Sunday, October 18, 2026
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Special Marriage: विवाह संपन्न कराने के लिए माता-पिता की सहमति या अनापत्ति प्रमाण पत्र की कोई कानूनी शर्त नहीं; विवाह अधिकारी अपनी मर्जी से अतिरिक्त शर्तें नहीं थोप सकते

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

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│विशेष विवाह अधिनियम (SMA), 1954 │
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│ धर्मनिरपेक्ष कानून │ │ असम लोक सेवा अधिकार │
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│ SMA का उद्देश्य नागरिकों को │ │ शादी का पंजीकरण 2012 के │
│ पर्सनल लॉ से परे जाकर सिविल │ │ RTPS एक्ट के तहत अधिसूचित │
│ लॉ में विवाह का अधिकार देना।│ │ समयसीमा में होना अनिवार्य। │
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  1. “धर्मनिरपेक्ष कानून में माता-पिता की सहमति की शर्त नहीं”:न्यायामूर्ति अरुण देव चौधरी ने अपने आदेश में कहा:“कानूनी योजना उन शर्तों को निर्दिष्ट करती है जिन्हें पक्षकारों द्वारा पूरा किया जाना है और उन प्रक्रियाओं को तय करती है जिनका पालन विवाह अधिकारी को करना है। जो व्यक्ति वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, उनके बीच विवाह के निष्पादन के लिए न तो माता-पिता की सहमति और न ही उनकी ओर से कोई अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) एक शर्त के रूप में निर्धारित है, क्योंकि यह एक धर्मनिरपेक्ष विधान (Secular Legislation) है जिसका उद्देश्य व्यक्तियों को किसी भी पक्ष के पर्सनल लॉ का पालन किए बिना सिविल मैरिज करने में सक्षम बनाना है।”
  2. लोक सेवा अधिकार अधिनियम (Assam RTPS Act, 2012) का संदर्भ:अदालत ने कहा कि विवाह का पंजीकरण असम राइट टू पब्लिक सर्विसेज एक्ट, 2012 के दायरे में आता है। इस कानून का उद्देश्य नागरिकों को तय समयसीमा के भीतर सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करना और लोक सेवकों की जवाबदेही तय करना है।
  3. विवाह अधिकारियों के लिए चेतावनी:यद्यपि कोर्ट ने विवाह अधिकारी की इस कार्रवाई को अनजाने में हुई चूक माना, लेकिन अधिकारियों को सख्त हिदायत दी कि वे भविष्य में लोक सेवा अधिकार अधिनियम के तहत निर्धारित समयसीमा का कड़ाई से पालन करें और वैधानिक आवश्यकताओं से परे कोई अनुचित मांग न करें।

गुवाहाटी: विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954 – SMA) की धारा 4 एवं धारा 5 (नागरिक विवाह के अनुष्ठापन की वैधानिक शर्तें एवं सूचना), वयस्क नागरिकों के अपने जीवनसाथी चुनने के व्यक्तिगत स्वायत्तता और मौलिक अधिकार (Right to Marry a Person of Choice under Article 21), विवाह अधिकारियों द्वारा मनमाने ढंग से माता-पिता की उपस्थिति या अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) मांगने की अवैध प्रशासनिक परिपाटी, तथा असम लोक सेवा अधिकार अधिनियम, 2012 (Assam Right to Public Services Act, 2012) के तहत तय समय-सीमा के भीतर विवाह पंजीकरण सेवाएं प्रदान करने के सांविधिक दायित्व पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।

