Supreme Court View
Hindu women’s Will: सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी महिलाओं—खासतौर पर हिंदू महिलाओं—से अपील की।
संपत्ति को लेकर जीवनकाल में ही वसीयत (Will) बना लें
शीर्ष कोर्ट ने हिंदू महिलाओं से कहा, वे अपनी संपत्ति को लेकर जीवनकाल में ही वसीयत (Will) बना लें। कोर्ट ने कहा कि इससे उनकी संपत्ति उनकी इच्छा के अनुसार बंटेगी और मौत के बाद माता-पिता और ससुराल वालों के बीच संभावित विवाद से भी बचा जा सकेगा।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा
“हम सभी महिलाओं और विशेष रूप से हिंदू महिलाओं से अपील करते हैं कि वे तुरंत वसीयत बनाएं, ताकि उनकी संपत्ति—including self-acquired property—उनकी इच्छा के अनुसार वितरित हो सके और आगे किसी तरह की मुकदमेबाज़ी न हो।”
SC ने PIL पर फैसला टाला, लेकिन बड़ा संदेश दिया
बेंच के समक्ष एक वकील की ओर से दाखिल PIL में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1)(b) को चुनौती दी गई थी। यह धारा कहती है—अगर कोई हिंदू महिला बिना वसीयत (intestate) और बिना पति, बेटे या बेटी के मरती है, तो उसकी संपत्ति पहले पति के वारिसों को जाएगी। माता-पिता को हक तभी मिलेगा जब पति के वारिस न हों (15(1)(c)) कोर्ट ने इस धारा की संवैधानिकता पर फैसला देने से इनकार किया और मुद्दा खुले रखा। लेकिन साथ ही बेहद महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए।
अब ऐसे मामलों में कोर्ट जाने से पहले जरूरी होगी ‘प्री-लिटिगेशन मेडिएशन’
कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर किसी हिंदू महिला की मौत वसीयत के बिना होती है और उसके माता-पिता या माता-पिता के वारिस संपत्ति पर दावा करते हैं तो वे केस दायर करने से पहले अनिवार्य रूप से मेडिएशन से गुजरें
कोर्ट ने कहा
“प्री-लिटिगेशन मेडिएशन ज़रूरी होगी। और समझौता हो जाए तो उसे कोर्ट के डिक्री की तरह माना जाएगा।” इसके लिए राज्य, ज़िला और तालुका के स्तर पर मेडिएशन सेंटरों/लीगल सर्विस अथॉरिटी को ऐसे आवेदन लेने का निर्देश दिया गया।
पेटिशनर का पक्ष—‘पति के वारिसों को प्राथमिकता देना मनमाना’
पेटिशनर के वकील ने दलील दी कि महिलाएं आज self-acquired property रखती हैं, ऐसे में सिर्फ पति के वारिसों को प्राथमिकता देना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। माता-पिता को समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
सरकार का जवाब—1956 में महिलाओं की संपत्ति की स्थिति अलग थी
ASG केएम नटराज ने कहा, यह मुद्दा किसी निजी विवाद में उठना चाहिए, न कि एक वकील द्वारा 1956 में संसद ने धारा 15 वैज्ञानिक आधार पर बनाई। शायद यह अनुमान नहीं था कि महिलाएं बड़ी संख्या में self-acquired property रखेंगी। लेकिन कानून उन्हें वसीयत बनाने की पूरी आजादी देता है (Section 30)।
कोर्ट ने कहा—समय बदल चुका है, महिलाएं अब संपत्ति अर्जित कर रही हैं
बेंच ने माना कि महिलाओं की शिक्षा, नौकरी, उद्यमिता बढ़ी है, वे अपनी संपत्ति बना रही हैं। ऐसे में बिना वसीयत के संपत्ति पति के दूर के रिश्तेदारों तक चली जाए और माता-पिता को न मिले, तो विवाद और “heart burn” होना स्वाभाविक है। हालांकि कोर्ट ने इस पर कोई कानूनी टिप्पणी नहीं की।
अंत में कोर्ट का संदेश—वसीयत बनाइए और विवाद से बचिए
कोर्ट ने साफ कहा, “हम सभी महिलाओं—विशेषकर हिंदू महिलाओं—से आग्रह करते हैं कि वे अपनी संपत्ति पर वसीयत अवश्य बनाएं, ताकि उनके बाद कोई विवाद या मुकदमा न खड़ा हो।” साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर भविष्य में कोई प्रभावित पक्ष चाहे तो धारा 15(1)(b) की वैधता को चुनौती दे सकता है।
IN THE SUPREME COURT OF INDIA
ORIGINAL JURISDICTION
W.P.(C) No. 732/2020
Snidha Mehra v. Union of India






