Thursday, October 15, 2026
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Time Frame: क्या दीवानी मुकदमों में 120 दिन की मियाद बीतने के बाद भी लिखित बयान स्वीकार किया जा सकता है? बड़ी पीठ को क्यों केस भेजा गया, जानें

खंडपीठ का प्राथमिक दृष्टिकोण और कानूनी तर्क

  1. प्रक्रियात्मक कानून का निर्देशिका (Directory) स्वरूप:खंडपीठ ने माना कि दीवानी मामलों में लिखित बयान दाखिल करने के नियम प्रक्रियात्मक प्रकृति (Procedural in Nature) के हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Kailash v. Nanhku और Salem Advocate Bar Association मामलों में माना है कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC Order VIII Rule 1) की समय सीमाएं निर्देशिका (Directory) हैं, जिन्हें असाधारण परिस्थितियों में बढ़ाया जा सकता है।
  2. कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट बनाम सामान्य सिविल कोर्ट्स रूल्स:अदालत ने टिप्पणी की कि 2018 में नियम बनाते समय दिल्ली हाईकोर्ट ने कमर्शियल मुकदमों की सख्त भाषा (जहाँ 120 दिन की अंतिम सीमा अनिवार्य है) को न चुनकर सामान्य सिविल अदालतों के लिए लागू होने वाली प्रक्रियात्मक भाषा को चुना था।“दिल्ली हाईकोर्ट ओरिजिनल साइड रूल्स का नियम 4 निर्देशिका प्रकृति का है। इसके तहत हाईकोर्ट को वही विवेकाधिकार (Discretion) प्राप्त है जो CPC के आदेश VIII नियम 1 के तहत अन्य सिविल अदालतों को उपलब्ध है।”— न्यायामूर्ति विवेक चौधरी व न्यायामूर्ति रेणु भटनागर
  3. रजिस्ट्रार के अधिकार:खंडपीठ ने यह भी माना कि समय सीमा बढ़ाने का अधिकार केवल अदालत (Court) के पास है, जबकि रजिस्ट्रार केवल प्रशासनिक/प्रबंधकीय शक्तियों (Ministerial Powers) का प्रयोग करते हैं।

बड़ी पीठ को भेजे गए प्रमुख सवाल

पूर्ववर्ती निर्णयों (Ram Sarup Lugani, Manhar Sabharwal, Delhi Gymkhana Club Cases) के विपरीत रुख अपनाते हुए खंडपीठ ने बड़ी पीठ द्वारा तय किए जाने हेतु 3 मुख्य बिंदु भेजे हैं:

  1. क्या दिल्ली हाईकोर्ट ओरिजिनल साइड रूल्स, 2018 के तहत 120 दिनों की सीमा अनिवार्य (Mandatory) है या निर्देशिका (Directory)?
  2. क्या असाधारण परिस्थितियों में कोर्ट के पास 120 दिनों के बाद लिखित बयान स्वीकार करने का विवेकाधिकार है?
  3. क्या रजिस्ट्रार को लिखित बयान दर्ज करने की अनुमति देने या अधिकार बंद करने की शक्तियों का अंतिम क्षेत्राधिकार है?

नई दिल्ली: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश VIII नियम 1 के तहत लिखित बयान (Written Statement) दाखिल करने की समय-सीमा, दिल्ली उच्च न्यायालय (मूल पक्ष) नियम, 2018 (Delhi High Court Original Side Rules, 2018) के अध्याय VII के नियम 4 की वैधानिक प्रकृति—आदेशात्मक (Mandatory) बनाम निदेशात्मक (Directory), वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015) की कठोर समय-सीमाओं की तुलना में सामान्य दीवानी मुकदमों की स्थिति, तथा संयुक्त रजिस्ट्रार (Joint Registrar) की प्रशासनिक/मंत्रालयीन शक्तियों की सीमाओं पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक संदर्भ (Reference to Larger Bench) तैयार किया है।

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर की खंडपीठ ने अपनी ही अदालत की पूर्ववर्ती समन्वय खंडपीठों (Coordinate Division Benches) के निर्णयों से स्पष्ट असहमति व्यक्त की है, जिनमें यह माना गया था कि दिल्ली हाईकोर्ट रूल्स, 2018 के तहत 120 दिनों की सीमा पूरी तरह अनिवार्य और अनुल्लंघनीय है। वर्तमान खंडपीठ ने प्रथम दृष्टया विचार व्यक्त किया कि सामान्य दीवानी वादों में 120 दिन की सीमा निदेशात्मक (Directory) है और असाधारण परिस्थितियों में न्यायहित में अदालतों के पास मियाद बढ़ाने का अंतर्निहित विवेकाधिकार बना रहना चाहिए। पीठ ने इस विधिक टकराव को सुलझाने के लिए तीन प्रमुख प्रश्न बड़ी पीठ (Larger Bench) के विचारार्थ संदर्भित किए हैं।

