याचिकाकर्ता व्यापारियों के मुख्य तर्क
- ₹2,000 करोड़ का व्यावसायिक नुकसान:याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सचिन पुरी (Sachin Puri) ने अदालत को बताया कि विपक्षी दलों और विभिन्न संगठनों द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ किए जा रहे प्रदर्शनों और पुलिस द्वारा लगाए गए बैरिकेड्स के कारण मध्य दिल्ली के व्यापारिक क्षेत्र ठप हो गए हैं। उन्होंने कहा:“त्योहारी सीजन के दौरान हाल के दिनों में ₹2,000 करोड़ से अधिक का व्यापार पूरी तरह गायब हो गया है। लोग कनाट प्लेस जैसी जगहों पर खरीदारी के लिए नहीं आ पा रहे हैं। हमारी मांग प्रदर्शनों को पूरी तरह रोकने की नहीं, बल्कि पूर्व में तय SOP को सख्ती से लागू करने की है ताकि व्यापारियों के मौलिक अधिकारों का हनन न हो।”
- मजदूर किसान शक्ति संगठन (2018) सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला:याचिका में शीर्ष अदालत के 2018 के ऐतिहासिक फैसले (Mazdoor Kisan Shakti Sangathan v. Union of India) का संदर्भ दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जंतर-मंतर या संसद के आसपास प्रदर्शनों के लिए एक उचित प्रणाली और SOP बनाई जाए ताकि नागरिकों की आवाजाही और व्यापार बाधित न हो।
- वकीलों के कामकाज पर प्रभाव:व्यापारियों के अलावा वकीलों के संघों ने भी याचिका में पक्षकार बनते हुए कहा कि अदालतों के रास्तों पर की गई पुलिस बैरिकेडिंग से वकीलों और मुकदमों के पक्षकारों का अदालतों तक पहुँचना अत्यंत कठिन हो गया है।
अदालत की कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट से समानांतर लिंक
- सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है मामला:सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा (Chetan Sharma) और पीठ ने संज्ञान लिया कि 10 अक्टूबर के प्रदर्शनों, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और जंतर-मंतर को ‘विरोध स्थल’ की सूची से हटाने (De-notify) से जुड़े व्यापक मुद्दे पहले से उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष विचाराधीन हैं।
- सुप्रीम कोर्ट का 15 अक्टूबर का निर्णय महत्वपूर्ण:हाईकोर्ट को सूचित किया गया कि सुप्रीम कोर्ट पीठ की अनुपलब्धता के कारण इस मामले पर सुनवाई गुरुवार (15 अक्टूबर 2026) को करेगी।
- दिल्ली पुलिस का नया रुख (जंतर-मंतर डिनोटिफाई):दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार द्वारा 11 अक्टूबर 2026 को जारी स्टैंडिंग ऑर्डर के तहत जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल से हटाकर रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी मैदान (पूर्वी दिल्ली) को नए स्थल के रूप में अधिसूचित किया गया है। हालांकि, व्यापारियों का तर्क है कि इन नए स्थलों पर भी विरोध प्रदर्शनों के संचालन के लिए स्पष्ट SOP अभी तक लागू नहीं की गई है।
नई दिल्ली: संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण विरोध और सभा के अधिकार (Right to Peaceful Protest) बनाम अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत नागरिकों व व्यापारियों के आजीविका और निर्बाध व्यापार के मौलिक अधिकार (Right to Trade and Profession) के बीच संवैधानिक संतुलन, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में विरोध प्रदर्शनों के विनियमन हेतु मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure – SOP) का क्रियान्वयन, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और SIR प्रक्रिया के विरोध में मध्य दिल्ली में जारी व्यापक प्रदर्शनों के कारण कनॉट प्लेस (Connaught Place) व आसपास के प्रमुख वाणिज्यिक बाजारों की पूर्ण नाकेबंदी, तथा ऐतिहासिक फैसले मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS बनाम भारत संघ, 2018) और शाहीन बाग फैसले (अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त, 2020) के अनुपालन पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई की है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (ACJ) नितिन वासुदेव सांब्रे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा की खंडपीठ ने मंगलवार (13 अक्टूबर 2026) को व्यापारियों और अधिवक्ताओं द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और संबंधित प्राधिकारियों को निर्देश प्राप्त करने को कहा है। चूंकि विरोध प्रदर्शनों, मेट्रो स्टेशनों के बंद होने, जंतर-मंतर के डी-नोटिफिकेशन और पुलिस हिरासत से जुड़े मामले पहले से ही भारत के सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं, इसलिए खंडपीठ ने दोहराव से बचने के लिए याचिकाकर्ताओं को शीर्ष अदालत की याचिकाओं की प्रति रिकॉर्ड पर लाने का निर्देश देते हुए मामले को शुक्रवार (16 अक्टूबर 2026) को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत प्रमुख विधिक दलीलें एवं टकराव के बिंदु
