विवाद का मुख्य कारण (Cross-Charging Dispute)
- कॉरपोरेट खर्च और हेड ऑफिस की सेवाएं:आनंद (गुजरात) स्थित अमूल के हेड ऑफिस ने विज्ञापन, कानूनी सेवाओं, आईटी सिस्टम और प्रशासनिक परिचालन के लिए साझा खर्च किए थे। अमूल ने अपनी अलग-अलग राज्यों में पंजीकृत शाखाओं (Branches) और डिपो पर इन खर्चों के लिए आंतरिक बिलिंग या “क्रॉस-चार्जिंग” (Cross-Charging) नहीं की थी।
- जीएसटी विभाग का रुख और धारा 74 का इस्तेमाल:जीएसटी अधिकारियों का तर्क था कि एक ही संगठन की अलग-अलग राज्यों की शाखाएं कानून की नजर में अलग व्यक्ति (Distinct Entities) हैं, इसलिए हेड ऑफिस द्वारा दी गई सेवाओं पर टैक्स बनना चाहिए। विभाग ने धोखाधड़ी, तथ्यों को छिपाने और टैक्स चोरी का आरोप लगाते हुए धारा 74 (Section 74 CGST Act) के तहत 1 जनवरी 2025 को ₹43.43 करोड़ की मांग का आदेश जारी किया था।
गुजरात हाईकोर्ट का मुख्य निष्कर्ष और कानूनी आधार
- CBIC सर्कुलर और नियम 28 (Rule 28 of CGST Rules):अदालत ने केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) के स्पष्टीकरणों का हवाला देते हुए कहा कि यदि हेड ऑफिस ने कोई इनवॉइस जारी नहीं किया है और प्राप्तकर्ता शाखा पूरी इनपुट टैक्स क्रेडिट (Input Tax Credit – ITC) का दावा करने की पात्र है, तो ऐसी सेवाओं का मूल्य शून्य (Nil) माना जाना चाहिए।“चूंकि यह निर्विवाद है कि याचिकाकर्ता के HO ने अपनी शाखाओं को कोई टैक्स इनवॉइस जारी नहीं किया था, इसलिए CGST नियम 28 के तहत ऐसी सेवाओं का मूल्य ‘शून्य’ माना जाना अनिवार्य है, और परिणामस्वरूप कोई टैक्स देनदारी नहीं बनती।”
- टर्नओवर के आधार पर मनमाना टैक्स निर्धारण गलत:हाईकोर्ट ने माना कि सिर्फ इसलिए कि अमूल ने क्रॉस-चार्जिंग मैकेनिज्म नहीं अपनाया, विभाग अपनी मर्जी से टर्नओवर के अनुपात में खर्च बांटकर टैक्स देनदारी तय नहीं कर सकता।
- धोखाधड़ी/टैक्स चोरी का कोई मामला नहीं:सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अमूल ने अपने बही-खातों (Ledgers & Balance Sheet) में सारे खर्च दर्ज किए थे। केवल क्रॉस-चार्जिंग न अपनाने को जानबूझकर टैक्स चोरी या तथ्य छिपाना (Suppression of Facts) नहीं कहा जा सकता।
- राजस्व तटस्थता (Revenue Neutrality):अदालत ने स्वीकार किया कि यह मामला पूरी तरह से ‘रेवेन्यू न्यूट्रल’ था, क्योंकि यदि हेड ऑफिस शाखाओं पर टैक्स लगाता भी, तो शाखाओं को उस टैक्स का पूरा इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) मिल जाता, जिससे सरकार को कोई अतिरिक्त शुद्ध राजस्व प्राप्त नहीं होता।
अहमदाबाद: केंद्रीय माल एवं सेवा कर अधिनियम, 2017 (CGST Act, 2017) की धारा 25(4) व 25(5) के तहत एक ही विधिक इकाई के अलग-अलग पंजीकृत कार्यालयों को ‘विशिष्ट व्यक्ति’ (Distinct Persons) मानने का दायरा, CGST नियमावली, 2017 के नियम 28 का द्वितीय परंतुक (Second Proviso to Rule 28), हेड ऑफिस (HO) और शाखाओं/डिपो के बीच आंतरिक रूप से उत्पन्न सेवाओं (Internally Generated Services) की ‘क्रॉस-चार्जिंग’ (Cross-Charging) की अनिवार्यता, राजस्व तटस्थता का सिद्धांत (Principle of Revenue Neutrality – Full Input Tax Credit Eligibility), तथा केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) के स्पष्टीकरण परिपत्रों के आलोक में धारा 74 (धोखाधड़ी/तथ्यों को छिपाने की विस्तारित अवधि) के अनुचित उपयोग पर गुजरात उच्च न्यायालय ने कॉर्पोरेट जगत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कर फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति ए.