विशेष विवाह अधिनियम एक धर्मनिरपेक्ष सिविल कानून है

न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की एकल पीठ ने विवाह अधिकारी द्वारा आवेदन पर कोई कार्रवाई न किए जाने के विरुद्ध दायर रिट याचिका का निस्तारण करते हुए स्पष्ट किया कि विशेष विवाह अधिनियम एक धर्मनिरपेक्ष सिविल कानून (Secular Legislation) है। यदि विवाह करने के इच्छुक दोनों पक्षकार अधिनियम की वैधानिक शर्तों (जैसे निर्धारित न्यूनतम आयु, वैध सहमति, और पूर्व विवाह न होना) को पूरा करते हैं, तो किसी भी प्राधिकारी के पास माता-पिता की सहमति मांगने या उनकी भौतिक उपस्थिति को अनिवार्य शर्त बनाने का कोई विधिक अधिकार नहीं है। अदालत ने विवाह अधिकारी को आगाह करते हुए निर्देश दिया कि वह असम लोक सेवा अधिकार अधिनियम, 2012 के तहत निर्धारित समय-सीमा का कड़ाई से पालन करे और याचिकाकर्ताओं के आवेदन पर विवाह संपन्न कराने की प्रक्रिया को अविलंब आगे बढ़ाए।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था

1. ‘माता-पिता की सहमति या NOC कानूनन आवश्यक नहीं’

न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी ने विशेष विवाह अधिनियम की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति और वैधानिक प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए दर्ज किया: “अधिनियम की सांविधिक योजना पक्षकारों द्वारा पूरी की जाने वाली शर्तों और विवाह अधिकारी द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से विनिर्दिष्ट करती है। वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा करने वाले व्यक्तियों के बीच विवाह संपन्न कराने के लिए न तो माता-पिता की सहमति (Parental Consent) और न ही माता-पिता से अनापत्ति प्रमाण पत्र (No Objection Certificate – NOC) कोई पूर्व-शर्त के रूप में निर्धारित है। विशेष विवाह अधिनियम एक धर्मनिरपेक्ष कानून (Secular Legislation) है, जिसका उद्देश्य व्यक्तियों को किसी भी पक्ष के व्यक्तिगत कानून (Personal Law) के अनुरूप चले बिना एक नागरिक कानून के तहत अपने विवाह को संपन्न कराने में सक्षम बनाना है।”

2. विवाह अधिकारियों की मनमानी पर रोक:

  • याचिकाकर्ताओं की मुख्य शिकायत थी कि विवाह अधिकारी ने उनके आवेदन को आगे बढ़ाने से केवल इस आधार पर मना कर दिया था कि उन्होंने अपने माता-पिता से ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) प्रस्तुत नहीं किया था और विवाह अधिकारी के समक्ष माता-पिता की भौतिक उपस्थिति सुनिश्चित नहीं कराई थी।
  • अदालत ने इसे पूरी तरह कानून के अधिकार क्षेत्र से बाहर (Ultra Vires) माना और स्पष्ट किया कि कोई भी प्रशासनिक अधिकारी अधिनियम की धारा 4 में उल्लिखित योग्यताओं के अतिरिक्त अपनी तरफ से कोई नई शर्त नहीं जोड़ सकता।

3. असम लोक सेवा अधिकार अधिनियम, 2012 की जवाबदेही:

  • उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि विवाह का पंजीकरण केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह असम लोक सेवा अधिकार अधिनियम, 2012 के तहत एक अधिसूचित ‘सार्वजनिक सेवा’ (Notified Public Service) है।
  • पीठ ने चेतावनी भरे स्वर में दर्ज किया:“यह न्यायालय असम लोक सेवा अधिकार अधिनियम, 2012 के अधिदेश की अनदेखी नहीं कर सकता, और विवाह का पंजीकरण भी उक्त अधिनियम के दायरे में आता है।चेतावनी के रूप में यह दर्ज किया जाता है कि 2012 का अधिनियम नागरिकों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर अधिसूचित सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करना सुनिश्चित करने और उस जिम्मेदारी को सौंपे गए लोक सेवक की जवाबदेही तय करने के नेक उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम

