हाईकोर्ट की मुख्य व तल्ख टिप्पणियां
- “आप किस बात से डर रहे हैं?”:राज्य सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता (Advocate General) द्वारा त्योहारों के मौसम में पुलिस बल की व्यस्तता और जनता को असुविधा का हवाला देने पर जज ने पूछा:“आप किससे डर रहे हैं? हर साल वे कोर्ट आ रहे हैं और हर साल कोर्ट अनुमति दे रहा है। 2026 में ऐसा क्या असाधारण हो गया है? क्या उनके मार्च में अब तक कोई हिंसा हुई है?”
- हिंसा के विशिष्ट मामलों पर सवाल:जब महाधिवक्ता ने आपराधिक मुकदमों का उल्लेख किया, तो अदालत ने उनसे सीधे पूछा कि क्या RSS के जुलूस के कारण कभी हिंसा हुई है। न्यायमूर्ति लक्ष्मीनारायणन ने कहा:“कहाँ सर? हिंसा के कारण कहां आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं, कृपया मुझे बताएं?”
- “क्या राज्य नागरिकों को दुश्मन मान रहा है?”:नागरिकों द्वारा अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने पर राज्य के रुख पर चिंता व्यक्त करते हुए जज ने टिप्पणी की:“राज्य अपने नागरिकों को दुश्मन की तरह देख रहा है, ऐसे में क्या किया जाए? सत्ता में चाहे जो भी सरकार हो, वे अनुमति खारिज ही कर रहे हैं। या तो आप ऐसा कानून बना दीजिए कि कोई भी जुलूस नहीं निकाल सकता… बेवजह मुकदमेबाजी क्यों बढ़ा रहे हैं? क्या आप प्रतिकूल प्रचार (Adverse Publicity) चाहते हैं?”
- स्थापना दिवस पर मार्च में कुछ भी गलत नहीं:पीठ ने कहा कि कोई संगठन यदि अपने स्थापना दिवस पर जुलूस निकालना चाहता है, तो इसमें कुछ भी स्वाभाविक रूप से आपत्तिजनक नहीं है। साथ ही, मार्ग में मस्जिद या अन्य पूजा स्थल होने मात्र को अनुमति न देने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
याचिकाकर्ता (RSS) के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. एल. राजा ने दलील दी कि:
- पुलिस द्वारा जुलूस के नियमों को कठोर वैधानिक शर्तों की तरह लागू नहीं किया जाना चाहिए।
- अस्वीकृति आदेशों में मार्ग पर स्थित मस्जिदों का हवाला देना तमिलनाडु के सांप्रदायिक सौहार्द को अनावश्यक रूप से प्रभावित करता है।
- पुलिस को आवेदन सीधे खारिज करने के बजाय आयोजकों से स्पष्टीकरण मांगना चाहिए।
चेन्नई: संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत बिना हथियारों के शांतिपूर्ण सभा, जुलूस और मार्च निकालने का मौलिक अधिकार (Right to Peaceful Assembly and Procession), सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) के नाम पर राज्य द्वारा बार-बार अनुमतियां खारिज करने की प्रवृत्ति, जुलूस के प्रस्तावित मार्ग पर अन्य धर्मों के पूजा स्थल (मस्जिद/चर्च) होने के आधार पर अनुमति अस्वीकार करने की वैधानिकता, तथा नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति प्रशासनिक दृष्टिकोण पर मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को आड़े हाथों लिया है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सदस्यों द्वारा अक्टूबर 2026 में प्रस्तावित रूट मार्च
न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन की एकल पीठ ने बुधवार (14 अक्टूबर 2026) को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सदस्यों द्वारा अक्टूबर 2026 में प्रस्तावित रूट मार्च की पुलिस अनुमति खारिज करने वाले आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका (जगदीशन बनाम तमिलनाडु राज्य) पर सुनवाई करते हुए राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) से तीखे सवाल पूछे। अदालत ने आश्चर्य व्यक्त किया कि जब हर साल उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बाद शांतिपूर्ण रैलियां संपन्न होती हैं, तो सरकार हर बार नागरिकों को अदालत का दरवाजा खटखटाने पर क्यों विवश करती है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां
1. ‘आपका डर क्या है? हर साल अदालत से अनुमति मिलती है, 2026 में क्या अलग है?’