एस. सुपेहिया और न्यायमूर्ति वैभवी डी. नानावटी की खंडपीठ ने ‘अमूल’ ब्रांड का विपणन करने वाली संस्था गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड (GCMMF) द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए अतिरिक्त आयुक्त, सेंट्रल जीएसटी (अहमदाबाद साउथ) द्वारा 1 जनवरी 2025 को पारित ₹43,43,12,441 (लगभग ₹43.43 करोड़) के एकीकृत जीएसटी (IGST) मांग आदेश, ब्याज और शास्ति को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया है।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘नियम 28 के तहत सेवा का मूल्य शून्य (Nil) माना जाएगा, अतः कोई कर देनदारी नहीं’
खंडपीठ ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) के परिपत्रों और CGST नियमों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी: “चूंकि प्रतिवादियों द्वारा इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं किया गया है कि याचिकाकर्ता (अमूल) के मुख्यालय (HO) ने विवादित सेवाओं के संबंध में अपनी शाखाओं और डिपो को कोई टैक्स इनवॉइस जारी नहीं किया है, इसलिए CGST नियमावली के नियम 28 के तहत ऐसी सेवाओं का मूल्य ‘शून्य’ (Nil) माना जाना अनिवार्य है, और परिणामस्वरूप, वर्तमान मामले में कोई कर देनदारी उत्पन्न नहीं होती है।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब प्राप्तकर्ता शाखा पूर्ण इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) की हकदार होती है और हेड ऑफिस ने कोई बिल/इनवॉइस नहीं काटा है, तो कानूनन घोषित मूल्य या इनवॉइस न होने की स्थिति में मूल्य ‘शून्य’ ही मान्य होगा।
2. ‘टर्नओवर के अनुपात में कर योग्य मूल्य निर्धारित नहीं किया जा सकता’:
- जीएसटी विभाग ने यह रुख अपनाया था कि चूंकि अमूल ने क्रॉस-चार्जिंग नहीं की, इसलिए हेड ऑफिस के कुल साझा खर्चों (विज्ञापन, आईटी, कानूनी सेवाएं आदि) को शाखाओं के टर्नओवर के अनुपात में बांटकर उस पर टैक्स वसूला जाएगा।
- उच्च न्यायालय ने इस फार्मूले को खारिज करते हुए कहा:“प्रतिवादी प्राधिकरण केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्ता ने क्रॉस-चार्जिंग तंत्र को नहीं अपनाया, आनुपातिक आधार (Proportionate basis) पर सेवाओं के मूल्य का निर्धारण नहीं कर सकते।”
3. ‘क्रॉस-चार्ज न करना स्वतः धोखाधड़ी या तथ्यों को छिपाना नहीं’:
- जीएसटी विभाग ने 5 साल की विस्तारित सीमा अवधि लागू करने के लिए CGST अधिनियम की धारा 74 (धोखाधड़ी, जानबूझकर गलत बयान या तथ्यों का दमन) का सहारा लिया था।
