Sunday, August 30, 2026
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Article 142 POCSO: सुप्रीम कोर्ट ने प्यार को माना ‘जुर्म नहीं’, कहा- ‘वासना नहीं, यह प्रेम का मामला’

Article 142 POCSO: सुप्रीम कोर्ट ने अपने संवैधानिक विशेषाधिकारों का इस्तेमाल करते हुए एक अनोखे मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।

POCSO एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द

अदालत ने एक व्यक्ति के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया, जिसने नाबालिग उम्र में एक लड़की से संबंध बनाए थे और बाद में उसी से शादी कर ली। कोर्ट ने कहा कि यह संबंध “वासना का नहीं, बल्कि प्रेम का परिणाम” था। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने कहा कि अब महिला अपने पति के साथ खुशहाल विवाहित जीवन बिता रही है और दोनों का एक साल का बेटा भी है। इतना ही नहीं, महिला के पिता ने भी अदालत में अपने दामाद के खिलाफ केस खत्म करने का समर्थन किया।

संविधान सुप्रीम कोर्ट को ‘पूर्ण न्याय’ करने की शक्ति देता है

बेंच ने टिप्पणी की, “हम जानते हैं कि अपराध केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि पूरे समाज के खिलाफ होता है। लेकिन न्याय का प्रशासन व्यावहारिक वास्तविकताओं से अलग नहीं हो सकता।” कोर्ट ने कहा कि न्याय का उद्देश्य केवल कठोरता नहीं, बल्कि करुणा और संवेदनशीलता भी है। “हर मामले में न्याय की प्रक्रिया में संतुलन जरूरी है — दृढ़ता और दया दोनों का। अदालत ने कहा कि संविधान सुप्रीम कोर्ट को ‘पूर्ण न्याय’ करने की शक्ति देता है और इस मामले में वही किया गया है।

यह रिश्ता शोषण पर नहीं बल्कि प्रेम पर आधारित था: अदालत

कोर्ट ने माना कि सामान्य परिस्थितियों में ऐसे गंभीर अपराधों को समझौते के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन इस मामले में पीड़िता खुद पति के साथ रहना चाहती है और उसके प्रति सहानुभूति दिखाना ही न्याय का सही अर्थ होगा। फैसले में कहा गया, “यह रिश्ता शोषण पर नहीं बल्कि प्रेम पर आधारित था। आरोपी और पीड़िता अब कानूनी तौर पर पति-पत्नी हैं और एक बच्चा भी है। यदि अभियोजन जारी रहा तो यह उनके पारिवारिक जीवन और समाज की संरचना को भी चोट पहुंचाएगा।”

अनुच्छेद 142 का प्रयोग

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग करते हुए व्यक्ति की सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया, ताकि “पूर्ण न्याय” किया जा सके। हालांकि अदालत ने चेतावनी भी दी कि व्यक्ति को अब जीवनभर अपनी पत्नी और बच्चे का सम्मानपूर्वक पालन-पोषण करना होगा। कोर्ट ने कहा, “यदि भविष्य में उसने अपने दायित्वों से मुंह मोड़ा और यह बात अदालत के संज्ञान में आई, तो परिणाम सुखद नहीं होंगे।” सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला विशेष परिस्थितियों में दिया गया है और इसे किसी अन्य मामले में नज़ीर (precedent) के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

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