Friday, November 6, 2026
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ECI Row: CEC और चुनाव आयुक्तों को जीवनपर्यंत पूर्ण दीवानी व आपराधिक उन्मुक्ति संविधान के साथ छल; राष्ट्रपति व जजों से भी व्यापक सुरक्षा का कोई औचित्य नहीं

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याचिकाओं के मुख्य बिंदु और संवैधानिक तर्क

  1. संविधान पर धोखाधड़ी (Fraud on the Constitution):मनोज झा की याचिका में तर्क दिया गया है कि धारा 16 एक साधारण वैधानिक कानून के माध्यम से चुनाव आयुक्तों को ऐसा आजीवन अभयदान देती है, जो भारत के राष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपालों, सांसदों/विधायकों अथवा संवैधानिक अदालतों (SC/HC) के जजों को भी प्राप्त नहीं है। अनुच्छेद 324 में ऐसी असीमित छूट की कोई कल्पना नहीं की गई है।
  2. अंतिम समय में बिना बहस के जोड़ा गया संशोधन:याचिकाकर्ताओं ने उजागर किया कि धारा 16 मूल विधेयक (Bill) का हिस्सा नहीं थी। इसे संसद में पारित होने से ठीक पहले अंतिम समय में आधिकारिक संशोधन के रूप में लाया गया, बिना किसी सार्वजनिक परामर्श या संसदीय जांच के। इसके अतिरिक्त, यह ‘जजेज प्रोटेक्शन एक्ट, 1985’ (Judges Protection Act, 1985) की नकल है, लेकिन उसमें जजों के खिलाफ कार्रवाई के जो सुरक्षात्मक प्रावधान थे, उन्हें इसमें हटा दिया गया है।
  3. नागरिकों और मतदाताओं के विधिक उपचार पर रोक:अरुण अग्रवाल की याचिका में कहा गया कि यह प्रावधान मतदाताओं, उम्मीदवारों और पीड़ित नागरिकों से चुनाव आयुक्तों की कथित धांधली या गलत कार्यों के खिलाफ दीवानी व आपराधिक कानूनी उपचार (Remedies) छीन लेता है, जो कि कानून के शासन (Rule of Law) के विपरीत है।

सुनवाई के दौरान CJI की महत्वपूर्ण टिप्पणी (बार-बार याचिकाएं दायर करने पर रोष)

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्या कांत ने एक ही मुद्दे पर बार-बार नई याचिकाएं दायर करने की परिपाटी पर वकीलों को आगाह किया: “हमारी केवल यही गुजारिश है कि अब इस मुद्दे पर नई याचिकाएं दायर करना बंद करें, वरना लिखित उत्तर/हलफनामे (Pleadings) कभी पूरे ही नहीं हो पाएंगे। और केस फाइल करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि सभी कानूनी बिंदु पहले ही विस्तार से शामिल किए जा चुके हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो हमें मुख्य याचिका पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर ही नहीं मिलेगा। यदि किसी का कोई नया बिंदु छूट गया है, तो वे नई याचिका के बजाय चल रही कार्यवाही में पक्षकार (Impleadment) बनने की अर्जी दाखिल करें।”

मुख्य विधिक निष्कर्ष

1. चुनाव आयोग की जवाबदेही और कानून का शासन (Rule of Law):

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मुद्दे पर विस्तृत विचार करना भारत में ‘स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव’ (Free and Fair Elections) तथा संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुखों की न्यायिक जवाबदेही (Judicial Accountability) तय करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

2. न्यायिक समय का प्रबंधन:

CJI की सलाह से स्पष्ट है कि शीर्ष अदालत समान मुद्दों पर मुकदमों के अंबार को रोकने और मुख्य संवैधानिक चुनौती को प्राथमिकता से निपटाने के प्रति गंभीर है।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता एवं मनमानेपन पर रोक), अनुच्छेद 21 (विधि का शासन व निष्पक्ष न्यायिक उपचार), अनुच्छेद 32, 129, 215 व 226 (संवैधानिक अदालतों का न्यायिक पुनर्विलोकन व अवमानना क्षेत्राधिकार), तथा अनुच्छेद 324 (स्वतंत्र, निष्पक्ष व पारदर्शी चुनावों का संवैधानिक अधिदेश सहपठित चुनाव आयोग की स्वतंत्रता), मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) अधिनियम, 2023 (CEC and Other ECs Act, 2023) की धारा 16 (आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए कृत्यों हेतु पूर्ण दीवानी व आपराधिक अभियोजन पर आजीवन रोक), तथा न्यायिक संरक्षण अधिनियम, 1985 (Judges Protection Act, 1985) से तुलना के विधिक मानकों के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को प्राप्त विवादित पूर्ण विधिक संरक्षण पर केंद्र सरकार और भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) से जवाब तलब किया है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) और न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana) की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद डॉ. मनोज कुमार झा (Manoj Kumar Jha) और सामाजिक कार्यकर्ता व अधिवक्ता अरुण अग्रवाल (Arun Agrawal) द्वारा दायर अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय विधि मंत्रालय और निर्वाचन आयोग को औपचारिक नोटिस जारी किया।

शीर्ष अदालत ने इन याचिकाओं को पूर्व से लंबित एनजीओ ‘लोक प्रहरी’ (Lok Prahari) और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की याचिकाओं के साथ संबद्ध (Tag) करते हुए अंतिम सुनवाई हेतु 18 दिसंबर 2026 की तिथि निर्धारित की है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक ही विषय पर बार-बार नई याचिकाएं दाखिल करने की वकीलों की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि याचिकाओं की इस अनियंत्रित बाढ़ से लिखित दलीलें (Pleadings) पूरी होने में अनावश्यक विलंब होता है और अदालत का ध्यान मूल संवैधानिक चुनौती से भटकता है।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निर्देश एवं सीजेआई की टिप्पणियां

1. ‘याचिकाएं दाखिल करना बंद करें, वरना प्लीडिंग्स कभी पूरी नहीं होंगी; मूल मुद्दे से भटक जाएगा कोर्ट’:

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक ही कानूनी प्रश्न पर कई समानांतर जनहित याचिकाएं दाखिल करने पर बार के सदस्यों को आगाह करते हुए कहा: “हमारा बार से केवल यही एक विनम्र अनुरोध है कि अब नई याचिकाएं दायर करना बंद करें, अन्यथा अभिवचन और दलीलें (Pleadings) कभी पूरी नहीं हो पाएंगी। अतिरिक्त मुकदमे दायर करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि सभी कानूनी और संवैधानिक बिंदु पूर्व याचिकाओं में पहले ही व्यापक और विस्तार से (Exhaustively taken) उठाए जा चुके हैं। यदि याचिकाओं का तांता लगा रहा, तो हमें मुख्य मुद्दे (Main Issue) पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर कभी नहीं मिल सकेगा। हम किसी का रास्ता नहीं रोक रहे हैं, किंतु एक ही बात को दोहराना केवल मुख्य मामले में विलंब का कारण बनता है। यदि वास्तव में कोई अत्यंत महत्वपूर्ण नया बिंदु छूट गया है, तो अलग नई रिट याचिका दायर करने के बजाय लंबित कार्यवाही में ही पक्षकार बनने (Impleadment) का आवेदन देकर उस अतिरिक्त मुद्दे को उठाया जा सकता है।”

2. धारा 16 के दायरे की संवैधानिक समीक्षा:

  • पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पूर्व में जनवरी 2026 में एनजीओ लोक प्रहरी के मामले में इस प्रावधान पर अंतरिम रोक (Interim Stay) लगाने से इनकार कर दिया गया था, किंतु यह प्रश्न संवैधानिक परीक्षण का गंभीर विषय है कि क्या संसद किसी साधारण विधायी कानून के जरिए संवैधानिक पदाधिकारियों को अदालतों के न्यायिक क्षेत्राधिकार से पूर्णतः परे कर सकती है।

आक्षेपित धारा 16 का विधिक स्वरूप और याचिकाओं के मुख्य संवैधानिक आक्षेप

1. धारा 16 की सांविधिक संरचना (CEC Act, 2023): धारा 16 (कदाचार या विधिक दायित्व से पूर्ण संरक्षण): “कोई भी न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त या निर्वाचन आयुक्त है या रहा है (is or was a CEC or Election Commissioner), आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए या किए जाने के तात्पर्य वाले किसी कार्य, वस्तु या उच्चारित किए गए शब्द के संबंध में कोई भी दीवानी या आपराधिक कार्यवाही (Civil or Criminal Proceedings) न तो स्वीकार करेगा और न ही जारी रखेगा।”

