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Habeas corpus petition: मप्र हाईकोर्ट के हैबियस कॉर्पस याचिका पर फैसला…सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इस कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर दिया

Habeas corpus petition: सुप्रीम कोर्ट ने चार बार जमानत अर्जी खारिज होने के बावजूद हैबियस कॉर्पस याचिका के आधार पर एक आरोपी को रिहा करने के निर्देश को रद्द कर दिया।

राज्य सरकार की अपील स्वीकार

सुप्रीम कोर्ट की बेंच जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन ने राज्य सरकार की अपील स्वीकार करते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली को “कानून में कहीं न मिलने वाला” और “इस कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला” बताया। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।

यह है मामला

भोपाल में 2021 में cheating और criminal breach of trust का एक केस हुआ था। इस केस में आरोपी जिब्राखान लाल साहू को दिसंबर 2023 में गिरफ्तार किया था। फरवरी 2024 में चार्जशीट दाखिल होने के बाद साहू ने हाईकोर्ट में नियमित जमानत के लिए चार बार आवेदन किए। इन्हें जनवरी से मई 2024 के बीच खारिज कर दिया गया। इन लगातार असफल कोशिशों के बाद आरोपी की बेटी कुसुम साहू ने हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर कहा कि उनके पिता की हिरासत गैरकानूनी है। 3 अक्टूबर 2024 को हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर साहू को ₹5,000 के निजी मुचलके पर छोड़ने का आदेश दे दिया और कहा कि परिवार की आर्थिक मजबूरी के चलते वे सुप्रीम कोर्ट नहीं जा पाए, इसलिए यह हिरासत अवैध मानी जाएगी।

राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी

राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 18 जुलाई 2025 को शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए कहा था कि यह निर्णय “prima facie चौंकाने वाला” है। रोक के बावजूद साहू ने 25 अक्टूबर तक समर्पण नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए साफ कहा कि किसी आरोपी की वह हिरासत, जो एक आपराधिक मामले में कानूनी प्रक्रिया के तहत हो और जिसके जमानत आवेदन कई बार खारिज हो चुके हों, उसे किसी भी सूरत में अवैध नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने मामले की समीक्षा ऐसे की “जैसे वह जमानत खारिज होने के आदेश पर अपील सुन रहा हो”, जबकि हैबियस कॉर्पस में ऐसा करना पूरी तरह गलत है।

यह रही बेंच की टिप्पणी

बेंच ने कहा, “जिस तरीके से यह मामला निपटाया गया है, वह इस कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर देता है। अगर ऐसे आदेशों को चलन में आने दिया गया, तो यह कानून की प्रक्रिया को ही ठप कर देगा। इसलिए इसे शुरुआत में ही रोकना जरूरी है।” कोर्ट ने स्पष्ट किया, “किसी आरोपी की कानूनी हिरासत को अवैध नहीं कहा जा सकता, खासकर तब जब उसकी जमानत अर्जी बार-बार खारिज हो चुकी हो।”चूंकि साहू अब समर्पण कर चुका है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भविष्य में वह यदि कोई जमानत याचिका दायर करता है, तो संबंधित अदालत उसे उसके स्वतंत्र गुण-दोष के आधार पर ही सुने।

कानूनी एक्सप्लेनर: हैबियस कॉर्पस याचिका क्या है

हैबियस कॉर्पस (Habeas Corpus) एक मौलिक अधिकार से जुड़ा हुआ कानूनी उपाय है, जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को गैरकानूनी हिरासत या गिरफ्तारी से बचाना है। यह शब्द लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है “शरीर पेश करो” या “व्यक्ति को अदालत के सामने लाओ”।

कब दायर होती है हैबियस कॉर्पस याचिका

जब किसी व्यक्ति को: बिना कानूनी आधार के हिरासत में रखा गया हो, पुलिस या कोई एजेंसी गैरकानूनी तरीके से रोक रही हो, किसी को गायब कर दिया गया हो और उसका पता न चल रहा हो, किसी निजी व्यक्ति द्वारा भी अवैध रूप से बंद करके रखा गया हो, तब उसके परिवारजन, दोस्त या कोई भी तीसरा व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर सकते हैं।

यह किस अधिकार की रक्षा करती है

यह याचिका अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) तथा अनुच्छेद 32 / 226 के तहत व्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी को सुरक्षित रखती है।

अदालत क्या करती है

कोर्ट आदेश देती है कि हिरासत में रखे गए व्यक्ति को अदालत के सामने लाया जाए, बताएं कि व्यक्ति को किस कानून के तहत पकड़ा गया है, यदि गिरफ्तारी कानूनी आधार पर नहीं है, तो कोर्ट तुरंत व्यक्ति को रिहा कर देती है।

किन मामलों में हैबियस कॉर्पस नहीं चलती

जब व्यक्ति कानूनी आदेश के तहत जेल में हो, अदालत पहले ही गिरफ्तारी या रिमांड को वैध मान चुकी हो, व्यक्ति सज़ा काट रहा हो, वैवाहिक/हिरासत विवाद में जहां माता-पिता का अधिकार तय होना हो (कुछ मामलों में ही स्वीकार की जाती है)।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

क्योंकि यह नागरिकों के अधिकारों की अंतिम ढाल है। यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी सरकार, पुलिस या व्यक्ति किसी की स्वतंत्रता का दुरुपयोग न कर सके, गिरफ्तार व्यक्ति को कानूनी सुरक्षा मिले, मनमानी गिरफ्तारी रोकी जा सके।

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