण के बीच ‘संतुलित दृष्टिकोण’ (Balanced Approach) आवश्यक:

पीठ ने माना कि हालांकि एक वयस्क महिला के पास अपने शरीर और प्रजनन विकल्पों (Bodily Autonomy & Reproductive Choice) का स्वतंत्र अधिकार होता है, परंतु अदालतों को ऐसे मामलों में एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा:

  • अदालत को महिला के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ विकसित हो रहे भ्रूण (Developing Foetus) के अधिकारों का भी सामंजस्यपूर्ण मूल्यांकन करना होता है।
  • रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस चिकित्सीय साक्ष्य या घरेलू हिंसा का ऐसा निर्विवाद प्रमाण नहीं था जो यह साबित कर सके कि गर्भ को आगे जारी रखने से महिला के जीवन को खतरा है या उसके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को कोई गंभीर अपूरणीय क्षति (Grave injury to mental health) पहुंचेगी।

3. ‘वैवाहिक कलह के तनाव का एकमात्र रामबाण इलाज गर्भपात नहीं’:

न्यायमूर्ति मुनीर और न्यायमूर्ति शुक्ला ने आदेश में दर्ज किया: “वैवाहिक कलह के कारण उत्पन्न भावनात्मक संकट (Emotional Distress) का एकमात्र रामबाण इलाज (Only Panacea) गर्भ का चिकित्सीय समापन (MTP) नहीं है। इसके लिए उपयुक्त नैदानिक अथवा वैवाहिक परामर्श (Marital Counselling) किया जा सकता है। आधुनिक युग में सरकार द्वारा संचालित संस्थानों में ऐसे योग्य मनोवैज्ञानिक पदस्थापित हैं, जिनकी सेवाएं ली जा सकती हैं।”

4. आर्थिक तंगी के आधार पर गर्भपात की मांग खारिज:

  • याचिकाकर्ता की दलील थी कि वह बेरोजगार है, माता-पिता पर निर्भर है और बच्चे के लालन-पालन का खर्च उठाने में असमर्थ है।
  • अदालत ने नोट किया कि पति पुलिस विभाग में कांस्टेबल है और लगभग ₹40,000 प्रतिमाह कमाता है। पति ने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण की पूरी जिम्मेदारी लेने पर सहमति जताई है।
  • अदालत ने व्यवस्था दी कि चूंकि गर्भधारण विवाह के दौरान हुआ है, अतः केवल आर्थिक तंगी की दलील देकर इसे ‘अवांछित गर्भ’ (Unwanted Pregnancy) नहीं माना जा सकता।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: शादी के 5 महीने बाद विवाद

विवरणतथ्य एवं घटनाक्रम
विवाह एवं पक्षकार24 वर्षीय युवती का विवाह मई 2026 में उत्तर प्रदेश पुलिस के एक कांस्टेबल से हुआ था।
गर्भ की स्थितियाचिका दाखिल करते समय महिला लगभग 20 सप्ताह की गर्भवती थी।
पत्नी के आरोपपति उसके चरित्र पर संदेह करता है, कई मौकों पर मारपीट की, फिनाइल पिलाने का प्रयास किया, ससुराल वालों ने प्रताड़ित किया और गर्भपात कराने पर कानूनी मुकदमा दर्ज कराने की धमकी दी।
पति का पक्षपति ने क्रूरता और मारपीट के आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया। उसने कहा कि यह महज वैवाहिक गलतफहमी है और वह पत्नी व बच्चे की देखभाल के लिए पूरी तरह तैयार है।
पत्नी की विधिक मांगअधिवक्ता रवि केशरवानी के माध्यम से दलील दी गई कि वयस्क विवाहित महिला होने के नाते उसे शारीरिक स्वायत्तता के तहत गर्भ जारी न रखने का पूर्ण विधिक अधिकार है।

