Wednesday, August 5, 2026
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Converted Christians: पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक लगाने वाले बैनर असंवैधानिक नहीं…हाईकोर्ट का आदेश

Converted Christians: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आठ गांवों में “धर्मांतरित ईसाइयों” के प्रवेश पर रोक लगे वाले होर्डिंग्स को लेकर दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

ग्राम सभाओं ने एहतियाती कदम के तौर पर लगाए थे बैनर

दरअसल, इन बैनर में पादरियों और “धर्मांतरित ईसाइयों” के प्रवेश पर रोक लगाई गई थी। कोर्ट ने कहा कि ये बैनर जबरन या लालच देकर धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए थे, इसलिए इन्हें असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की डिवीजन बेंच ने कहा कि ये होर्डिंग्स ग्राम सभाओं ने एक एहतियाती कदम के तौर पर लगाए हैं, ताकि आदिवासी परंपरा, पहचान और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की जा सके।

यह था याचिका दायर करनेवालाें का दावा

यह आदेश 28 अक्टूबर को कांकेर जिले के दिगबल टांडी और बस्तर जिले के नरेंद्र भवानी की ओर से दाखिल याचिकाओं पर सुनाया गया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि इन बैनरों के जरिए ईसाई समुदाय और उनके धार्मिक नेताओं को गांव की मुख्यधारा से अलग किया जा रहा है। याचिकाओं में यह भी दावा किया गया था कि पंचायत विभाग ने “हमारी परंपरा हमारी विरासत” नाम से एक शपथ/प्रस्ताव पारित करने का निर्देश दिया था, जिसके असली मकसद के तहत ग्राम पंचायतों को पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक लगाने को कहा गया।

कांकेर के भानुप्रतापपुर तहसील के घोटिया ग्राम पंचायत ने लगाया था बैनर

कांकेर के भानुप्रतापपुर तहसील के घोटिया ग्राम पंचायत ने एक बैनर लगाया था जिसमें लिखा था कि यह गांव पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आता है और PESA एक्ट, 1996 यहां लागू है। ग्रामसभा को अपनी पहचान और संस्कृति की रक्षा का अधिकार है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इस प्रस्ताव के बाद बाहरी पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों को गांव में धार्मिक कार्यक्रम या धर्मांतरण के लिए आने से रोका जा रहा है, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय में डर का माहौल है। ऐसे ही बैनर कुदाल, परवी, जुनवानी, घोटा, हवाचुर, मुसुरपुट्टा और सुलांगी गांवों में भी लगाए गए हैं।

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने यह दलील दी

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने दलील दी कि ग्रामसभा संविधान या कानून के खिलाफ कोई प्रस्ताव नहीं पारित कर सकती और यह बैनर अनुच्छेद 25 के तहत नागरिकों को मिले धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता वाई.एस. ठाकुर ने कोर्ट को बताया कि PESA नियमों के तहत ग्रामसभा को स्थानीय संस्कृति, देवी-देवता स्थलों, पूजा-पद्धति, गोठुल और धूमकुड़िया जैसी संस्थाओं तथा सामाजिक परंपराओं की रक्षा करने का अधिकार है।

एससी जाति के लोगों का लालच देकर किया जा रहा अवैध धर्मांतरण

ठाकुर ने कहा कि इन बैनरों में साफ लिखा है कि गांव के अनुसूचित जनजाति के लोगों का लालच देकर अवैध धर्मांतरण किया जा रहा है, जिससे उनकी सांस्कृतिक पहचान और विरासत को नुकसान पहुंच रहा है। इसलिए ग्रामसभाओं ने केवल उन बाहरी पादरियों पर रोक लगाई जो अवैध धर्मांतरण में शामिल थे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी व्यक्ति को ग्रामसभा के फैसले पर आपत्ति थी, तो वह उपखंड अधिकारी (राजस्व) के समक्ष अपील कर सकता था। लेकिन याचिकाकर्ताओं ने यह वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाए बिना ही जनहित याचिका दायर कर दी, जो स्वीकार्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया गया हवाला

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा, “लालच या छल से जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए लगाए गए बैनर असंवैधानिक नहीं माने जा सकते।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को पहले वैधानिक विकल्पों का उपयोग करना चाहिए था। अगर उन्हें यह आशंका है कि उन्हें अपने ही गांव में प्रवेश से रोका जाएगा या किसी प्रकार का खतरा है, तो वे पुलिस से सुरक्षा की मांग कर सकते हैं।

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