सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश एवं रणनीतिक ढांचा
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│ बाल सुरक्षा एवं डिजिटल शिक्षा मॉडल │
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│विद्यार्थी │ │ शिक्षक │ │ माता-पिता │ │ सरकारें │
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│ Good/Bad Touch│ │ Grooming की │ │ Parental │ │ 1098/1930 का │
│ व Consent की │ │ पहचान व │ │ Controls व │ │ सतत प्रचार व │
│ शिक्षा। │ │ POCSO धारा 19│ │ बाल सुरक्षा │ │ मुफ्त काउंसलिंग│
│ │ │ का अनुपालन। │ │ वर्कशॉप। │ │ की व्यवस्था। │
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1. मुख्य पाठ्यक्रम (Core Curriculum) में डिजिटल सुरक्षा व यौन शिक्षा:
- NCERT व SCERT की जिम्मेदारी: NCERT और सभी राज्य SCERTs बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और अभिभावक विशेषज्ञों से परामर्श करके आयु-उपयुक्त पाठ्यक्रम विकसित करेंगे।
- सहमति व साथियों का सम्मान: बच्चों को अपने शरीर के अधिकारों के साथ-साथ साथियों की गरिमा का सम्मान करना सिखाया जाएगा, ताकि बिना सहमति के सहपाठियों की तस्वीरें या वीडियो कैप्चर/शेयर करने जैसी घटनाओं को रोका जा सके।
- चित्रमय व ऑडियो-विजुअल पाठ्य-सामग्री: देश में साक्षरता के विभिन्न स्तरों को ध्यान में रखते हुए चित्रमय प्रदर्शन, कहानियों और ऑडियो-विजुअल कंटेंट का उपयोग किया जाएगा।
2. स्कूलों में हेल्पलाइन्स का प्रदर्शन और कंटेंट फिल्टर:
- प्रत्येक कक्षा में नंबर प्रदर्शित हों: चाइल्ड हेल्पलाइन (1098), साइबर क्राइम हेल्पलाइन (1930), नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल और राज्य के नोडल अधिकारियों के विवरण हर क्लासरूम, हॉस्टल, लाइब्रेरी और कंप्यूटर लैब में स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किए जाएंगे।
- कंटेंट फिल्टर (Content Filters): स्कूलों, हॉस्टलों, ट्यूशन सेंटरों और चाइल्डकेयर संस्थानों के कंप्यूटर नेटवर्क और डिवाइसेस पर अश्लील या हानिकारक सामग्री ब्लॉक करने के लिए फिल्टर लगाना अनिवार्य होगा।
3. शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण (Teacher Training):
- ग्रूमिंग की पहचान: शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को ऑनलाइन उत्पीड़न, यौन शोषण और ग्रूमिंग (Grooming) के संकेतों को पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
- POCSO एक्ट धारा 19 व 21 का अनुपालन: यदि कोई बच्चा उत्पीड़न की घटना साझा करता है, तो POCSO अधिनियम की धारा 19 के तहत मामले की सूचना तुरंत पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU) को देना अनिवार्य है। धारा 21 के तहत सूचना छिपाने पर 1 साल तक की जेल हो सकती है। बच्चे की पहचान गोपनीय रखी जाएगी।
4. अभिभावकों (Parents) के लिए जागरूकता व ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अलर्ट:
- पेरेंटल कंट्रोल्स (Parental Controls): स्कूल समय-समय पर माता-पिता के लिए कार्यशालाएं आयोजित करेंगे ताकि वे बच्चों के ऑनलाइन जोखिमों, पैरेंटल कंट्रोल सेटिंग्स और तनाव के लक्षणों को समझ सकें।
- ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर वार्निंग प्रॉम्प्ट्स: यदि कोई अनजान वयस्क किसी बच्चे से जुड़ने या मैसेज करने का प्रयास करता है, या जब कोई यूजर CSEAM से जुड़े शब्द सर्च करता है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को चेतावनी (Cautionary Prompts) प्रदर्शित करनी होगी।