न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन ने राज्य के महाधिवक्ता विजय नारायण से सीधा सवाल किया: *”आपका डर क्या है? क्या आप डर रहे हैं? (What is your fear? Are you fearing…?) हर साल वे (RSS) रैलियों की अनुमति मांगने अदालत आते हैं, हर साल अदालत उन्हें अनुमति देती है। 2026 में ऐसा क्या असाधारण (Exceptional) हो गया है? क्या अब तक उनके किसी मार्च में कोई हिंसा हुई है?“*
जब महाधिवक्ता ने पिछले आपराधिक मामलों का हवाला दिया, तो न्यायाधीश ने तीखा प्रतिप्रश्न किया: “कहाँ, सर? हिंसा के कारण दर्ज आपराधिक मामले कहाँ हैं? कृपया मुझे विशिष्ट उदाहरण बताइए।”
2. ‘राज्य नागरिकों को दुश्मन समझने लगा है; हर सरकार रैलियां खारिज करती है’:
पीठ ने नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति कार्यपालिका की आम कार्यशैली पर गंभीर चिंता जताई:
- अदालत ने टिप्पणी की:“राज्य नागरिकों को दुश्मन के रूप में देख रहा है, क्या किया जाए? (State is looking at citizens as enemies, what to do?) रवैये में बदलाव लाने की सख्त जरूरत है। सत्ता में चाहे जो भी सरकार आए, वे हमेशा अनुमतियों को खारिज कर देते हैं।”
- पीठ ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि यदि राज्य लोगों के प्रदर्शन और जुलूस निकालने के इतना खिलाफ है:“एक कानून पास कर दीजिए कि किसी भी व्यक्ति को कोई जुलूस या मार्च निकालने का अधिकार नहीं होगा… आप बार-बार ऐसा क्यों कर रहे हैं? अनावश्यक मुकदमेबाजी बढ़ाने के लिए? या आपको प्रतिकूल प्रचार (Adverse Publicity) चाहिए?”
3. स्थापना दिवस मनाने में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं:
अदालत ने कहा कि किसी संगठन द्वारा अपने स्थापना दिवस (Founding Day – विजयादशमी) पर रूट मार्च निकालने की इच्छा में कुछ भी अंतर्निहित रूप से गलत या आपत्तिजनक नहीं है: “वे कहते हैं कि उस पावन दिन पर उनका स्थापना दिवस है। वे उस दिन रूट मार्च निकालना चाहते हैं। इसमें गलत क्या है?”
4. ‘मार्ग में पूजा स्थल (मस्जिद) होना जुलूस रोकने का आधार नहीं’:
- याचिकाकर्ता के वकील ने आपत्ति जताई कि पुलिस ने अपने अस्वीकृति आदेशों में मार्ग में ‘मस्जिदें’ होने का हवाला दिया है, जो तमिलनाडु के सांप्रदायिक सौहार्द को कम आंकता है।
- हाईकोर्ट ने रुख स्पष्ट किया कि प्रस्तावित मार्ग पर पूजा स्थलों (मस्जिद या चर्च) की उपस्थिति अपने आप में अनुमति से इनकार करने का वैध आधार नहीं हो सकती।
दोनों पक्षों की मुख्य विधिक दलीलें
| पक्षकार | प्रतिनिधित्व | प्रस्तुत मुख्य विधिक दलीलें |
| तमिलनाडु राज्य सरकार | महाधिवक्ता (Advocate General) विजय नारायण | • त्योहारी सीजन (Festive Season) के दौरान भारी पुलिस बल की तैनाती पहले से ही अन्य कानून-व्यवस्था व सुरक्षा कर्तव्यों में व्यस्त है। • बाजारों में खरीदारी करने वाले आम नागरिकों को जुलूस से असुविधा हो सकती है। • पूर्व के सुरक्षा जोखिमों और संवेदनशीलता का हवाला दिया। |
| याचिकाकर्ता (RSS सदस्य) | वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एल. राजा | • RSS सदस्य स्वयं अन्य अवसरों पर हिंसा के शिकार रहे हैं। • जुलूसों को नियंत्रित करने वाले प्रक्रियात्मक दिशा-निर्देश ‘अपरिवर्तनीय वैधानिक अनिवार्यता’ नहीं हैं; पुलिस को आवेदन सीधे खारिज करने के बजाय आयोजकों से स्पष्टीकरण मांगना चाहिए। • मार्ग में मस्जिद होने का बहाना बनाकर राज्य सांप्रदायिक सद्भाव की गलत छवि पेश कर रहा है। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- अनुच्छेद 19(1)(b) और अनुच्छेद 19(3) (उचित प्रतिबंध):
