Monday, August 10, 2026
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PRESIDENTIAL REFERENCE: SC का बड़ा फैसला: राज्यपाल-बिल पर टाइमलाइन नहीं, ‘अनंत देरी’ भी नहीं!

PRESIDENTIAL REFERENCE: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि यदि राज्य विधानसभा किसी बिल को संशोधन के साथ या बिना संशोधन के दोबारा उन्हें भेजती है, तब भी वे उसे राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित कर सकते हैं।

संवैधानिक संस्थाओं के बीच संवाद की प्रक्रिया शुरू करने के लिए अहम

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जज संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से माना कि अनुच्छेद 200 के पहले प्रावधान के तहत राज्यपाल के पास शुरू में तीन विकल्प होते हैं—असेंट देना, बिल को राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करना या उसे संदेश के साथ पुनर्विचार हेतु विधानसभा को लौटाना। पीठ में जस्टिस सूर्य कांत, विक्रम नाथ, पी.एस. नरसिंह और ए.एस. चंद्रचूड़ भी शामिल थे। अदालत ने कहा कि पहले चरण में राज्यपाल का विवेकाधिकार “संवैधानिक संस्थाओं के बीच संवाद की प्रक्रिया” शुरू करने के लिए महत्वपूर्ण है।

दूसरी बार बिल लौटने पर राज्यपाल के सामने दो विकल्प

अदालत ने स्पष्ट किया, “जब बिल राज्यपाल को दूसरी बार लौटकर आता है, तब भी उनके पास दो विकल्प रहते हैं—या तो असेंट दें या बिल को राष्ट्रपति के पास भेजें। यह अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं करता कि बिल संशोधित रूप में लौटा है या बिना संशोधन।” प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 200 का दूसरा प्रावधान राज्यपाल के विवेकाधिकार को फिर दोहराता है। यदि राज्यपाल की राय में कोई बिल हाईकोर्ट की शक्तियों को कमज़ोर कर सकता है या संवैधानिक ढांचे में उसकी स्थिति को प्रभावित कर सकता है, तो उसे राष्ट्रपति के पास भेजना अनिवार्य हो जाता है।

राज्यों को विधायी नीतियां तय करने का पूरा अधिकार

अदालत ने कहा कि यह पढ़ना गलत होगा कि दूसरी बार बिल लौटने पर राज्यपाल के पास सिर्फ एक विकल्प—असेंट देना—ही बचता है। यह संविधान के उस प्रावधान के विपरीत होगा जिसमें हाईकोर्ट की शक्तियों पर प्रभाव डालने वाले मामलों में राष्ट्रपति की भूमिका स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई है। पीठ ने कहा, “अनुच्छेद 200 की सही व्याख्या दोनों विकल्पों—असेंट और राष्ट्रपति के पास भेजने—को बरकरार रखती है। यही भारत के संवैधानिक संवाद और सहकारी संघवाद की भावना को मजबूत करती है।”
संघवाद पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यों को उनके संवैधानिक दायरे में अपनी विधायी नीतियां तय करने का पूरा अधिकार है।

मेल-मिलाप ही हमारी संवैधानिक व्यवस्था की मूल भावना

अदालत ने कहा, “राज्यपाल द्वारा बिना किसी संवादात्मक प्रक्रिया अपनाए बिल को रोके रखना संघवाद के सिद्धांतों के विपरीत है।”पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 200 का पहला प्रावधान राज्यपाल और विधानसभा के बीच संवैधानिक बातचीत शुरू करता है और बिल को राष्ट्रपति के पास भेजने का विकल्प भारतीय संघवाद में संतुलन और जाँच-परख के सिद्धांतों को दर्शाता है। अदालत ने यह भी जोड़ा, “संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को यह समझना चाहिए कि संवाद, संतुलन और मेल-मिलाप ही हमारी संवैधानिक व्यवस्था की मूल भावना है—अवरोधक रवैया नहीं।”

अनुच्छेद 200 की व्याख्या की गई

अनुच्छेद 200 राज्यपाल को यह शक्ति देता है कि वे विधानसभा द्वारा पारित बिल पर असेंट दें, रोकें या उसे राष्ट्रपति के पास भेजें। वे बिल को टिप्पणियों या पुनर्विचार के लिए भी लौटाने का अधिकार रखते हैं। यह फैसला राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए राष्ट्रपति रेफ़रेंस के जवाब में आया है, जिसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत यह राय मांगी थी कि क्या अदालत राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदाधिकारियों पर बिलों के निस्तारण के लिए कोई समयसीमा थोप सकती है।

IN THE SUPREME COURT OF INDIA
ADVISORY JURISDICTION
SPECIAL REFERENCE NO. 1 of 2025
IN RE: ASSENT, WITHHOLDING OR RESERVATION OF BILLS
BY THE GOVERNOR AND THE PRESIDENT OF INDIA.

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