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│ विशेष विवाह पंजीकरण विवाद: प्रक्रियात्मक सफर │
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【विशेष विवाह अधिनियम के तहत अर्जी】 【विवाह अधिकारी की अवैध आपत्ति】 【गुवाहाटी हाईकोर्ट: वैधानिक राहत】
• बालिग जोड़े ने नागरिक कानून के तहत • विवाह अधिकारी ने प्रक्रिया रोकी; • कोर्ट ने स्पष्ट किया: न NOC चाहिए,
विवाह संपन्न कराने हेतु सूचना (Notice) कहा माता-पिता का NOC लाओ और उनकी न माता-पिता की भौतिक उपस्थिति।
का विधिवत आवेदन प्रस्तुत किया। भौतिक उपस्थिति दर्ज कराओ। • असम लोक सेवा अधिकार कानून की तय
समय-सीमा में विवाह कराने का आदेश।
चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं दलीलें
पक्षकारों की स्थितिदो वयस्क नागरिकों ने धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों से अलग हटकर विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत अपने विवाह को संपन्न और पंजीकृत कराने हेतु संबंधित विवाह अधिकारी के समक्ष आवेदन किया।
प्रशासनिक निष्क्रियता (Inaction)संबंधित विवाह अधिकारी ने आवेदन को लटकाए रखा और मौखिक रूप से यह शर्त रख दी कि जब तक लड़के और लड़की के माता-पिता का एनओसी (NOC) नहीं आएगा और वे कार्यालय में उपस्थित नहीं होंगे, तब तक नोटिस जारी नहीं होगा।
याचिकाकर्ताओं का तर्कअधिवक्ता डी. अकरम ने दलील दी कि दोनों पक्ष बालिग हैं और धारा 4 की सभी शर्तों को पूरा करते हैं। माता-पिता की सहमति की मांग करना व्यक्तिगत स्वायत्तता और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवनसाथी चुनने के अधिकार का हनन है।
राज्य का पक्षसरकारी वकील ने स्वीकार किया कि अधिकारी द्वारा की गई यह कार्रवाई अनजाने में और प्रक्रियात्मक गलतफहमी के कारण हुई थी, जिसका कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं था।
अदालत का अंतिम निर्देशविवाह अधिकारी की भूल को असावधानी मानते हुए अदालत ने याचिका का निस्तारण किया और निर्देश दिया कि असम लोक सेवा गारंटी अधिनियम की समय-सीमा में प्रक्रिया तुरंत पूरी की जाए।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: विशेष विवाह अधिनियम, 1954 का ढांचा

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│ विशेष विवाह अधिनियम, 1954: विधिक कसौटी │
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【धारा 4: विवाह की अनिवार्य विधिक शर्तें】 【धारा 5 व 6: सूचना और नोटिस बुक】 【व्यक्तिगत स्वायत्तता (अनुच्छेद 21)】
• दोनों पक्षों का कोई जीवित जीवनसाथी न हो। • 30 दिन की सार्वजनिक सूचना। • वयस्क नागरिकों को अपनी मर्जी से शादी
• पुरुष की आयु 21 वर्ष व महिला की 18 वर्ष। • केवल धारा 4 के उल्लंघनों पर ही का अधिकार है; परिवार या समाज की सहमति
• वैध सहमति देने में मानसिक रूप से सक्षम हों। कोई तीसरा पक्ष आपत्ति कर सकता है। विधिक अनिवार्यता नहीं हो सकती।
  • धारा 4 की बंद सूची (Exhaustive Conditions):
    • धारा 4 स्पष्ट करती है कि विशेष विवाह तभी संपन्न हो सकता है जब:
      1. किसी भी पक्ष का कोई जीवित जीवनसाथी (Spouse) न हो;
      2. दोनों पक्ष वैध सहमति देने में मानसिक रूप से सक्षम हों;
      3. पुरुष ने 21 वर्ष और महिला ने 18 वर्ष की आयु पूरी कर ली हो;
      4. दोनों पक्ष निषिद्ध नातेदारी की डिग्री (Degrees of Prohibited Relationship) के भीतर न आते हों (जब तक कि प्रथा इसकी अनुमति न दे)।
    • इस पूरी धारा में कहीं भी माता-पिता की सहमति, परिवार की स्वीकृति या परिजनों के अनापत्ति प्रमाण पत्र का कोई उल्लेख नहीं है।
  • सर्वोच्च न्यायालय की नजीरें (शक्ति वाहिनी और नवतेज जौहर):
    • शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ [(2018) 7 SCC 192] में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक व्यवस्था दी थी कि जब दो वयस्क आपसी सहमति से विवाह करने का निर्णय लेते हैं, तो न तो उनके माता-पिता, न ही खाप पंचायतें और न ही समाज का कोई वर्ग उनके इस निर्णय पर वीटो लगा सकता है। अपनी पसंद के साथी से विवाह करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है।
    • सफिया सुल्ताना बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (इलाहाबाद HC, 2021) में भी अदालतों ने माना है कि विवाह अधिकारियों द्वारा माता-पिता को नोटिस भेजना या उनकी सहमति मांगना निजता के अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन है।
  • असम लोक सेवा अधिकार अधिनियम, 2012 का प्रवर्तन:
    • इस कानून के तहत प्रत्येक लोक सेवक को नागरिकों को दी जाने वाली अधिसूचित सेवाओं के लिए एक निश्चित समय-सीमा में कार्य करना अनिवार्य है। यदि कोई अधिकारी अनाधिकृत आपत्तियां लगाकर प्रक्रिया में विलंब करता है, तो वह विभागीय जांच और जुर्माने का भागीदार हो सकता है।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • केस संदर्भ: याचिकाकर्ता बनाम विवाह अधिकारी, असम व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – गुवाहाटी उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
  • संबद्ध विषय: विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत माता-पिता की सहमति/NOC की अनिवार्यता का विधिक अभाव