5. पीड़ितों के लिए निःशुल्क परामर्श व सतत सरकारी अभियान:
- मुफ्त काउंसलिंग व थेरेपी: केंद्र व राज्य सरकारें शोषण का शिकार हुए बच्चों के लिए प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों द्वारा निःशुल्क परामर्श और दीर्घकालिक थेरेपी (Free Counselling & Therapy) की व्यवस्था करेंगी।
- जन-जागरूकता अभियान: टीवी, सोशल मीडिया, एसएमएस, ओटीपी प्लेटफॉर्म और प्रिंट मीडिया के माध्यम से POCSO एक्ट और बाल सुरक्षा के उपायों का निरंतर और व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा।
नई दिल्ली: लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012) की धारा 19 एवं 21 (अपराध की अनिवार्य रिपोर्टिंग का विधिक दायित्व व विफलता पर दंडात्मक सजा), सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) के तहत बाल यौन शोषण व दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) की रोकथाम, स्कूलों के मूल पाठ्यक्रम (Core Curriculum) में आयु-उपयुक्त यौन शिक्षा (Age-Appropriate Sex Education) और डिजिटल सुरक्षा को शामिल करने की अनिवार्यता, शिक्षकों द्वारा ‘ग्रूमिंग’ (Grooming) और प्रताड़ना की पहचान, तथा संविधान के अनुच्छेद 21 व 39(f) के तहत बच्चों के गरिमापूर्ण विकास व सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक और व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री के प्रसार की रोकथाम मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए कहा कि तकनीकी उपायों और फिल्टरों से परे बच्चों की वास्तविक सुरक्षा तभी संभव है जब उन्हें स्वयं खतरे की पहचान करने और खुलकर बोलने के लिए सशक्त बनाया जाए।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि डिजिटल सुरक्षा और यौन शिक्षा दो अलग विषय नहीं बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अदालत ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों, NCERT, SCERTs और सभी शिक्षण संस्थानों को प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को जागरूक करने, शिक्षकों को प्रशिक्षित करने, और कक्षाओं व छात्रावासों में राष्ट्रीय चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 और साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 को अनिवार्य रूप से प्रदर्शित करने का आदेश दिया। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को प्रगति रिपोर्ट के हलफनामे के साथ होगी।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायिक निष्कर्ष एवं दिशानिर्देश
1. ‘डिजिटल सुरक्षा और यौन शिक्षा: एक ही सिक्के के दो पहलू’
खंडपीठ ने बच्चों के समग्र विकास और सुरक्षा की अंतर्निहित कड़ी को रेखांकित करते हुए दर्ज किया: “हमारा यह सुविचारित मत है कि डिजिटल सुरक्षा (Digital Safety) के प्रति जागरूकता और सकारात्मक यौन शिक्षा (Sex Education) दो अलग-अलग विषय नहीं हैं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, और इन्हें उसी रूप में संबोधित किया जाना चाहिए। बच्चों को प्रारंभिक आयु से ही इस बात से अवगत कराया जाना चाहिए कि उन्हें किन लोगों से मिलना और बातचीत करनी चाहिए; अनुचित अनुरोधों, इशारों और अनुचित चेष्टाओं (Inappropriate gestures and advances) की पहचान करने की क्षमता; अपने स्वयं के सम्मान और अपने आसपास के लोगों की गरिमा का आदर करना; और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि जब दुर्भाग्य से कोई अप्रिय या अनुचित घटना घटे, तो उन्हें किसके पास और कहाँ मदद के लिए जाना चाहिए। ये सभी चिंताएं और उपाय बच्चों के ऑनलाइन जीवन की सुरक्षा के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि बाहर की वास्तविक दुनिया में उनके जीवन के लिए।”
