Wife forgives Husband: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक असाधारण और भावुक मामले में फैसला सुनाते हुए एक व्यक्ति की जेल की सजा को कम कर दिया।
दहेज के लिए पत्नी काे आग लगाने का केस
जस्टिस विमल कुमार यादव ने पति राजू, सास बर्दी देवी और देवर शंभू की दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखा, लेकिन उनकी सजा को उनके द्वारा पहले ही जेल में बिताई गई अवधि (Period already undergone) तक सीमित कर दिया। दरअसल, आरोपी ने 25 साल पहले अपनी गर्भवती पत्नी को दहेज के लिए आग के हवाले कर दिया था। कोर्ट ने यह निर्णय तब लिया जब पीड़िता (पत्नी) ने स्वयं अदालत में पेश होकर कहा कि उसने अपने पति को माफ कर दिया है और अब वह उसके साथ रह रही है। यह मामला नवंबर 2000 का है, जब दिल्ली के राजापुरी में सविता नाम की महिला को उसके पति और ससुराल वालों ने कथित तौर पर दहेज के लिए जला दिया था।
घटना की पृष्ठभूमि (2000-2001)
- क्रूरता की पराकाष्ठा: अभियोजन पक्ष के अनुसार, जब सविता गर्भवती थी, तब उसके जेठ और सास ने उसके हाथ पकड़े और पति राजू ने उसे आग लगा दी।
- उपचार में देरी: घटना के बाद उसे अस्पताल ले जाने के बजाय उसके मायके भेज दिया गया, जहाँ उसे स्थानीय और आयुर्वेदिक उपचार मिला।
- देरी से FIR: सविता ने अपनी बेटी के जन्म के करीब 20 दिन बाद, यानी 13 अप्रैल 2001 को डाबरी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज कराई थी।
निचली अदालत का फैसला (2004)
- जनवरी 2004 में, ट्रायल कोर्ट ने तीनों को दोषी पाया था
- धारा 307 (हत्या का प्रयास): 7 साल की कड़ी सजा।
- धारा 498A (वैवाहिक क्रूरता): 1 साल की सजा।
- धारा 342 (बंधक बनाना): 6 महीने की सजा।
- दोषियों ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन उन्होंने अपनी ‘दोषसिद्धि’ को चुनौती नहीं दी, बल्कि केवल ‘सजा’ कम करने की गुहार लगाई।
हाई कोर्ट में ‘सुलह’ और ‘माफी’
सविता अपने पति और देवर के साथ हाई कोर्ट में पेश हुई। उसने हलफनामा दायर कर बताया कि वह अब अपने पति राजू के साथ रह रही है। उनके पांच बच्चे हैं, जिनमें से तीन का जन्म इस दर्दनाक घटना के बाद हुआ है। वह अब कोई कानूनी कार्रवाई नहीं चाहती क्योंकि मामला सुलझ गया है।
कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
निश्चित रूप से महिलाओं का दिल बहुत बड़ा होता है। इस स्तर पर दोषियों को फिर से जेल भेजना उस पारिवारिक संतुलन को बिगाड़ देगा जो पिछले 25 वर्षों में बहाल हुआ है।
राज्य सरकार का विरोध
अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) मुकेश कुमार ने सजा कम करने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि सविता के शरीर पर आज भी जलने के गहरे निशान मौजूद हैं। उसके मानसिक स्वास्थ्य पर जो ‘अदृश्य घाव’ लगे हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दहेज एक सामाजिक बुराई है जिसे सख्ती से निपटाना चाहिए। हालाँकि, कोर्ट ने माना कि आगे की जेल न केवल राजू के लिए, बल्कि सविता और उसके पांच बच्चों के भविष्य के लिए भी हानिकारक होगी।
मामले का सारांश (Quick Reference Table)
| विवरण | तथ्य |
| घटना का वर्ष | नवंबर 2000 |
| मुख्य धाराएं | IPC 307 (Attempt to Murder), 498A, 342/34 |
| निर्णय की तिथि | 4 मई, 2026 |
| कोर्ट का आदेश | दोषसिद्धि बरकरार, लेकिन सजा ‘बिताई गई अवधि’ तक कम। |
| न्यायाधीश | जस्टिस विमल कुमार यादव |
पारिवारिक शांति बनाम कानूनी दंड
अदालत ने स्वीकार किया कि यह मामला दहेज प्रणाली की बुराइयों और भौतिक संपत्तियों के प्रति मानवीय लालच का एक कड़वा वसीयतनामा है। लेकिन ‘न्याय के हित’ में, कोर्ट ने कानूनी कठोरता के बजाय पारिवारिक सद्भाव को प्राथमिकता दी, ताकि एक पुनर्जीवित रिश्ते और बच्चों के भविष्य को बचाया जा सके।