खंडपीठ के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘DHC रूल्स का नियम 4 निदेशात्मक है, आदेशात्मक नहीं’

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए व्यवस्था दी: “दिल्ली उच्च न्यायालय नियमों की भाषा काफी हद तक सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के संबंधित प्रावधान (आदेश VIII नियम 1) के समान है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने आज्ञापक (Mandatory) के बजाय निदेशात्मक (Directory) माना है। अतः, उसी सिद्धांत को लागू करते हुए, एकमात्र संभावित व्याख्या यही है कि DHC नियमों का नियम 4 भी प्रकृति में निदेशात्मक (Directory in nature) है, जिससे उच्च न्यायालय के पास वही विवेकाधिकार (Discretion) उपलब्ध रहता है जो किसी अन्य न्यायालय के पास होता है जहां आदेश VIII नियम 1 CPC लागू होता है।”

2. वाणिज्यिक विवाद बनाम सामान्य दीवानी वाद में जानबूझकर रखा गया अंतर:

  • खंडपीठ ने रेखांकित किया कि जब दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2018 में अपने मूल पक्ष नियमों (Original Side Rules) का निर्माण किया, तब वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 की कठोर भाषा (जिसमें 120 दिन बाद डब्ल्यूएस का अधिकार पूर्णतः समाप्त होने का स्पष्ट प्रविधान है) पहले से अस्तित्व में थी।
  • अदालत ने टिप्पणी की:“उच्च न्यायालय ने अपने नियम बनाते समय वाणिज्यिक अदालतों (Commercial Courts) के लिए प्रदान की गई कठोर भाषा का चयन नहीं किया, बल्कि उसने सामान्य दीवानी अदालतों (Civil Courts) के लिए प्रयुक्त भाषा को चुना।”
  • इससे स्पष्ट है कि नियम निर्माताओं की मंशा सामान्य दीवानी वादों में 120 दिन के बाद अदालत के विवेकाधिकार को पूरी तरह छीनने की नहीं थी।

3. रजिस्ट्रार के पास केवल मंत्रालयीन शक्तियां; अदालत ही बढ़ा सकती है मियाद:

  • पीठ ने माना कि संयुक्त रजिस्ट्रार (Joint Registrar) केवल मंत्रालयीन (Ministerial) शक्तियों का प्रयोग करता है। समय-सीमा में असाधारण छूट देने का न्यायिक विवेकाधिकार केवल और केवल अदालत (Judge) में निहित है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं पूर्व न्यायिक नजीरों का टकराव

विवरणघटनाक्रम, तथ्य एवं विधिक टकराव
प्रारंभिक वादमुकदमा मूल रूप से एक वाणिज्यिक विवाद (Commercial Suit) के रूप में दायर किया गया था।
5 मई 2025 का आदेशएकल पीठ ने माना कि यह वाणिज्यिक विवाद नहीं है और इसे एक सामान्य दीवानी वाद (Ordinary Civil Suit) के रूप में चलाने का निर्देश दिया।
प्रतिवादी का अधिकार बंद (20 जनवरी 2026)निर्धारित अवधि में लिखित बयान दाखिल न होने पर संयुक्त रजिस्ट्रार ने प्रतिवादी के डब्ल्यूएस दाखिल करने के अधिकार को समाप्त (Closed the right) कर दिया।
एकल पीठ की पुष्टि (23 जुलाई 2026)एकल न्यायाधीश ने रजिस्ट्रार के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि 5 मई 2025 से 120 दिन बीत जाने के बाद भी जवाब दाखिल नहीं किया गया। इसके खिलाफ खंडपीठ में अपील हुई।
पूर्व समन्वय पीठों का दृष्टिकोणराम स्वरूप लुगानी (Ram Sarup Lugani), मनहर सभरवाल (Manhar Sabharwal) और दिल्ली जिमखाना क्लब (Delhi Gymkhana Club) मामलों में दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठों ने माना था कि DHC रूल्स के तहत 120 दिन की सीमा अनिवार्य है और अदालत भी इसे नहीं बढ़ा सकती।
वर्तमान पीठ की असहमतिवर्तमान खंडपीठ ने इन तीनों फैसलों से असहमति जताई और माना कि प्रक्रिया न्याय की बाधा नहीं बन सकती।

बड़ी पीठ (Larger Bench) के विचारार्थ संदर्भित 3 प्रमुख प्रश्न

खंडपीठ ने विस्तृत न्यायिक स्पष्टता के लिए निम्नलिखित तीन विधिक प्रश्न बड़ी पीठ को भेजे हैं:

 ─────────────────────────────────────┐
बड़ी पीठ के विचारार्थ 3 प्रमुख विधिक प्रश्न │
└────────────┬───────────────────────┘
│
┌────────────┼────────────────────────┐
▼ ▼ ▼
【प्रश्न 1: 120 दिन की प्रकृति】 【प्रश्न 2: रजिस्ट्रार की शक्तियां】 【प्रश्न 3: अपील का अधिकार】
क्या DHC रूल्स, 2018 के अध्याय क्या लिखित बयान दाखिल करने की क्या 120 दिन की समाप्ति के बाद
VII का नियम 4 अनिवार्य (Mandatory) समय-सीमा बढ़ाने का अधिकार केवल रजिस्ट्रार द्वारा पारित आदेश के
है या असाधारण मामलों में अदालत अदालत के पास है और रजिस्ट्रार की खिलाफ चैंबर अपील या खंडपीठ में
के पास मियाद बढ़ाने का विवेक है? शक्तियां केवल मंत्रालयीन हैं? अपील विचारणीय है?