2. सुरक्षित व असुरक्षित स्पर्श और ‘सहमति’ (Consent) का प्राथमिक स्तर से शिक्षण:
- अदालत ने निर्देश दिया कि प्राथमिक विद्यालय स्तर (Primary Stage) से ही बच्चों को उनकी आयु के अनुरूप उनके शरीर, सुरक्षित स्पर्श और असुरक्षित स्पर्श (Safe & Unsafe Touch) के अंतर और सहमति (Consent) के बुनियादी महत्व के बारे में सिखाया जाए।
- साथियों की गरिमा का सम्मान और नॉन-कंसेंसुअल इमेज का प्रसार:
- पीठ ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कई बार बच्चे खुद अपने ही सहपाठियों या साथियों की अंतरंग तस्वीरें खींचते हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं, बिना यह समझे कि इसके गंभीर कानूनी और सामाजिक परिणाम क्या होंगे।
- इसलिए बच्चों को यह सिखाना अनिवार्य है कि वे अपने साथियों की गोपनीयता और गरिमा का सम्मान करें और किसी भी प्रकार के अनुचित डिजिटल आचरण से बचें।
3. NCERT और SCERTs द्वारा मूल पाठ्यक्रम (Core Curriculum) का निर्माण:
- सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि डिजिटल सुरक्षा और सकारात्मक यौन शिक्षा को स्कूलों के मूल पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए।
- इसका प्रारूप NCERT और राज्यों की SCERTs द्वारा बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और अभिभावक विशेषज्ञों के गहन परामर्श से तैयार किया जाएगा।
- सामग्री केवल सैद्धांतिक न होकर देश के विभिन्न भाषाई और साक्षरता स्तरों को ध्यान में रखते हुए सचित्र प्रस्तुतियों, चित्रों, कहानियों और ऑडियो-विजुअल प्रारूप में होनी चाहिए।
स्कूलों, छात्रावासों और कोचिंग संस्थानों के लिए अनिवार्य विधिक मानक
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│ संस्थानों हेतु अनिवार्य सुरक्षात्मक ढांचा: SC मानक │
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【हेल्पलाइन का सार्वजनिक प्रदर्शन】 【सामग्री फिल्टर और फायरवॉल】 【शिक्षकों का विशेष प्रशिक्षण】
• प्रत्येक कक्षा, छात्रावास, लाइब्रेरी, • स्कूल नेटवर्क और कंप्यूटर लैब में • ग्रूमिंग और दुर्व्यवहार की पहचान।
कंप्यूटर लैब व वेबसाइट पर 1098 और सख्त डिजिटल फिल्टर ताकि हानिकारक • POCSO की धारा 19 व 21 के तहत
1930 नंबर प्रमुखता से प्रदर्शित हों। सामग्री तक पहुंच रोकी जा सके। अनिवार्य रिपोर्टिंग का कानूनी दायित्व।
| विधिक मानक | सर्वोच्च न्यायालय के विशिष्ट निर्देश |
| हेल्पलाइन नंबरों का प्रदर्शन | बाल हेल्पलाइन 1098, राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल का विवरण और राज्य-स्तरीय नोडल अधिकारियों के संपर्क सूत्र प्रत्येक कक्षा, छात्रावास, पुस्तकालय और कंप्यूटर लैब में स्पष्ट रूप से चस्पा किए जाएं। इसे स्कूल की आधिकारिक वेबसाइट पर भी प्रदर्शित किया जाए। |
| कंटेंट फिल्टर (Content Filters) | स्कूलों, छात्रावासों, बाल देखरेख संस्थानों (CCIs), ट्यूशन और कोचिंग सेंटरों के कंप्यूटर नेटवर्क और उपकरणों पर अनिवार्य फिल्टर लगाए जाएं ताकि छात्र किसी भी हानिकारक या अनुचित सामग्री तक न पहुंच सकें। |
