Monday, August 17, 2026
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Muslim man’s second marriage: पहली पत्नी चुपचाप दर्शक नहीं बन सकती…जानें केरल हाईकोर्ट की टिप्पणी

Muslim man’s second marriage: केरल हाईकोर्ट ने कहा कि महिला पुरुष की दूसरी शादी के रजिस्ट्रेशन से पहले पहली पत्नी से राय लेना होगा।

धर्म से अधिक संवैधानिक अधिकार सर्वोपरि हैं

न्यायमूर्ति पी. वी. कुन्हीकृष्णन (Justice P.V. Kunhikrishnan) ने कहा कि इस मामले में धर्म से अधिक संवैधानिक अधिकार सर्वोपरि हैं, इसलिए जब दूसरी शादी के रजिस्ट्रेशन की बात आती है तो रूढ़िगत या धार्मिक प्रथाएं लागू नहीं होतीं। एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर कोई मुस्लिम पुरुष अपनी पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी का रजिस्ट्रेशन कराना चाहता है, तो उसकी पहली पत्नी को सुना जाना जरूरी है — यानी यह देखा जाए कि वह इस पर सहमत है या नहीं।

न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां

अदालत ने कहा, मुझे नहीं लगता कि कुरान या मुस्लिम कानून किसी पुरुष को अपनी पहली पत्नी के रहते हुए — और उसकी जानकारी के बिना — किसी दूसरी महिला से वैवाहिक या बाहरी संबंध बनाने की अनुमति देता है। अदालत ने माना कि मुस्लिम पुरुष को दूसरी शादी की अनुमति मिल सकती है, लेकिन यह केवल विशेष परिस्थितियों में संभव है। न्यायमूर्ति ने स्पष्ट कहा कि पहली पत्नी चुपचाप दर्शक नहीं बन सकती जब उसका पति दूसरी शादी दर्ज कराना चाहता है।

अदालत का आदेश

अदालत ने एक याचिका पर यह फैसला सुनाया जिसमें एक व्यक्ति और उसकी दूसरी पत्नी ने राज्य सरकार से अपनी शादी का पंजीकरण कराने का आदेश देने की मांग की थी। लेकिन अदालत ने याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि पहली पत्नी को पक्षकार नहीं बनाया गया है। न्यायालय ने कहा, “पहला पति दोबारा शादी कर सकता है अगर उसका व्यक्तिगत कानून इसकी अनुमति देता है, लेकिन जब वह उस शादी को कानून के तहत दर्ज कराना चाहता है, तो पहली पत्नी को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए।”

“धर्म द्वितीयक” और “संवैधानिक अधिकार सर्वोच्च”

अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में “धर्म द्वितीयक” और “संवैधानिक अधिकार सर्वोच्च” हैं। न्यायमूर्ति कुन्हीकृष्णन ने टिप्पणी की, “मैं आश्वस्त हूं कि 99.99% मुस्लिम महिलाएं अपने पति की दूसरी शादी के खिलाफ होंगी जब उनकी पहली शादी अभी भी जारी है।” केरल हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल मुस्लिम विवाह कानून के संदर्भ में अहम है, बल्कि यह महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों और समानता के सिद्धांत को भी मज़बूत करता है। अदालत ने साफ कहा कि व्यक्तिगत कानून से ऊपर संविधान का स्थान है और महिलाओं की राय को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

अदालत ने क्या व्यवस्था दी

विवाह पंजीकरण अधिकारी को यह अधिकार है कि वह पहली पत्नी की बात सुने। अगर वह दूसरी शादी को अवैध बताकर आपत्ति करती है, तो मामला सिविल कोर्ट को भेजा जा सकता है ताकि विवाह की वैधता तय हो सके। न्यायालय ने कहा कि यह निर्णय मुस्लिम महिलाओं को कम से कम रजिस्ट्रेशन के चरण में अपनी बात रखने का अवसर देगा।

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