1. व्यापारियों का पक्ष: ‘त्योहारी सीजन में ₹2,000 करोड़ का व्यापार स्वाहा, सड़कें पूरी तरह अवरुद्ध’
याचिकाकर्ताओं (व्यापारियों और अधिवक्ताओं) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सचिन पुरी और वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पोद्दार ने अदालत को राजधानी के व्यावसायिक नुकसान से अवगत कराया: *”पिछले कुछ दिनों में विरोध प्रदर्शनों, भारी बैरिकेडिंग और रास्तों के बंद होने के कारण व्यापारियों का लगभग ₹2,000 करोड़ का कारोबार पूरी तरह स्वाहा (Vanished) हो चुका है। अक्टूबर से फरवरी का समय दिल्ली के व्यापारियों के लिए सबसे बड़ा ‘त्योहारी सीजन’ (Festive Season) होता है, जिससे पूरे साल का व्यवसाय चलता है। प्रदर्शनों के कारण कनॉट प्लेस और मध्य दिल्ली के इलाके ऐसे हो गए हैं जैसे वे पूरी तरह अगम्य (Completely Unapproachable) हों। हम प्रदर्शनों को रोकने की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि यह मांग कर रहे हैं कि विरोध को विनियमित करने के लिए पहले से मौजूद SOP को सख्ती से लागू किया जाए ताकि आम नागरिकों और व्यापारियों के मौलिक अधिकारों का हनन न हो।”*
2. विरोध का अधिकार अनियंत्रित नहीं हो सकता (सुप्रीम कोर्ट नजीरों का हवाला):
- वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने अमित साहनी (शाहीन बाग) और एमकेएसएस मामलों में स्पष्ट व्यवस्था दी है कि प्रदर्शन का अधिकार मौलिक अधिकार है, लेकिन यह दूसरों के आवागमन, काम करने और सार्वजनिक मार्गों के उपयोग के अधिकार को कुचलने (Impede) का लाइसेंस नहीं बन सकता।
- बार-बार सड़कें और मेट्रो स्टेशन बंद होने से पूरी दिल्ली की सामान्य जिंदगी ठप हो गई है।
3. केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस का पक्ष: ‘मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन’
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने पीठ के समक्ष स्पष्ट किया कि विरोध स्थलों, निषेधाज्ञा आदेशों और प्रदर्शनों के विनियमन का पूरा विषय सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है:
- शीर्ष अदालत में जस्टिस वी. मोहना की अनुपलब्धता के कारण मामले को 15 अक्टूबर (गुरुवार) के लिए स्थगित किया गया है।
- दोनों अदालतों में प्रार्थनाएं एक जैसे व्यापक विधिक मापदंडों के दायरे में आती हैं।
4. पीठ का दृष्टिकोण: ‘हम सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन क्षेत्र में समानांतर आदेश नहीं देंगे’
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांब्रे की पीठ ने संतुलन बनाते हुए टिप्पणी की: “हम ऐसे किसी भी क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना चाहते जो पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन (Sub judice in the Supreme Court) है। याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिकाओं की प्रतियां यहां रिकॉर्ड पर पेश करें ताकि हम दोनों कार्यवाहियों के दायरे का सही मूल्यांकन कर सकें।”
विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि और न्यायिक समानांतरता (Parallel Proceedings)
राजधानी में पिछले कुछ दिनों से चल रहे घटनाक्रम के कारण विधिक परिदृश्य दो शीर्ष न्यायिक मंचों पर बंट गया है:
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│ दिल्ली में SIR विरोधी प्रदर्शन और जंतर-मंतर विवाद │
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सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)】 【दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi HC)】
• राहुल गांधी व 11 विपक्षी नेताओं की याचिका (SIR प्रक्रिया) • व्यापारियों की SOP क्रियान्वयन याचिका (₹2,000 करोड़ नुकसान)