2. मनोज झा की याचिका: ‘संविधान के साथ छल (Fraud on Constitution)’:

याचिकाकर्ता डॉ. मनोज कुमार झा की ओर से पेश अधिवक्ता फौजिया शकील (Advocate Fauzia Shakil) ने दलीलें रखीं:

  • आजीवन और अभूतपूर्व उन्मुक्ति: धारा 16 साधारण कानून के माध्यम से निर्वाचन आयुक्तों को ऐसा आजीवन कवच प्रदान करती है जो भारत के राष्ट्रपति, राज्यों के राज्यपालों (अनुच्छेद 361—जो केवल पद पर रहने के दौरान लागू होता है), सांसदों/विधायकों (अनुच्छेद 105/194) या संवैधानिक न्यायालयों के न्यायाधीशों को भी उपलब्ध नहीं है।
  • अनुच्छेद 324 के दायरे का अतिक्रमण: संविधान का अनुच्छेद 324(2) संसद को केवल सेवा शर्तें और नियुक्ति की प्रक्रिया तय करने की शक्ति देता है; यह शक्ति संसद को चुनाव आयुक्तों को जीवन भर के लिए न्यायिक जांच के दायरे से बाहर रखने (Beyond Judicial Scrutiny for Lifetime) का अधिकार नहीं देती।
  • विधायी छल व सुरक्षा तंत्र का लोप: मूल विधेयक में यह प्रावधान गायब था। संसद में पारित होने से ठीक पहले इसे अंतिम समय में एक आधिकारिक संशोधन के जरिए बिना किसी सार्वजनिक परामर्श के जोड़ा गया। यह प्रावधान वस्तुतः न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 की नकल है, किंतु उसमें से वह वैधानिक संतुलन हटा दिया गया जिसके तहत सरकार या न्यायपालिका जजों के खिलाफ जांच शुरू कर सकती है।

3. अरुण अग्रवाल की याचिका: ‘मतदाताओं और पीड़ितों के कानूनी उपचार का अपहरण’:

अधिवक्ता नेहा राठी (Advocate Neha Rathi) द्वारा प्रस्तुत याचिका के प्रमुख बिंदु:

  • निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल संविधान के तहत पहले से सुरक्षित है (सुप्रीम कोर्ट के जज के समान महाभियोग प्रक्रिया)। अतः उन्हें जवाबदेही से पूर्ण मुक्ति देने का कोई तर्कसंगत औचित्य नहीं है।
  • यदि कोई चुनाव आयुक्त चुनाव के दौरान जानबूझकर पक्षपात, जालसाजी, आचार संहिता उल्लंघन की अनदेखी या दुर्भावनापूर्ण कृत्य करता है, तो यह प्रावधान व्यथित मतदाताओं, उम्मीदवारों और नागरिकों से अनुच्छेद 32 और 226 के तहत दीवानी व आपराधिक उपचार प्राप्त करने का अधिकार छीन लेता है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2023–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
पीठमुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
आदेश की तिथि4 नवंबर 2026
अंतिम सुनवाई की नियत तिथि18 दिसंबर 2026
केस संदर्भडॉ. मनोज कुमार झा बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. … / 2026] एवं अरुण अग्रवाल बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. … / 2026]
संबद्ध लंबित याचिकाएं1. एनजीओ लोक प्रहरी (Lok Prahari) — (जनवरी 2026 में नोटिस जारी)
2. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) — (13 अक्टूबर 2026 को नोटिस जारी)।
चुनौती का मूल विषयमुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16।
प्रतिवादी पक्ष1. भारत संघ (केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय)
2. भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI)।
याचिकाकर्ताओं के मुख्य संवैधानिक आधार1. अनुच्छेद 14 व ‘विधि का शासन’: कोई भी संवैधानिक प्राधिकारी अपराध करने के बाद अभियोजन से निरपेक्ष छूट का दावा नहीं कर सकता; यह समानता के सिद्धांत के विपरीत है।
2. संवैधानिक न्यायालयों की शक्तियों का हनन (Articles 32, 129, 215, 226): एक साधारण संसदीय अधिनियम उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के रिट व अवमानना क्षेत्राधिकार को किसी अधिकारी के कृत्यों की जांच करने से नहीं रोक सकता।
3. अनुच्छेद 324 की मूल संरचना: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान का ‘मूल ढांचा’ (Basic Structure) हैं; यदि चुनाव आयुक्तों की जवाबदेही ही खत्म हो जाएगी, तो निष्पक्ष चुनाव की नींव कमजोर होगी।
अदालत का अंतरिम आदेशकेंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को विस्तृत जवाब दाखिल करने हेतु नोटिस जारी; सभी याचिकाओं को एक साथ टैग कर 18 दिसंबर 2026 को अंतिम निस्तारण हेतु सूचीबद्ध किया गया।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘संवैधानिक उन्मुक्ति (Article 361) बनाम सांविधिक उन्मुक्ति (Section 16)’