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता डी. अकरम (Advocate D. Akram)
  • प्रतिवादी (राज्य/विवाह अधिकारी) की ओर से: सरकारी अधिवक्ता (Government Advocate)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) — धारा 4 (विवाह की वैधानिक शर्तें), धारा 5 (विवाह की सूचना) एवं धारा 7 (आपत्तियों की प्रक्रिया)
    • असम लोक सेवा अधिकार अधिनियम, 2012 (Assam Right to Public Services Act, 2012) — सेवाओं की समयबद्ध आपूर्ति एवं प्रशासनिक जवाबदेही
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन, स्वतंत्रता, निजता और साथी चुनने का मौलिक अधिकार) एवं अनुच्छेद 226
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • सिविल विवाह में व्यक्तिगत स्वायत्तता: ‘विशेष विवाह अधिनियम एक धर्मनिरपेक्ष कानून है; बालिग नागरिकों के बीच विवाह संपन्न कराने हेतु माता-पिता की सहमति या NOC की कोई कानूनी शर्त नहीं है और विवाह अधिकारी व्यक्तिगत कानूनों की अवधारणाओं या प्रशासनिक मनमर्जी से वैधानिक प्रक्रिया को बाधित नहीं कर सकते।’
  • अंतिम परिणाम: रिट याचिका का निस्तारण; विवाह अधिकारी की आपत्ति अवैध घोषित; अधिकारियों को असम लोक सेवा अधिकार कानून की निर्धारित समय-सीमा के भीतर आवेदन पर तेजी से कार्रवाई कर विवाह संपन्न कराने का अंतिम निर्देश।

Special Marriage: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतगुवाहाटी उच्च न्यायालय (Gauhati High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी
संबंधित कानूनविशेष विवाह अधिनियम, 1954 और असम लोक सेवा अधिकार अधिनियम, 2012
मुख्य विवादमैरिज ऑफिसर द्वारा माता-पिता की NOC और उनकी उपस्थिति न होने के आधार पर शादी का आवेदन रोकना।
मुख्य कानूनी सिद्धांत1. स्पेशल मैरिज एक्ट एक धर्मनिरपेक्ष कानून है, जिसमें माता-पिता की सहमति की कोई वैधानिक शर्त नहीं है।
2. विवाह पंजीकरण सेवा असम लोक सेवा अधिकार अधिनियम, 2012 के तहत आती है, जिसकी समयसीमा का पालन करना अनिवार्य है।
अदालत का अंतिम आदेशयाचिका का निपटारा; विवाह अधिकारी को निर्धारित समयसीमा में प्रक्रिया पूरी करने का कड़ा निर्देश।
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