• जंतर-मंतर के डी-नोटिफिकेशन आदेश (11 अक्टूबर) को चुनौती • पुलिस के 2022 स्टैंडिंग ऑर्डर और 10-दिन अग्रिम नोटिस की वैधता
• हिरासत में लिए गए वकीलों, पत्रकारों व छात्रों की रिहाई • शांतिपूर्ण व्यापार बनाम सार्वजनिक प्रदर्शन का विधिक संतुलन
[सुनवाई 15 अक्टूबर को निर्धारित] [सुनवाई 16 अक्टूबर (शुक्रवार) को निर्धारित]
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- अनुच्छेद 19(1)(b) बनाम 19(1)(g) — अधिकारों का सह-अस्तित्व:
- संविधान का कोई भी मौलिक अधिकार निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। किसी एक समूह का सभा और विरोध करने का अधिकार किसी अन्य वर्ग (व्यापारियों, दुकानदारों, मरीजों और राहगीरों) के आने-जाने और व्यवसाय करने के अधिकार को पूर्णतः समाप्त नहीं कर सकता।
- शाहीन बाग निर्णय (अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त, 2020 – सुप्रीम कोर्ट):
- 3-जजों की पीठ ने दो टूक शब्दों में स्थापित किया था कि सार्वजनिक सड़कों, रास्तों और बाजारों पर अनिश्चित काल के लिए कब्जा करके प्रदर्शन नहीं किया जा सकता। विरोध केवल प्रशासन द्वारा निर्दिष्ट स्थलों (Designated Sites) पर ही होना चाहिए।
- मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) बनाम भारत संघ (2018):
- सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया था कि वह मध्य दिल्ली और जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए एक पारदर्शी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाए ताकि शहर के सामान्य जीवन और सुरक्षा के बीच न्यायोचित संतुलन बना रहे। व्यापारियों की वर्तमान याचिका इसी स्वीकृत SOP के जमीनी क्रियान्वयन की मांग कर रही है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अंशिका त्रिपाठी व अन्य बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार व अन्य [W.P.(C) 15285/2026 – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांब्रे और न्यायमूर्ति संजय शर्मा (खंडपीठ)
- सुनवाई की तिथि: 13 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 16 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं (व्यापारियों व अधिवक्ताओं) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सचिन पुरी एवं वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पोद्दार
- प्रतिवादी (केंद्र सरकार / दिल्ली पुलिस) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा
- दावा किया गया व्यावसायिक नुकसान: लगभग ₹2,000 करोड़ (कनॉट प्लेस व आसपास के बाजारों में)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(1)(b) (सभा का अधिकार) एवं अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार की स्वतंत्रता)
- दिल्ली पुलिस स्टैंडिंग ऑर्डर (SOP Guidelines) — सार्वजनिक प्रदर्शनों का विनियमन
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 163 (निषेधाज्ञा आदेश)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- समानुपातिकता और मौलिक अधिकारों का सामंजस्य: ‘सार्वजनिक असंतोष व्यक्त करने का अधिकार वैध है, परंतु यह अन्य नागरिकों के व्यवसाय और सार्वजनिक मार्गों तक पहुंच को बंधक नहीं बना सकता; प्रशासन द्वारा निर्धारित SOP का कड़ाई से पालन आवश्यक है।’
- वर्तमान स्थिति: केंद्र सरकार को निर्देश प्राप्त करने का आदेश; याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट में दायर संबंधित याचिकाओं की प्रतियां रिकॉर्ड पर पेश करने का निर्देश; विस्तृत सुनवाई शुक्रवार (16 अक्टूबर) को तय।
Delhi Traders: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| खंडपीठ | कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांब्रे एवं न्यायमूर्ति संजय शर्मा |
| याचिकाकर्ता | व्यापारियों और वकीलों के संघ (Traders & Lawyers Associations) |
| मुख्य मांग | प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए पूर्व-निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) को लागू करना। |
| आर्थिक प्रभाव | त्योहारी सीजन के दौरान दिल्ली के प्रमुख बाजारों में ₹2,000 करोड़ का नुकसान। |
| कानूनी स्थिति | हाईकोर्ट ने याचिका को सुनवाई योग्य मानते हुए केंद्र/पुलिस से जवाब मांगा; मामला 17 अक्टूबर (शुक्रवार) को फिर सुना जाएगा। |