  • अनुच्छेद 361 और राष्ट्रपति/राज्यपाल की संवैधानिक उन्मुक्ति की सीमाएं:
    • भारत के संविधान का अनुच्छेद 361 देश के राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति) और राज्यों के संवैधानिक प्रमुखों (राज्यपालों) को व्यक्तिगत उन्मुक्ति प्रदान करता है।
    • महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अनुच्छेद 361(2) के तहत आपराधिक कार्यवाहियों से यह छूट केवल “उनके कार्यकाल के दौरान” (During their term of office) ही उपलब्ध रहती है। जैसे ही राष्ट्रपति या राज्यपाल पदमुक्त होते हैं, वे किसी भी पूर्व आपराधिक कृत्य हेतु सामान्य कानून और अदालतों के प्रति उत्तरदायी हो जाते हैं।
    • इसके विपरीत, 2023 के अधिनियम की धारा 16 में प्रयुक्त शब्दावली—“who is or was a CEC or Election Commissioner”—सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्हें आजीवन पूर्ण आपराधिक व दीवानी सुरक्षा देती है, जो संविधान के किसी भी अंग में किसी अन्य पद को हासिल नहीं है।
  • न्यायिक समीक्षा की आधारभूत संरचना (Basic Structure of Judicial Review):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती [(1973) 4 SCC 225] और एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ [(1997) 3 SCC 261] में यह निर्विवाद रूप से स्थापित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 के तहत प्रदत्त न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति संविधान का बुनियादी ढांचा है।
    • संसद कोई ऐसा सामान्य कानून नहीं बना सकती जो यह घोषणा करे कि किसी प्राधिकारी के कृत्य को अदालत में कभी चुनौती ही नहीं दी जा सकती। धारा 16 अदालतों के दरवाजे बंद करने (Ouster of Jurisdiction Clause) का प्रयास करती है, जो प्रथम दृष्टया शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत प्रतीत होती है।
  • ‘स्वतंत्र चुनाव’ बनाम ‘जवाबदेही से मुक्ति’ (The Anomaly of Accountability):
    • अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ [(2023) 6 SCC 1] में 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने रेखांकित किया था कि चुनाव आयोग को कार्यपालिका के दबाव से मुक्त होना चाहिए।
    • किंतु याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ‘कार्यपालिका से स्वतंत्रता’ का अर्थ ‘कानून से ऊपर होना’ (Above the Law) नहीं हो सकता। यदि आयोग के सदस्यों को पूर्ण उन्मुक्ति दे दी जाएगी, तो चुनाव प्रक्रिया में होने वाली धांधली या चुनावी कदाचार पर नागरिकों के पास कोई विधिक उपचार नहीं बचेगा।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
  • केस संदर्भ: डॉ. मनोज कुमार झा बनाम भारत संघ एवं अरुण अग्रवाल बनाम भारत संघ [Writ Petition (Civil) Group Matters / 2026]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • आदेश की तिथि: 4 नवंबर 2026
  • अंतिम सुनवाई की तिथि: 18 दिसंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: औपचारिक नोटिस जारी; केंद्र व निर्वाचन आयोग से जवाब तलब; लोक प्रहरी व ADR की याचिकाओं के साथ संबद्ध।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता डॉ. मनोज कुमार झा की ओर से: अधिवक्ता फौजिया शकील (Advocate Fauzia Shakil)।
  • याचिकाकर्ता अरुण अग्रवाल की ओर से: अधिवक्ता नेहा राठी (Advocate Neha Rathi)।
  • लंबित मुख्य याचिकाकर्ताओं (Lok Prahari / ADR) की ओर से: एनजीओ प्रतिनिधि व वरिष्ठ अधिवक्तागण।
  • भारत संघ (केंद्रीय विधि मंत्रालय) की ओर से: भारत के अटॉर्नी जनरल / सॉलिसिटर जनरल कार्यालय।
  • भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से: निर्वाचन आयोग के स्थायी विधि अधिकारी।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) अधिनियम, 2023 (CEC and Other ECs Act, 2023) — धारा 16 (न्यायालयों द्वारा दीवानी या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार करने पर प्रतिबंध)
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 14 — विधि के समक्ष समानता
      • अनुच्छेद 21 — प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय
      • अनुच्छेद 32 व 226 — संवैधानिक न्यायालयों का रिट क्षेत्राधिकार
      • अनुच्छेद 129 व 215 — न्यायालय अवमानना की शक्तियां
      • अनुच्छेद 324 — निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण
      • अनुच्छेद 361 — राष्ट्रपति व राज्यपालों का विधिक संरक्षण
    • न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 (Judges Protection Act, 1985) — धारा 3
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • संवैधानिक पदाधिकारियों की विधिक जवाबदेही और न्यायिक समीक्षा का मानक: ‘लोकतंत्र और विधि के शासन (Rule of Law) की अनिवार्य मांग है कि कोई भी व्यक्ति या संस्था—चाहे वह कितनी भी उच्च क्यों न हो—कानून से ऊपर नहीं हो सकती; साधारण संसदीय कानून द्वारा किसी संवैधानिक संस्था के सदस्यों को दीवानी व आपराधिक दायित्वों से आजीवन और पूर्ण उन्मुक्ति (Blanket Immunity) प्रदान करना संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 324 के मूल लोकतांत्रिक उद्देश्यों के साथ असंगत है; संसद अपने विधायी अधिकारों का प्रयोग करके संवैधानिक न्यायालयों (सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट्स) की न्यायिक समीक्षा और अवमानना शक्तियों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती; तथा यद्यपि संवैधानिक पदों को भयमुक्त होकर कार्य करने हेतु वैधानिक सुरक्षा आवश्यक है, किंतु यह सुरक्षा नागरिकों के विधिक उपचार प्राप्त करने के मौलिक अधिकार को समाप्त करने की सीमा तक विस्तृत नहीं हो सकती।’
  • वर्तमान स्थिति व भावी रूपरेखा: केंद्र सरकार और ECI को 18 दिसंबर 2026 से पूर्व अपना विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करना होगा; 18 दिसंबर को सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की पीठ इस बात पर निर्णायक सुनवाई करेगी कि क्या धारा 16 संविधान के बुनियादी ढांचे और शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करती है अथवा इसे निरस्त/सीमित किए जाने की आवश्यकता है।

ECI Row:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठCJI सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
याचिकाकर्ता1. डॉ. मनोज कुमार झा (RJD सांसद) | वकील: अधिवक्ता फौजिया शकील
2. अरुण अग्रवाल (अधिवक्ता व कार्यकर्ता) | वकील: अधिवक्ता नेहा राठी
प्रतिवादी पक्षकेंद्र सरकार (कानून एवं न्याय मंत्रालय) एवं भारत निर्वाचन आयोग (ECI)
चुनौतीपूर्ण कानून2023 के अधिनियम की धारा 16 (Section 16 of the CEC & Other ECs Act, 2023)
उल्लेखित संवैधानिक प्रावधानअनुच्छेद 14 (समानता), 21 (जीवन का अधिकार), 32, 129, 215, 226 और 324 (स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव)
अदालत का अंतरिम आदेशनोटिस जारी: केंद्र व ECI से जवाब मांगा गया; मामले को टैग कर 18 दिसंबर 2026 को सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया गया।
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