Friday, October 2, 2026
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Delays in framing: देशभर में आरोप तय करने में हो रही देरी… सुप्रीम कोर्ट सख्त

Delays in framing: आपराधिक मामलों में आरोप तय करने में हो रही अत्यधिक देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है।

न्यायपालिका में लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने बुधवार को कहा कि इस समस्या से निपटने के लिए पूरे देश के लिए एक समान दिशा-निर्देश (Pan-India Guidelines) जारी करने की जरूरत है। कोर्ट ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सहायता मांगी है। अदालत ने कहा कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी कई बार तीन से चार साल तक आरोप तय नहीं किए जाते, जिससे मुकदमों की सुनवाई वर्षों तक अटकी रहती है और न्यायपालिका में लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

चार्जशीट दाखिल होने के महीनों बाद आरोप तय नहीं होते

पीठ ने कहा, हमने बार-बार देखा है कि चार्जशीट दाखिल होने के महीनों और वर्षों बाद तक भी आरोप तय नहीं होते। जब तक आरोप तय नहीं होंगे, मुकदमे की सुनवाई शुरू ही नहीं हो सकती। यह स्थिति ज्यादातर अदालतों में देखने को मिल रही है, इसलिए अब देशव्यापी दिशा-निर्देश जारी करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा को मामले में अमाइकस क्यूरी (न्यायालय के सहयोगी वकील) नियुक्त किया है और कहा कि इस पर दो हफ्ते बाद फिर सुनवाई की जाएगी।

आरोपी की जमानत याचिका से जुड़ा था मामला

मामला बिहार के एक आरोपी की जमानत याचिका से जुड़ा था, जिसमें वकील ने बताया कि चार्जशीट दाखिल हुए दो साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक आरोप तय नहीं हुए।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत सेशन कोर्ट में चलने वाले मामलों में आरोप पहली सुनवाई के 60 दिन के भीतर तय किए जाने चाहिए।न्यायमूर्ति कुमार ने कहा, “आपराधिक मामलों में देरी का मुख्य कारण आरोप तय न होना है, जबकि दीवानी मामलों में मुद्दे तय न करने से सुनवाई लटकती रहती है। आखिर आरोप तय करने में वर्षों का समय क्यों लगना चाहिए?

पूर्व हाईकोर्ट जज और वरिष्ठ अधिवक्ता से मांगी सहायता

कोर्ट ने इस मुद्दे पर पूर्व हाईकोर्ट जज और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. नागमुथु की सहायता भी मांगी है। सुनवाई के दौरान बिहार सरकार के वकील ने स्वीकार किया कि राज्य में चार्जशीट दाखिल होने और आरोप तय होने के बीच लंबे अंतराल की समस्या है। वहीं महाराष्ट्र के वकील ने बताया कि वहां भी स्थिति लगभग वैसी ही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की ही एक अन्य पीठ ने महाराष्ट्र में ऐसे 600 से अधिक मामलों पर चिंता जताई थी, जिनमें अब तक आरोप तय नहीं हुए हैं, और इसे “मामलों के लंबित रहने की चौंकाने वाली स्थिति” बताया था।

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