Wednesday, November 4, 2026
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Contempt Against Judge: ट्रायल जज हनी एम. वर्गीस के खिलाफ वकील गई हाईकोर्ट; खुली अदालत में वकील पर सोने और गैर-हाजिर रहने की टिप्पणी न्यायिक नहीं

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मामले की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

  1. ट्रायल जज की विवादित टिप्पणियां:अधिवक्ता मिनी का आरोप है कि 12 जनवरी 2026 को पीड़िता द्वारा दायर एक अर्जी पर सुनवाई के दौरान जज हनी एम. वर्गीज ने खुली अदालत में वकील, स्टाफ और मीडियाकर्मियों की उपस्थिति में टिप्पणी की थी कि मिनी ने ट्रायल के दौरान 10 दिनों से भी कम समय दिया, वे केवल आधे घंटे बैठती थीं और कार्यवाही के दौरान सोती थीं।
  2. दस्तावेजी सबूत और वकील का खंडन:अधिवक्ता मिनी ने इन मौखिक आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए साक्ष्य प्रस्तुत किए कि उन्होंने गवाहों के परीक्षण और बहसों के दौरान 200 से अधिक दिनों तक अदालत की कार्यवाही में सक्रिय रूप से भाग लिया। इन टिप्पणियों के मीडिया में प्रसारित होने के बाद उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और पेशेवर छवि खराब होने का सामना करना पड़ा।
  3. एडवोकेट जनरल (AG) का रुख:मिनी ने पहले हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और फिर केरल के एडवोकेट जनरल (AG) से आपराधिक अवमानना दर्ज करने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, 22 अप्रैल 2026 को AG ने सहमति देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि जज द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा अतिशयोक्तिपूर्ण (Excessive Language) हो सकती है, लेकिन यह अदालत की अवमानना के दायरे में नहीं आती। मिनी ने इसी प्रशासनिक आदेश को अब हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी है।
  4. मुख्य केस का संदर्भ (Actress Assault Verdict):ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2025 में मुख्य आरोपी पल्सर सुनी (Pulsar Suni) और पांच अन्य को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी, जबकि साजिश रचने के आरोपी फिल्म अभिनेता दिलीप (Actor Dileep) को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। सजा और बरी किए जाने दोनों के खिलाफ अपीलें केरल हाईकोर्ट में लंबित हैं।

मुख्य विधिक बिंदु

1. न्यायिक संयम और वकीलों का संरक्षण:

यह मामला रेखांकित करता है कि अदालतों द्वारा खुली सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं के आचरण पर की जाने वाली मौखिक टिप्पणियों (Obiter Dicta / Oral Remarks) की सीमाएं क्या होनी चाहिए, खासकर जब वे टिप्पणियां सार्वजनिक रूप से वकील की पेशेवर क्षमता पर सवाल उठाती हों।

2. सुनवाई की अगली तारीख:

केरल हाईकोर्ट अब 4 नवंबर 2026 को इस बिंदु पर विचार करेगा कि क्या एडवोकेट जनरल के इनकार के बावजूद हाईकोर्ट अपनी निहित शक्तियों (Inherent Powers) का प्रयोग करते हुए ट्रायल जज के खिलाफ अवमानना प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है या नहीं।

कोच्चि: भारत का संविधान के अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना दंडित करने का उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार), न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 15(1)(b) (महाधिवक्ता की सहमति से या सहमति से इनकार के खिलाफ अवमानना याचिका), धारा 16 (न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों और अन्य न्यायिक अधिकारियों द्वारा अवमानना का वैधानिक दायित्व / Contempt by Judge, Magistrate or other person acting judicially), खुली अदालत में न्यायिक आचरण की विधिक सीमाएं (Judicial Restraint & Propriety), तथा जजों द्वारा वकीलों के विरुद्ध की गई प्रतिकूल मौखिक टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने (Expunction of Adverse Remarks) के सिद्धांतों पर केरल उच्च न्यायालय में एक अत्यंत संवेदनशील और अभूतपूर्व याचिका दायर की गई है।

2017 के बहुचर्चित अभिनेत्री अपहरण और यौन उत्पीड़न मामले में पीड़िता (सर्वाइवर) की ओर से पेश होकर विशेष लोक अभियोजक का सहयोग करने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता टी.बी. मिनी (Advocate TB Mini) ने ट्रायल कोर्ट की तत्कालीन विशेष पीठासीन अधिकारी एवं वर्तमान जिला न्यायाधीश हनी एम. वर्गीस (Judge Honey M Varghese) के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग करते हुए केरल हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