| शिक्षकों का ‘ग्रूमिंग’ प्रशिक्षण | शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को डिजिटल सुरक्षा, बच्चों के साथ होने वाली ऑनलाइन छेड़छाड़, ग्रूमिंग (Grooming) के लक्षणों और बच्चे द्वारा घटना साझा किए जाने पर संवेदनशील व सुरक्षित व्यवहार करने का विशेष प्रशिक्षण दिया जाए। |
| POCSO धारा 19 व 21 का अनुपालन | शिक्षकों को याद दिलाया जाए कि POCSO की धारा 19 के तहत किसी भी अपराध की आशंका की सूचना पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU) को देना अनिवार्य है। सूचना छिपाने या रिपोर्ट न करने पर धारा 21 के तहत 1 वर्ष तक का कारावास या जुर्माना हो सकता है। |
माता-पिता, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और सरकारों के लिए विस्तृत कार्ययोजना
1. माता-पिता (Parents) हेतु नियमित कार्यशालाएं:
- न्यायालय ने माना कि माता-पिता सुरक्षा की पहली दीवार हैं, किंतु वे अक्सर उस तकनीक से अनभिज्ञ होते हैं जिसे बच्चे इस्तेमाल करते हैं।
- स्कूलों को नियमित अंतराल पर कार्यशालाएं आयोजित करने का निर्देश दिया गया, जिसमें:
- बच्चों के सामने आने वाले ऑनलाइन खतरे और पैरेंटल कंट्रोल सेटिंग्स की जानकारी दी जाए।
- संकटग्रस्त या तनावग्रस्त बच्चे के व्यवहारिक बदलावों को पहचानने के तरीके सिखाए जाएं।
- बच्चों की निगरानी करते समय उनके साथ अविश्वास या गलतफहमी से बचते हुए संवाद स्थापित करने का प्रशिक्षण दिया जाए।
2. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर चेतावनी प्रॉम्प्ट्स (Cautionary Prompts):
- सोशल मीडिया और इंटरनेट बिचौलियों को निर्देश दिया गया कि वे बच्चों को सुरक्षित उपयोग, गोपनीयता सेटिंग्स और सहायता विकल्पों की समय-समय पर याद दिलाएं।
- जब भी कोई बच्चा किसी अज्ञात वयस्क व्यक्ति से जुड़ने, संदेश भेजने या बातचीत करने का प्रयास करे, तो स्क्रीन पर चेतावनी भरा प्रॉम्प्ट (Warning Prompt) प्रदर्शित होना चाहिए।
- जब कोई उपयोगकर्ता CSEAM से जुड़े संदेहास्पद शब्द खोजे, तो प्लेटफॉर्म को तत्काल कानूनी परिणाम की चेतावनी देनी होगी।
3. पीड़ितों के लिए निःशुल्क थेरेपी और मनोवैज्ञानिक परामर्श:
- सरकारों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया कि शोषण या दुर्व्यवहार के शिकार बच्चों को प्रशिक्षित पेशेवरों द्वारा निःशुल्क परामर्श (Free Counselling), मनोवैज्ञानिक सहायता और थेरेपी तब तक प्रदान की जाए जब तक आवश्यक हो।
- पीड़ित बच्चे के संपूर्ण मानसिक और शारीरिक पुनर्वास की सतत निगरानी हेतु फॉलो-अप तंत्र स्थापित किया जाए।
4. राष्ट्रव्यापी निरंतर जागरूकता अभियान:
- केंद्र और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों (NCPCR/SCPCRs) के सहयोग से टेलीविजन, सोशल मीडिया, एसएमएस, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स, समाचार पत्रों और सार्वजनिक स्थानों पर निरंतर अभियान चलाएं, न कि केवल छिटपुट औपचारिकता के रूप में।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 39(f) और राज्य का दायित्व:
- संविधान का अनुच्छेद 39(f) राज्य को यह सुनिश्चित करने का नीति-निदेशक सिद्धांत सौंपता है कि बच्चों को स्वतंत्रता और गरिमा की स्थितियों में स्वस्थ रूप में विकसित होने के अवसर दिए जाएं तथा उनके बचपन को नैतिक और भौतिक परित्याग व शोषण से बचाया जाए।
- अदालत के ये निर्देश इसी संवैधानिक आदेश को वास्तविक रूप में लागू करते हैं।