उच्च न्यायालय के अंतिम निर्देश एवं आदेश

  1. गर्भपात की अनुमति से इनकार: 20 सप्ताह के स्वस्थ गर्भ को समाप्त करने की याचिका खारिज की गई।
  2. मासिक भरण-पोषण की कटौती: पति (कांस्टेबल) के मासिक वेतन से ₹12,000 प्रतिमाह सीधे काटकर पत्नी के बैंक खाते में भेजने का आदेश दिया गया, ताकि उसके चिकित्सा खर्च, दवाइयों और दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।
  3. मुफ्त वैवाहिक परामर्श (Counselling): संबंधित जिला प्रशासन और स्वास्थ्य अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे पति-पत्नी के बीच संबंधों को सुधारने के लिए सरकारी मनोवैज्ञानिकों के माध्यम से निशुल्क वैवाहिक परामर्श सत्र आयोजित करें।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 (MTP Act) की धारा 3:
    • 2021 के संशोधनों के अनुसार, 20 सप्ताह तक के गर्भ को समाप्त करने के लिए एक पंजीकृत चिकित्सक (RMP) की राय आवश्यक होती है कि गर्भ जारी रहने से महिला के जीवन को जोखिम है या उसके शारीरिक/मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुंचेगी।
    • हालांकि विवाहित महिलाओं द्वारा गर्भनिरोधक विफलता (Contraceptive Failure) को मानसिक क्षति माना जा सकता है, परंतु जहां गर्भधारण स्वेच्छा से हुआ हो और बाद में वैवाहिक कलह के कारण उसे अवांछित बताया जाए, वहां न्यायालय अजन्मे बच्चे के जीने के अधिकार और मां के अधिकारों के बीच संतुलन साधते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय की हालिया नजीरें (एक्स बनाम प्रधान सचिव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, 2022):
    • सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि विवाहित और अविवाहित दोनों महिलाओं को 24 सप्ताह तक गर्भपात का अधिकार है यदि उनकी वैवाहिक स्थिति में अप्रत्याशित बदलाव (Change in Marital Status) आ जाए, जैसे विधवा होना या तलाक।
    • हालांकि, वर्तमान मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि शादी के कुछ ही महीनों के भीतर केवल सामान्य घरेलू विवाद और आर्थिक चिंताएं ऐसे असाधारण हालात नहीं बनाते कि 20 सप्ताह के विकसित भ्रूण का जीवन समाप्त कर दिया जाए।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: विवाहित महिला (याचिकाकर्ता) बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – इलाहाबाद उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला (खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: 5 अक्टूबर 2026
  • गर्भ की अवधि: लगभग 20 सप्ताह
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (पत्नी) की ओर से: अधिवक्ता रवि केशरवानी
    • प्रतिवादी (पति) की ओर से: निजी अधिवक्ता
    • राज्य की ओर से: स्थायी अधिवक्ता (Standing Counsel)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 (MTP Act, 1971) की धारा 3
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार व प्रजनन अधिकार)
  • संबद्ध ऐतिहासिक संदर्भ:
    • मदर टेरेसा का 1979 नोबेल शांति पुरस्कार भाषण — ‘अजन्मे जीवन की शुचिता का सिद्धांत।’
  • अंतिम परिणाम: गर्भपात की याचिका खारिज; पति के वेतन से ₹12,000 मासिक भरण-पोषण और दंपति के लिए मुफ्त सरकारी वैवाहिक परामर्श का निर्देश जारी।

Unborn Life:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठजस्टिस जे. जे. मुनीर एवं जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला
याचिकाकर्ता24 वर्षीया विवाहित महिला (गर्भावस्था ~20 सप्ताह)
प्रतिवादीमहिला का पति (पुलिस कांस्टेबल) एवं राज्य
अदालत का फैसलागर्भपात याचिका खारिज; निःशुल्क वैवाहिक परामर्श का निर्देश और पति के वेतन से ₹12,000/माह की कटौती का आदेश।
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