याचिका में केरल के महाधिवक्ता (Advocate General – AG) के 22 अप्रैल 2026 के उस आदेश को सीधे चुनौती दी गई है, जिसके तहत जज वर्गीस के खिलाफ आपराधिक अवमानना शुरू करने की वैधानिक मंजूरी (Statutory Consent) देने से इनकार कर दिया गया था। अधिवक्ता मिनी की याचिका न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन (Justice PV Kunhikrishnan) की एकल पीठ के समक्ष सूचीबद्ध हुई, जिन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे आगे के विचारार्थ 4 नवंबर 2026 (बुधवार) के लिए नियत किया है।

याचिका में लगाए गए मुख्य कानूनी आधार एवं दलीलें

1. ‘न्यायिक अवलोकन नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त-न्यायिक व्यक्तिगत हमला था’:

अधिवक्ता टी.बी. मिनी ने याचिका में स्पष्ट किया है कि 12 जनवरी 2026 को खुली अदालत में जज हनी एम. वर्गीस द्वारा की गई टिप्पणियां किसी आदेश का हिस्सा नहीं थीं, बल्कि एक दुर्भावनापूर्ण हमला थीं: “ट्रायल जज द्वारा 12 जनवरी 2026 को की गई आक्षेपित टिप्पणी कोई न्यायिक अवलोकन (Judicial Observation) नहीं थी, बल्कि एक अतिरिक्त-न्यायिक व्यक्तिगत हमला (Extra-judicial Personal Assault) था, जिसे मीडिया ने याचिकाकर्ता के खिलाफ तुरंत एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। याचिकाकर्ता को अपने पेशे और आजीविका में अपूरणीय क्षति (Irreparable Injury) उठानी पड़ी है, क्योंकि मुवक्किलों और आम जनता के सामने उसकी छवि एक ‘अक्षम और गैर-जिम्मेदार वकील’ के रूप में पेश की गई, जिससे दशकों की कड़ी मेहनत से अर्जित उसकी पेशेवर प्रतिष्ठा पूरी तरह ध्वस्त हो गई।”

2. ’10 दिन नहीं, 200 से अधिक दिन ट्रायल में शामिल रही; झूठी टिप्पणी से जनता में भ्रम फैला’:

  • याचिका में ट्रायल रिकॉर्ड्स का हवाला देते हुए जज वर्गीस की उस कथित मौखिक टिप्पणी का खंडन किया गया है जिसमें कहा गया था कि ‘वकील 10 दिन से भी कम आईं, केवल आधा घंटा रुकीं और कार्यवाही के दौरान सोती रहीं’:
    • याचिकाकर्ता ने आधिकारिक केस डायरी और उपस्थिति पत्रों के आधार पर दावा किया कि वह गवाहों के परीक्षण और अंतिम बहस सहित 200 से अधिक कार्यदिवसों पर अदालत में प्रत्यक्ष उपस्थित रहीं।
    • जज की खुली अदालत में की गई इस गलत टिप्पणी को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और यूट्यूब चैनलों द्वारा सनसनीखेज बनाकर प्रसारित किया गया, जिससे जनता को यह विश्वास दिलाया गया कि वकील की लापरवाही के कारण ही मामले में कुछ मुख्य आरोपियों (अभिनेता दिलीप आदि) को बरी किया गया।

3. महाधिवक्ता (AG) द्वारा मंजूरी से इनकार का निर्णय त्रुटिपूर्ण:

  • केरल के महाधिवक्ता ने 22 अप्रैल 2026 को यह कहते हुए अवमानना की मंजूरी देने से इनकार कर दिया था कि जज द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा केवल “अत्यधिक या असंयमित भाषा” (Excessive or Extravagant Language) हो सकती है, किंतु यह अदालत की आपराधिक अवमानना का गठन नहीं करती।
  • याचिकाकर्ता ने दलील दी कि महाधिवक्ता ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों और खुली अदालत में वकीलों की मानहानि के दूरगामी प्रभाव का उचित विधिक मूल्यांकन नहीं किया। न्यायालय की अवमानना अधिनियम की धारा 16 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि न्यायाधीश भी अपने न्यायिक पद पर रहते हुए किए गए अवमाननापूर्ण आचरण के लिए उसी प्रकार उत्तरदायी हैं जैसे कोई सामान्य व्यक्ति।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2017–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयकेरल उच्च न्यायालय, एर्नाकुलम (संवैधानिक एवं अवमानना क्षेत्राधिकार)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन (Justice PV Kunhikrishnan) (एकल पीठ)
याचिका सूचीबद्ध होने की तिथि3 नवंबर 2026 (अगली सुनवाई 4 नवंबर 2026 को नियत)
केस संदर्भटी.बी. मिनी बनाम माननीय महानिबंधक, केरल उच्च न्यायालय व अन्य [TB Mini v The Hon’ble Registrar General & ors]
याचिकाकर्ताअधिवक्ता टी.बी. मिनी (Advocate TB Mini) — केरल उच्च न्यायालय की अधिवक्ता जिन्होंने 2017 अभिनेत्री यौन उत्पीड़न मामले में ट्रायल कोर्ट व हाईकोर्ट में पीड़िता की ओर से अभियोजन का सहयोग किया था।
प्रतिवादी पक्ष1. माननीय महानिबंधक (Registrar General), केरल उच्च न्यायालय
2. न्यायाधीश हनी एम. वर्गीस (Judge Honey M Varghese) — तत्कालीन विशेष सीबीआई/सत्र न्यायाधीश (एर्नाकुलम) एवं वर्तमान जिला न्यायाधीश (अलप्पुझा)।
3. महाधिवक्ता (Advocate General), केरल राज्य।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ताअधिवक्ता के. नंदिनी (Advocate K Nandini)।
विवाद का मूल उद्भव (12 जनवरी 2026)ट्रायल कोर्ट में एक अर्जी पर सुनवाई के दौरान विशेष न्यायाधीश हनी एम. वर्गीस ने कथित रूप से वकीलों, कोर्ट स्टाफ और पत्रकारों की मौजूदगी में टिप्पणी की कि वकील टी.बी. मिनी पूरे मुकदमे के दौरान 10 दिन भी नहीं आईं, केवल 30 मिनट रुकती थीं और कार्यवाही के दौरान सोती रहती थीं।
मूल मामले का फैसला (दिसंबर 2025)कोच्चि की विशेष अदालत ने दिसंबर 2025 में अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए मुख्य अभियुक्त पल्सर सुनील (Pulsar Suni) और 5 अन्य को दोषी ठहराया था, जबकि आपराधिक षड्यंत्र के कथित मास्टरमाइंड मलयालम अभिनेता दिलीप (Actor Dileep) को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। (इस फैसले के खिलाफ दोषियों और केरल राज्य सरकार की अपीलें वर्तमान में हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं)।
याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहतें1. जज हनी एम. वर्गीस के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना अधिनियम की धारा 16 के तहत अवमानना कार्यवाही शुरू करना।
2. महाधिवक्ता द्वारा 22 अप्रैल 2026 को सहमति से इनकार करने के आदेश को निरस्त करना।
3. न्यायिक अभिलेखों से उक्त सभी असंसदीय व प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाना (Expunction of Remarks)।
4. याचिकाकर्ता की प्रतिष्ठा बहाल करने हेतु आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करना और मीडिया/यूट्यूब से संबंधित अपमानजनक समाचारों को हटाने (Take Down) का निर्देश देना।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘जजों द्वारा अवमानना (धारा 16) और न्यायिक संयम की सीमाएं’