- अदालत ने इसे पूरी तरह अनुचित बताते हुए व्यवस्था दी:“सभी खर्च अमूल की नियमित बहीखातों, लेजरों और बैलेंस शीटों में दर्ज थे। केवल यह आरोप लगाना कि याचिकाकर्ता अपने हेड ऑफिस द्वारा शाखाओं को दी जाने वाली आंतरिक सेवाओं के संबंध में क्रॉस-चार्जिंग अपनाने में विफल रहा, स्वतः (Ipso facto) इस निष्कर्ष पर नहीं ले जा सकता कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर या कपटपूर्ण तरीके से कर का अपवंचन किया था या दुर्भावना से तथ्यों को छिपाया था।”
- अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की नजीर का हवाला दिया कि जांच के दौरान सामान्य जानकारी का पता चलना धोखाधड़ी का प्रमाण नहीं बन जाता।
4. राजस्व तटस्थता का सिद्धांत (Revenue Neutrality):
- खंडपीठ ने अमूल के इस ठोस तर्क को स्वीकार किया कि यह पूरा लेनदेन राजस्व-तटस्थ (Revenue-Neutral) था।
- यदि हेड ऑफिस शाखाओं पर टैक्स इनवॉइस जारी भी करता, तो शाखाएं उस चुकाए गए टैक्स का 100% इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) लेने की पूरी हकदार थीं। इससे सरकार को कोई अतिरिक्त राजस्व प्राप्त नहीं होता, इसलिए कर चोरी की मंशा का आरोप कानूनी रूप से टिक नहीं सकता।
विवाद का तथ्यात्मक घटनाक्रम एवं वित्तीय विवरण
| चरण / तिथि | घटनाक्रम एवं तथ्य |
| कर अवधि | जुलाई 2017 से मार्च 2019 (जीएसटी लागू होने के शुरुआती वित्तीय वर्ष)। |
| विवाद का केंद्र | आनंद (गुजरात) स्थित अमूल के हेड ऑफिस द्वारा संपूर्ण संगठन के लिए किए गए साझा कॉरपोरेट खर्च—जैसे राष्ट्रव्यापी विज्ञापन अभियान, कानूनी सेवाएं, केंद्रीकृत आईटी सिस्टम और सॉफ्टवेयर प्रबंधन। |
| जीएसटी विभाग का आक्षेप | विभाग का तर्क था कि अलग-अलग राज्यों में पंजीकृत अमूल की शाखाएं कानूनन ‘विशिष्ट व्यक्ति’ (Distinct Persons) हैं। हेड ऑफिस द्वारा इन शाखाओं को दी गई प्रशासनिक सेवाएं कर योग्य हैं और अमूल ने इनके लिए ‘क्रॉस-चार्ज’ बिलिंग न करके कर चोरी की है। |
| विभागीय आदेश (1 जनवरी 2025) | अतिरिक्त आयुक्त, सीजीएसटी (अहमदाबाद साउथ) ने धारा 74 के तहत ₹43.43 करोड़ का IGST, ब्याज और भारी जुर्माना लगाने का आदेश पारित किया। |
| हाईकोर्ट का फैसला (अक्टूबर 2026) | गुजरात हाईकोर्ट ने विभागीय आदेश को मनमाना, नियमों के प्रतिकूल और अधिकारिता-विहीन मानकर पूरी तरह निरस्त कर दिया। |
विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: क्रॉस-चार्जिंग और CGST नियम 28
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│ हेड ऑफिस-शाखा सेवाएं: विधिक मूल्यांकन का ढांचा │
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【CGST नियमावली: नियम 28 (परंतुक 2)】 【CBIC परिपत्र: आंतरिक सेवाएं】 【राजस्व तटस्थता एवं धारा 74】
• यदि प्राप्तकर्ता शाखा पूर्ण ITC के • यदि हेड ऑफिस ने आंतरिक सेवाओं पर • जहां टैक्स भुगतान और ITC क्लेम
लिए पात्र है, तो इनवॉइस में घोषित कोई इनवॉइस जारी नहीं किया है, तो समान हो, वहां वास्तविक कर हानि नहीं
मूल्य ही 'ओपन मार्केट वैल्यू' होगा। मूल्य को शून्य (Nil) माना जाएगा। होती; धारा 74 की कठोरता लागू नहीं।
- CGST नियमावली, 2017 का नियम 28:
- नियम 28 संबंधित पक्षों या अलग-अलग पंजीकृत शाखाओं के बीच आपूर्ति के मूल्यांकन को नियंत्रित करता है।
