Friday, October 2, 2026
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Criminal Proceeding: आपराधिक प्रक्रिया की ताकत संयम में भी निहित…भ्रष्टाचार मामले में बोला सुप्रीम कोर्ट

Criminal Proceeding: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, आपराधिक प्रक्रिया की ताकत जितनी जांच-पड़ताल में है, उतनी ही संयम में भी है।

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को किया रद्द

अदालत ने यह टिप्पणी एक भ्रष्टाचार मामले में 1997 में आरोपी बनाए गए व्यक्ति की बरी होने की स्थिति बहाल करते हुए की। शीर्ष अदालत ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जुलाई 2011 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी करने के फैसले को पलटकर उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने उस व्यक्ति को एक साल की सज़ा सुनाई थी। मामले में आरोपी जनवरी 1996 से सितंबर 1996 तक श्रम सहायक आयुक्त (Assistant Commissioner of Labour) के पद पर कार्यरत था।

निचली अदालत की विवेचना पर थोपी गई राय: सुप्रीम कोर्ट

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्र्रा और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का निर्णय “युक्तिसंगत था और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों पर दृढ़ता से आधारित था। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने निचली अदालत की विस्तृत विवेचना से न तो कोई असहमति दिखाई और न ही उसके तर्कों का विश्लेषण किया, बल्कि अपनी राय थोप दी, जबकि साक्ष्यों में कई “गंभीर कमियां” थीं। अदालत ने कहा, “आपराधिक प्रक्रिया की ताकत संयम जितनी ही जांच में भी निहित है। जब बरी किए जाने का निर्णय तर्कसंगत आधार पर लिया गया हो, तो उसे बरकरार रहना चाहिए।”

श्रमिक ठेके के लाइसेंस नवीनीकरण में रिश्वत का मामला

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी ने एक श्रमिक ठेके के लाइसेंस को नवीनीकृत करने के लिए शिकायतकर्ता से 9,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने नवंबर 2003 में आरोपी को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि “रिश्वत की मांग और स्वीकार करने का आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुआ। राज्य सरकार ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील की थी, जिसके बाद आरोपी को दोषी ठहराया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “संदेह कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।”

शिकायतकर्ता की गवाही मामले में एकमात्र आधार

पीठ ने कहा कि इस मामले में रिश्वत की मांग और स्वीकार करने का एकमात्र आधार शिकायतकर्ता की गवाही थी, जिसकी पड़ताल में गंभीर खामियां सामने आईं। अदालत ने यह भी कहा कि ठेका श्रमिक नियमन अपने आप में एक “संवेदनशील और दस्तावेज़-आधारित प्रक्रिया” है और यदि कोई अधिकारी आवश्यक दस्तावेजों की मांग करता है, तो इसे भ्रष्टाचार का संकेत नहीं माना जा सकता। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित “बरी करने का आदेश” बहाल कर दिया।

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