  • न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 16 का विधिक दायरा:
    • साधारणतः अवमानना की कार्यवाही वकीलों, पक्षकारों या आम जनता के खिलाफ चलाई जाती है। किंतु धारा 16(1) स्पष्ट रूप से कहती है:“कोई न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या अन्य व्यक्ति, जो न्यायिक रूप से कार्य कर रहा हो, अपने न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय की अवमानना करने के लिए उसी प्रकार दायी होगा, मानो वह कोई अन्य व्यक्ति हो…”
    • यद्यपि धारा 16(2) न्यायिक आदेशों में की गई टिप्पणियों को अपीलीय अदालतों के सुधार के अधीन मानकर संरक्षण देती है, किंतु यदि कोई जज खुली अदालत में बिना किसी साक्ष्य के किसी महिला अधिवक्ता पर अपमानजनक और झूठे आरोप लगाता है जो सीधे तौर पर उसकी आजीविका और पेशेवर प्रतिष्ठा को नष्ट करते हैं, तो वह “न्यायिक कार्य” (Judicial Function) के दायरे से बाहर होकर व्यक्तिगत कदाचार की श्रेणी में आ सकता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय की नज़ीरें: ‘न्यायिक संयम और अवांछित टिप्पणियां’:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने के.पी. तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य और हालिया निर्णयों में बार-बार रेखांकित किया है कि न्यायाधीशों के पास खुली अदालत में असीमित अधिकार नहीं होते कि वे डायस पर बैठकर वकीलों के चरित्र, उनकी कार्यशैली या शारीरिक स्थिति पर व्यंग्य करें।
    • किसी वकील पर “सोने” या “मुकदमे में भाग न लेने” जैसी अप्रमाणित टिप्पणी करना यदि मीडिया में हथियार बन जाए, तो उच्च न्यायालय के पास अनुच्छेद 215 और अपनी अंतर्निहित प्रशासनिक अधीक्षण शक्तियों के तहत उन टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने और पीड़ित वकील की प्रतिष्ठा को बहाल करने का पूर्ण अधिकार है।
  • महाधिवक्ता की सहमति (Section 15 Consent) का विधिक विकल्प:
    • धारा 15 के तहत यदि महाधिवक्ता आपराधिक अवमानना शुरू करने की सहमति देने से मना कर देता है, तो पीड़ित पक्ष सीधे उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर यह दर्शा सकता है कि महाधिवक्ता ने अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने में कानूनी भूल की है। उच्च न्यायालय चाहे तो एजी के इनकार को दरकिनार कर अपने दम पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) अवमानना का संज्ञान ले सकता है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: केरल उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ एर्नाकुलम (संवैधानिक रिट एवं अवमानना क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: टी.बी. मिनी बनाम माननीय महानिबंधक, केरल उच्च न्यायालय व अन्य [W.P.(C) / Contempt Petition No. … / 2026]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन (Justice PV Kunhikrishnan) (एकल पीठ)
  • कार्यवाही की स्थिति: प्रारंभिक सुनवाई संपन्न; अगली विचारणीय तिथि 4 नवंबर 2026।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (अधिवक्ता टी.बी. मिनी) की ओर से: अधिवक्ता के. नंदिनी (Advocate K Nandini)।
  • प्रतिवादी पक्ष की ओर से: उच्च न्यायालय प्रशासन के स्थायी वकील एवं केरल के महाधिवक्ता कार्यालय।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना दंडित करने की उच्च न्यायालय की शक्ति) एवं अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन और पेशेवर आजीविका का अधिकार)
    • न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971):
      • धारा 15(1)(b) — आपराधिक अवमानना का संज्ञान लेने हेतु महाधिवक्ता की सहमति की प्रक्रिया
      • धारा 16 — न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों या न्यायिक रूप से कार्य करने वाले अन्य व्यक्तियों द्वारा अवमानना (Contempt by Judges)
    • न्यायिक आचरण संहिता (Restatement of Values of Judicial Life, 1999) — न्यायालय कक्ष में पीठासीन अधिकारी का संयमित और तटस्थ आचरण
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • न्यायाधीशों द्वारा न्यायालय कक्ष में टिप्पणियों और अवमानना का विधिक मानक: ‘न्यायाधीशों को खुली अदालत में वकीलों या पक्षकारों के विरुद्ध अपमानजनक, व्यक्तिगत या अप्रमाणित टिप्पणियां करने से बचना चाहिए; न्यायिक संयम न्याय प्रशासन की गरिमा का अनिवार्य घटक है; न्यायालय की अवमानना अधिनियम की धारा 16 यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी पीठासीन अधिकारी कानून से ऊपर नहीं है; यदि किसी न्यायिक अधिकारी द्वारा की गई अनौपचारिक टिप्पणी किसी अधिवक्ता की व्यावसायिक प्रतिष्ठा और आजीविका को अपूरणीय क्षति पहुंचाती है, तो उच्च न्यायालय के पास महाधिवक्ता के इनकार को दरकिनार कर उस आचरण का परीक्षण करने, प्रतिकूल टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाने और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से ऐसी मानहानिकारक सामग्री को हटवाने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है।’
  • वर्तमान स्थिति व आगामी प्रक्रिया: 4 नवंबर 2026 को न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हीकृष्णन की पीठ इस विधिक प्रश्न पर सुनवाई करेगी कि क्या ट्रायल जज हनी एम. वर्गीस के खिलाफ प्रथम दृष्टया अवमानना की कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए अथवा क्या हाईकोर्ट प्रशासनिक या रिट क्षेत्राधिकार के तहत संबंधित टिप्पणियों को औपचारिक रूप से निरस्त कर याचिकाकर्ता की पेशेवर साख को संरक्षण प्रदान करेगा।

Contempt Against Judge: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court), कोच्चि
न्यायाधीशन्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हिकृष्णन (Justice PV Kunhikrishnan)
मामला/साइटेशनटी.बी. मिनी बनाम माननीय रजिस्ट्रार जनरल व अन्य (TB Mini v The Hon’ble Registrar General & Ors)
याचिकाकर्ताअधिवक्ता टी.बी. मिनी (पीड़िता की ओर से विशेष अभियोजक की सहयोगी वकील) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता के. नंदिनी
प्रतिवादी पक्षजज हनी एम. वर्गीज (पूर्व एरनाकुलम जिला जज, वर्तमान में अलाप्पुझा स्थानांतरित) एवं एडवोकेट जनरल कार्यालय
मूल विवाद12 जनवरी 2026 को सुनवाई के दौरान जज द्वारा अधिवक्ता पर “केवल 10 दिन आने, आधे घंटे बैठने और कार्यवाही में सोने” की कथित विवादित मौखिक टिप्पणी।
मुख्य मांगें1. जज वर्गीज के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करना।
2. एडवोकेट जनरल द्वारा मंजूरी न देने का आदेश निरस्त करना।
3. अदालती रिकॉर्ड से विवादित टिप्पणियां हटाना (Expunge) तथा मीडिया रिपोर्ट्स को ब्लॉक करना।
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