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Same Sex Tax case: आयकर कानून की धारा 56(2)(x) को चुनौती…समान-लिंगी जोड़े को उपहार को टैक्स से छूट नहीं

Same Sex Tax case: बॉम्बे हाईकोर्ट ने समान-लिंगी (same-sex) जोड़े की उस याचिका पर अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने आयकर अधिनियम की धारा 56(2)(x) को चुनौती दी है।

याचिकाकर्ताओं का दावा

याचिकाकर्ता पायियो अशीहो, जो एक गृहिणी हैं, और विवेक दिवान, जो एक वकील हैं, ने अदालत से आग्रह किया है कि उन्हें भी “spouse (पति/पत्नी)” की परिभाषा में शामिल किया जाए ताकि समान कर लाभ मिल सके। उन्होंने कहा कि मौजूदा कानून समान-लिंगी जोड़ों के साथ आर्थिक भेदभाव करता है। यह प्रावधान विषमलैंगिक (heterosexual) पति-पत्नी के बीच दिए गए उपहारों को टैक्स से छूट देता है, लेकिन समान-लिंगी जोड़ों को यह लाभ नहीं मिलता।

समान-लिंगी विवाह कानून द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है

सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह, जो केंद्र सरकार और आयकर विभाग की ओर से पेश हुए, ने अदालत को बताया कि विभाग ने अपना हलफनामा दाखिल कर दिया है, लेकिन वित्त मंत्रालय को यह तय करने के लिए और समय चाहिए कि वह उसी हलफनामे को अपनाएगा या अलग से नया दायर करेगा। सिंह ने कहा कि “समान-लिंगी विवाह कानून द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है”, इसलिए अदालत को इस पहलू को ध्यान में रखना चाहिए। विभाग के जवाब में कहा गया कि याचिकाकर्ता “आयकर कानून का इस्तेमाल विवाह या जीवनसाथी की परिभाषा को चुनौती देने के लिए” कर रहे हैं, जबकि इन शब्दों की कानूनी व्याख्या पहले से ही विभिन्न विवाह अधिनियमों में तय है।

आयकर विभाग ने दिया तर्क

विभाग ने यह भी तर्क दिया कि जब तक किसी संबंध को किसी वैवाहिक कानून के तहत “विवाह या पति-पत्नी” के रूप में मान्यता नहीं मिलती, तब तक उसे आयकर अधिनियम में भी मान्यता नहीं दी जा सकती। वित्त मंत्रालय ने अतिरिक्त समय की मांग की, जिस पर याचिकाकर्ताओं के वकील ने यह कहते हुए जल्द सुनवाई की अपील की कि 31 दिसम्बर 2025 तक कर अनुपालन की समयसीमा है। हालांकि, अदालत ने कहा कि यह मामला इतनी जल्दी निपटाया नहीं जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की “मामले की पूरी बहस के बाद ही फैसला आएगा। इसमें समय लगेगा।”

जबरन कर वसूली से सुरक्षा की मांग की

याचिकाकर्ताओं ने विभाग से किसी भी जबरन कर वसूली (coercive action) से सुरक्षा की मांग भी की, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया। बेंच ने कहा, “कहां है जबरन कार्रवाई का सवाल? अगर आप बाद में केस जीतते हैं तो आपको रिफंड मिल जाएगा।” याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि समान-लिंगी संबंधों में नामांकित व्यक्तियों को विषमलैंगिक विवाह की तुलना में अलग कर व्यवहार का सामना करना पड़ता है और अंतरिम राहत न देना अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव को समर्थन देने जैसा होगा।

बेंच की रचना में बदलाव होने पर नए सिरे से मामला सुनेंगे

बेंच ने इस दलील को भी अस्वीकार कर दिया और कहा कि जब तक सुनवाई पूरी नहीं होती, भेदभाव की बात पर विचार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले को “पार्ट-हीयरड” (part-heard) नहीं रखेगी, यानी अगर बेंच की रचना में बदलाव हुआ तो मामला नए सिरे से सुना जाएगा। हाईकोर्ट ने अब सुनवाई 10 दिसंबर 2025 तक के लिए स्थगित कर दी है और वित्त मंत्रालय को उस तारीख तक अपना हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

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