- भारत के नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के एकत्र होने व जुलूस निकालने का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
- राज्य केवल ‘लोक व्यवस्था’ (Public Order) के वास्तविक और प्रत्यक्ष खतरे पर ही उचित प्रतिबंध लगा सकता है। केवल “प्रशासनिक असुविधा”, “पुलिस बल की व्यस्तता” या “त्योहारी सीजन” मौलिक अधिकारों के पूर्ण दमन का वैधानिक आधार नहीं बन सकते।
- पूजा स्थलों के पास से गुजरने का अधिकार:
- सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठों ने पूर्ववर्ती मामलों में बार-बार स्पष्ट किया है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है, जहां सार्वजनिक सड़कें सभी नागरिकों की हैं। किसी सार्वजनिक मार्ग पर मस्जिद, मंदिर या चर्च का होना किसी अन्य शांतिपूर्ण समूह के वहां से मार्च निकालने पर पूर्ण प्रतिबंध का कारण नहीं बन सकता।
- अनावश्यक न्यायिक मुकदमों की पुनरावृत्ति:
- वर्ष 2022, 2023 और 2024 में भी राज्य सरकार द्वारा लगाई गई पाबंदियों को मद्रास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर रैलियों की सशर्त अनुमति दी थी। स्थापित विधिक नजीर के बावजूद बार-बार पुलिस द्वारा यांत्रिक अस्वीकृति आदेश पारित करना न्यायिक समय की बर्बादी है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: जगदीशन बनाम तमिलनाडु राज्य [आपराधिक मूल याचिका / रिट याचिका – मद्रास उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन (एकल पीठ)
- सुनवाई की तिथि: 14 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 15 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (RSS सदस्य) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एन.एल. राजा
- तमिलनाडु राज्य की ओर से: महाधिवक्ता (Advocate General) विजय नारायण
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(b) (शांतिपूर्ण सभा का अधिकार) एवं अनुच्छेद 226
- मद्रास शहर पुलिस अधिनियम, 1888 एवं तमिलनाडु जिला पुलिस अधिनियम — धारा 41A (जुलूसों और सभाओं का विनियमन)
- अदालत का अंतरिम निर्देश: याचिकाकर्ता के वकीलों (चार अधिवक्ताओं के दल) को राज्य लोक अभियोजक (State Public Prosecutor) के साथ बैठक कर पुलिस आपत्तियों का सौहार्दपूर्ण समाधान तलाशने का निर्देश; मामले को आगे की सुनवाई के लिए 15 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया।
RSS Route Chart:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन |
| याचिकाकर्ता | जगदीशन (आरएसएस सदस्य; वरिष्ठ अधिवक्ता एन. एल. राजा द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| प्रतिवादी | तमिलनाडु राज्य सरकार एवं पुलिस विभाग (एडवोकेट जनरल विजय नारायण द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| मुख्य मुद्दा | अक्टूबर 2026 में विजयदशमी/स्थापना दिवस पर RSS के पथ संचलन को अनुमति देने से पुलिस का इनकार। |
| अदालत का रुख | सख्त ऐतराज; दोनों पक्षों को 15 अक्टूबर तक लोक अभियोजक (State Public Prosecutor) के साथ बैठक कर मामला सुलझाने का निर्देश। |