- इसका दूसरा परंतुक स्पष्ट रूप से कहता है कि जहां माल या सेवा का प्राप्तकर्ता पूर्ण इनपुट टैक्स क्रेडिट का पात्र है, वहां इनवॉइस में उल्लिखित मूल्य को ही खुला बाजार मूल्य (Open Market Value) माना जाएगा। यदि कोई इनवॉइस नहीं काटा गया और कोई राशि चार्ज नहीं की गई, तो विधिक मूल्य शून्य ही रहेगा।
- क्रॉस-चार्जिंग (Cross-Charging) बनाम इनपुट सर्विस डिस्ट्रीब्यूटर (ISD):
- जीएसटी परिषद और CBIC ने परिपत्रों (विशेष रूप से सर्कुलर संख्या 199/11/2023-GST) के माध्यम से यह स्पष्ट किया था कि आंतरिक कर्मचारियों की सेवाएं और हेड ऑफिस द्वारा शाखाओं को दिए जाने वाले समर्थन के लिए क्रॉस-चार्जिंग अनिवार्य नहीं है यदि इनवॉइस जारी न किया गया हो।
- विभाग ने इन स्थापित विनियामक स्पष्टीकरणों की अनदेखी करके ₹43 करोड़ से अधिक की काल्पनिक मांग सृजित की थी।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड (GCMMF / Amul) बनाम भारत संघ एवं केंद्रीय माल और सेवा कर विभाग [R/विशेष सिविल आवेदन (SCA) – गुजरात उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति ए.एस. सुपेहिया और न्यायमूर्ति वैभवी डी. नानावटी (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- संबद्ध पक्षकार:
- याचिकाकर्ता: गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड (अमूल)
- प्रतिवादी: अतिरिक्त आयुक्त, केंद्रीय जीएसटी एवं उत्पाद शुल्क (अहमदाबाद दक्षिण) व अन्य
- विवादित कर मांग: ₹43,43,12,441 (₹43.43 करोड़ IGST + ब्याज एवं जुर्माना – पूरी तरह निरस्त)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- केंद्रीय माल और सेवा कर अधिनियम, 2017 (CGST Act) — धारा 25(4) व (5) (विशिष्ट व्यक्ति), धारा 16 (इनपुट टैक्स क्रेडिट की पात्रता) एवं धारा 74 (धोखाधड़ी/दमन से संबंधित मांग की समय-सीमा)
- CGST नियमावली, 2017 — नियम 28 (संबंधित/विशिष्ट व्यक्तियों के बीच आपूर्ति का मूल्यांकन)
- CBIC स्पष्टीकरण परिपत्र (आंतरिक सेवाओं और क्रॉस-चार्जिंग का मूल्यांकन)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- क्रॉस-चार्जिंग और कर अपवंचन का भेद: ‘हेड ऑफिस द्वारा शाखाओं के साझा खर्चों पर इनवॉइस न काटना कर अपवंचन नहीं है; जहां प्राप्तकर्ता इकाई पूर्ण क्रेडिट की हकदार हो, वहां इनवॉइस के अभाव में सेवा का विधिक मूल्य शून्य रहेगा और टर्नओवर के आधार पर काल्पनिक मांग नहीं बनाई जा सकती।’
- अंतिम परिणाम: अमूल की याचिका पूरी तरह स्वीकार; 1 जनवरी 2025 का ₹43.43 करोड़ का टैक्स, ब्याज और पेनल्टी का मांग आदेश कानूनन अमान्य घोषित कर पूरी तरह निरस्त।
Amul Case: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | गुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति ए.एस. सुपहिया एवं न्यायमूर्ति वैभवी डी. नानावटी |
| याचिकाकर्ता | गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (Amul / GCMMF) |
| प्रतिवादी | केंद्रीय जीएसटी विभाग (अहमदाबाद साउथ) |
| विवादित कर मांग | ₹43,43,12,441 (अतिरिक्त ब्याज एवं पेनाल्टी) |
| विवादित अवधि | जुलाई 2017 से मार्च 2019 (जीएसटी की शुरुआती अवधि) |
| मुख्य निर्णय | ₹43.43 करोड़ का टैक्स नोटिस रद्द; क्रॉस-चार्जिंग न होने पर हेड ऑफिस सेवाओं का जीएसटी मूल्य ‘शून्य’ माना जाएगा। |