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • कैलाश बनाम नन्हकू (2005, सुप्रीम कोर्ट) एवं सेलम एडवोकेट बार एसोसिएशन (2005, SC):
    • सर्वोच्च न्यायालय की 3-जजों की पीठ ने सीपीसी के आदेश VIII नियम 1 (30 दिन + 90 दिन = 120 दिन) की व्याख्या करते हुए स्थापित किया था कि सिविल मुकदमों में प्रक्रियात्मक नियम “न्याय की सुविधा के लिए हैं, न कि न्याय का गला घोंटने के लिए”। अत्यधिक असाधारण और अपरिहार्य परिस्थितियों में अदालतें 120 दिन के बाद भी लिखित बयान रिकॉर्ड पर ले सकती हैं।
  • वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 बनाम सामान्य सीपीसी:
    • वाणिज्यिक वादों में सीपीसी के आदेश VIII नियम 1 में संशोधन कर यह शर्त जोड़ी गई है कि 120 दिन की समाप्ति पर प्रतिवादी का लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और अदालत उसे रिकॉर्ड पर नहीं ले सकेगी (SCG Contracts India Pvt Ltd v. K.S. Chamankar Infrastructure).
    • परंतु वर्तमान खंडपीठ का मानना है कि गैर-वाणिज्यिक (सामान्य दीवानी) मुकदमों पर यह कठोर प्रतिबंध लागू नहीं होता।
  • दिल्ली हाईकोर्ट मूल पक्ष नियम (Original Side Rules) की सर्वोच्चता:
    • सीपीसी की धारा 129 के तहत चार्टर्ड उच्च न्यायालयों के मूल पक्ष नियम सामान्य सीपीसी पर प्रभावी होते हैं। यदि बड़ी पीठ यह तय करती है कि नियम 4 निदेशात्मक है, तो दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित सैकड़ों दीवानी मुकदमों में प्रतिवादियों को बड़ी राहत मिल सकेगी।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: योगेश तनेजा बनाम विनय तनेजा [FAO(OS) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर (खंडपीठ)
  • आदेश की तिथि: अक्टूबर 2026 (विस्तृत आदेश हालिया)
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • अपीलकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता अंशुल शर्मा एवं विशेष तोमर
    • प्रतिवादी की ओर से: अधिवक्ता ईशान सेठ
  • प्रासंगिक कानून एवं प्रक्रियात्मक नियम:
    • दिल्ली उच्च न्यायालय (मूल पक्ष) नियम, 2018 — अध्याय VII, नियम 4
    • सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) — आदेश VIII नियम 1 (लिखित बयान दाखिल करने की मियाद) एवं धारा 129
    • वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 (Commercial Courts Act, 2015)
  • संबद्ध न्यायिक नजीरें:
    • कैलाश बनाम नन्हकू (2005, SC) एवं सेलम एडवोकेट बार एसोसिएशन (2005, SC) — ‘सीपीसी का आदेश VIII नियम 1 निदेशात्मक है; असाधारण मामलों में समय बढ़ाया जा सकता है।’
    • राम स्वरूप लुगानी (2020, दिल्ली HC) — ‘पूर्व समन्वय पीठ का निर्णय (जिससे वर्तमान पीठ ने असहमति जताई)।’
  • अंतिम परिणाम: मामला आधिकारिक तौर पर मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया ताकि 120 दिन की समय-सीमा की विधिक प्रकृति का अंतिम निपटारा करने के लिए 3 या अधिक जजों की बड़ी पीठ (Larger Bench) का गठन किया जा सके।

Time Frame: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
खंडपीठन्यायमूर्ति विवेक चौधरी एवं न्यायमूर्ति रेणु भटनागर
मूल मामलाYogesh Taneja v. Vinay Taneja (साधारण दीवानी मुकदमा)
कानूनी मुद्दाक्या दिल्ली हाईकोर्ट ओरिजिनल साइड रूल्स, 2018 का नियम 4 निर्देशिका (Directory) है या अनिवार्य (Mandatory)?
वर्तमान स्थितिपूर्व फैसलों (Ram Sarup Lugani Case) से असहमति व्यक्त करते हुए मामले को बड़ी पीठ (Larger Bench) को भेजा गया।
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