- POCSO अधिनियम की धारा 19 की अनिवार्य रिपोर्टिंग (Mandatory Reporting):
- कई मामलों में स्कूल प्रबंधन अपनी बदनामी के डर से या माता-पिता के दबाव में यौन दुर्व्यवहार के मामलों को दबाने का प्रयास करते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शब्दों में दोहराया कि POCSO की धारा 19 किसी भी व्यक्ति (विशेषकर शिक्षकों और प्राचार्यों) पर यह सांविधिक बाध्यता डालती है कि जैसे ही अपराध की जानकारी या आशंका हो, तुरंत पुलिस को सूचित किया जाए। ऐसा न करने पर धारा 21 के तहत आपराधिक दायित्व तय होगा।
- गोपनीयता और पीड़ित की पहचान की सुरक्षा (धारा 33(7) व धारा 74 JJ Act):
- अदालत ने जोर दिया कि जब कोई बच्चा किसी शिक्षक या काउंसलर के सामने अपनी बात रखे, तो बच्चे की पहचान की पूर्ण गोपनीयता रखी जाए ताकि बच्चा सामाजिक कलंक और प्रतिशोध के डर के बिना अपनी बात कह सके।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस व अन्य बनाम एस. हरीश व अन्य [विविध आवेदन संख्या 2553-2554/2026 – आपराधिक अपील संख्या 2161-2162/2024 – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (खंडपीठ)
- निर्णय/आदेश की तिथि: 15-17 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 10 दिसंबर 2026 (अनुपालन हलफनामा प्रस्तुत करने की अंतिम समय-सीमा)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) — धारा 19 (अपराध की अनिवार्य रिपोर्टिंग), धारा 21 (रिपोर्ट न करने पर सजा), धारा 15 (CSEAM का प्रतिषेध) एवं धारा 39 (परामर्श व पुनर्वास)
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 — धारा 67B एवं IT Rules, 2021
- किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act) — धारा 74 (पहचान प्रकटीकरण पर रोक)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन और सुरक्षा), अनुच्छेद 39(f) एवं अनुच्छेद 142
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- समग्र बाल सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही: ‘इंटरनेट और समाज में बच्चों की सुरक्षा केवल तकनीकी प्रतिबंधों से नहीं हो सकती; प्रारंभिक स्तर से ही सुरक्षित व असुरक्षित स्पर्श और सहमति की शिक्षा देना, स्कूलों में हेल्पलाइन नंबरों का प्रदर्शन और शिक्षकों का संवेदनशील प्रशिक्षण बच्चों के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का अपरिहार्य हिस्सा है।’
- अंतिम निर्देश: NCERT और SCERTs को तुरंत पाठ्यक्रम संशोधन करने, सभी स्कूलों में 1098 और 1930 नंबर प्रदर्शित करने, शिक्षकों और अभिभावकों हेतु अनिवार्य प्रशिक्षण सत्र आयोजित करने और केंद्र सरकार को 10 दिसंबर 2026 तक अनुपालन शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश।
Sex Education: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
| पाठ्यक्रम निर्माता | NCERT और सभी राज्यों के SCERTs (बाल मनोवैज्ञानिकों व विशेषज्ञों के परामर्श से) |
| जरूरी हेल्पलाइन | चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 |
| POCSO एक्ट का नियम | धारा 19: अपराध की सूचना देना अनिवार्य। धारा 21: सूचना न देने पर 1 साल तक की जेल या जुर्माना। |
| मुख्य लक्ष्य | स्कूलों में डिजिटल सुरक्षा, शिक्षकों का प्रशिक्षण, हेल्पलाइनों का प्रदर्शन और पीड़ितों को निःशुल्क दीर्घकालिक परामर्श व थेरेपी प्रदान करना। |
| अगली सुनवाई तिथि | केंद्र सरकार अनुपालन रिपोर्ट (Affidavit) के साथ 10 दिसंबर 2026 को प्रगति रिपोर्ट दे। |

