Monday, August 17, 2026
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Seniority norms: निचली अदालतों में न्यायाधीशों के करियर ठहराव पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता… सुनवाई शुरू

Seniority norms: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, देशभर में निचली अदालतों के न्यायाधीशों के करियर में “धीमी और असमान प्रगति” गंभीर चिंता का विषय है।

वरिष्ठता तय करने के लिए समान राष्ट्रीय मानदंड तय होंगे

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायिक सेवा (Higher Judicial Service – HJS) कैडर में वरिष्ठता तय करने के लिए समान राष्ट्रीय मानदंड तय करने की प्रक्रिया पर सुनवाई शुरू की। संविधान पीठ की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई कर रहे हैं। पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं।

युवा वकील न्यायिक सेवा में शामिल होने में हिचकते हैं: पीठ

पीठ ने कहा कि कई राज्यों में सिविल जज (Civil Judge) के रूप में सेवा शुरू करने वाले न्यायिक अधिकारी शायद ही कभी प्रधान जिला न्यायाधीश (Principal District Judge – PDJ) के पद तक पहुँच पाते हैं, उच्च न्यायालय में पदोन्नति की तो बात ही दूर है। “इस स्थिति के कारण कई योग्य युवा वकील न्यायिक सेवा में शामिल होने से हिचक रहे हैं।

वरिष्ठता तय करने के लिए समान मापदंड की जरूरत

अदालत ने 14 अक्टूबर को यह सवाल तय किया था — “उच्च न्यायिक सेवा कैडर में वरिष्ठता तय करने के लिए क्या मानदंड होने चाहिए?” सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मुख्य मुद्दे के साथ-साथ इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर भी विचार किया जा सकता है। पीठ यह भी देख रही है कि क्या सिविल जज (जूनियर डिवीजन) से पदोन्नति पाने वाले अधिकारियों के लिए जिला जज पदों का अलग कोटा तय किया जाना चाहिए, ताकि उन्हें करियर में निष्पक्ष अवसर मिल सकें।

वरिष्ठता बनाम योग्यता की बहस

अमाइकस क्यूरी (अदालत के सहयोगी) वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ भटनागर ने बताया कि ज़्यादातर राज्यों में पदोन्नतियां “वरिष्ठता” के आधार पर होती हैं, क्योंकि वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में लगभग सभी अधिकारियों को “अच्छा” या “बहुत अच्छा” दर्ज किया जाता है, जिससे योग्यता का अंतर मिट जाता है। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था से “पदोन्नत” (promotee) जजों को नुकसान होता है। 20 साल से ज़्यादा सेवा देने के बावजूद वे जिला जज या हाईकोर्ट जज बनने की “विचाराधीन सूची” में भी नहीं आते। “वरिष्ठता के चलते कई पदोन्नत अधिकारी रिटायर हो जाते हैं, जबकि प्रत्यक्ष भर्ती (direct recruit) वाले जज युवा होने के कारण लंबे समय तक पदोन्नति के पात्र रहते हैं,” उन्होंने कहा।

न्यायाधीशों के सवाल और आपत्तियाँ

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने भटनागर के सुझाव पर कहा, “अगर हम हर स्तर पर 1:1 अनुपात (promotee और direct recruit के बीच) लागू करेंगे, तो यह ‘कैडर के भीतर एक नया कैडर’ बना देगा।” न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने पूछा, “यदि 25 प्रतिशत विभागीय कोटा भी केवल वरिष्ठता से भरा जाएगा, तो फिर योग्यता के लिए प्रोत्साहन कहाँ बचेगा?” न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति बागची ने भी आगाह किया कि अत्यधिक विभाजन से न्यायिक ढांचे में असंतुलन पैदा हो सकता है।

आयु-अंतर और ठहराव का मुद्दा

अमाइकस ने न्यायमूर्ति शेट्टी आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि प्रमोटेड जज और डायरेक्ट रिक्रूट जजों के बीच औसतन 10 से 15 वर्ष का आयु-अंतर है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिविल जज बनने से पहले तीन साल की वकालत अनिवार्य करने के बाद भर्ती की आयु और बढ़ गई है, जिससे करियर ठहराव और गंभीर हो गया है।

  • आंध्र प्रदेश: प्रमोटेड – 48 वर्ष, डायरेक्ट रिक्रूट – 39 वर्ष
  • असम: प्रमोटेड – 51 वर्ष, डायरेक्ट रिक्रूट – 38 वर्ष
  • बिहार: प्रमोटेड – 54 वर्ष, डायरेक्ट रिक्रूट – 41 वर्ष

विभागीय परीक्षा वाले अधिकारी ‘बीच की पिसाई’ में

वरिष्ठ अधिवक्ता विभा दत्ता माखीजा ने विभागीय प्रतिस्पर्धी परीक्षा (LDCE) से नियुक्त जिला जजों की ओर से कहा,
“हम दो पाटों के बीच पिसे हुए हैं — प्रमोटेड समूह में गिने जाते हैं, लेकिन हमारे लिए निर्धारित लाभ नहीं मिलते।” उन्होंने मांग की कि LDCE अधिकारियों को अलग धारा (distinct stream) के रूप में मान्यता दी जाए।

प्रमोशन परीक्षा पर चेतावनी

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने आगाह किया कि यदि पदोन्नति केवल प्रतियोगी परीक्षा पर आधारित होगी, तो निचली अदालतों के युवा जज नियमित न्यायिक कार्य की बजाय परीक्षा की तैयारी में अधिक समय देंगे।
अमाइकस ने भी इस अवलोकन से सहमति जताई।

उच्च न्यायालय में पदोन्नति का असंतुलन

एक हस्तक्षेपकर्ता ने बताया कि बॉम्बे हाईकोर्ट में 2020 से केवल “प्रत्यक्ष भर्ती वाले जिला जजों” को ही उच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए विचार किया गया है, जबकि प्रमोटेड जज रिटायर हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह एक “संरचनात्मक असमानता” का संकेत है और इसे दूर करना आवश्यक है। अदालत ने मामले की आगे की सुनवाई बुधवार के लिए स्थगित कर दी।

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