Monday, August 17, 2026
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Air pollution crisis: प्रदूषण अब सर्दियों में “रूटीन केस” की तरह नहीं है…यह क्याें रही सुप्रीम टिप्पणी

Air pollution crisis: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण को केवल सर्दियों के मौसम में सुनवाई योग्य “रूटीन मुद्दा” नहीं माना जा सकता।

कोविड में पराली भी जल रही थी, फिर भी आसमान नीला था…

शीर्ष अदालत ने कहा कि अब इस मामले की सुनवाई हर महीने कम से कम दो बार होगी, ताकि प्रदूषण रोकने के लिए तात्कालिक और दीर्घकालिक समाधान पर ठोस प्रगति देखी जा सके। मुख्य न्यायाधीश सुर्या कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि पराली जलाने को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी और दोषारोपण का सिलसिला खत्म होना चाहिए। सीजेआई, जो हरियाणा के हिसार के किसान परिवार से आते हैं, ने सवाल उठाया—“कोविड के दौरान भी पराली जल रही थी, फिर भी लोग साफ नीला आसमान देख पा रहे थे। यह बताता है कि और भी कई कारक जिम्मेदार हैं।”

“पराली पर अनावश्यक राजनीति न हो”

सीजेआई ने कहा कि किसानों पर बोझ डालकर समस्या का पूरा आरोप पराली पर थोपना उचित नहीं है। उन्होंने केंद्र से CAQM, CPCB और अन्य एजेंसियों द्वारा उठाए गए तात्कालिक व दीर्घकालिक कदमों का विस्तृत रोडमैप एक हफ्ते में मांगा है। मामला अगली सुनवाई के लिए 10 दिसंबर को सूचीबद्ध किया गया है।

“सिर्फ सर्दियों में नहीं, पूरे साल निगरानी”

अदालत ने कहा—“दिल्ली प्रदूषण को केवल अक्टूबर-नवंबर में सूचीबद्ध करने का कोई औचित्य नहीं। इसे पूरे साल नियमित रूप से मॉनिटर करना होगा।” CJI ने हल्के अंदाज़ में कहा कि शायद आज सुनवाई होने की वजह से ही एयर क्वालिटी में थोड़ी सुधार आई है।

सरकार ने गिनाए प्रदूषण के मुख्य स्रोत

केंद्र की ओर से पेश एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि पराली, वाहनों से निकलने वाला धुआं, कंस्ट्रक्शन-डस्ट, रोड-डस्ट और बायोमास बर्निंग—ये सभी बड़ी वजहें हैं। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र में उठाए गए कदमों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी।

“लॉकडाउन में पराली जली, फिर भी नीला आसमान—सोचने की जरूरत”

कोर्ट ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान गतिविधियां सीमित थीं और लोग सितारों वाला आसमान देख पा रहे थे, जो बताता है कि अन्य बड़े फैक्टर भी गंभीर रूप से जिम्मेदार हैं।

शहरों की अनियोजित वृद्धि पर भी टिप्पणी

CJI ने कहा कि देश के बड़े शहरों को इतनी तेज जनसंख्या और प्रति घर कई कारों के हिसाब से कभी प्लान ही नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि विकास कभी भी लोगों की जीवन-गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव नहीं डालना चाहिए।

निगरानी के लिए वैज्ञानिक विश्लेषण जरूरी

पीठ ने कहा कि किन कारणों का प्रदूषण में कितना योगदान है—इसका वैज्ञानिक विश्लेषण होना चाहिए। उन्होंने कहा, “अदालत समाधान नहीं दे सकती, लेकिन सभी हितधारकों के लिए मंच उपलब्ध करा सकती है।”

वाहन और धूल सबसे बड़े दोषी: अमिकस क्यूरी

अमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने बताया कि वाहनों और धूल से सबसे ज्यादा प्रदूषण हो रहा है। उन्होंने कई AQI मॉनिटरिंग उपकरणों के खराब होने की भी शिकायत की।

दिल्ली की सड़कों पर दोनों ओर पार्किंग—स्थायी समस्या

एक वकील ने सड़कों पर दोनों ओर खड़ी कारों को भी प्रमुख समस्या बताया, जिस पर कोर्ट ने कहा कि मेट्रो परियोजनाओं का असर भविष्य में तो दिखेगा, लेकिन अभी तात्कालिक कदम जरूरी हैं।

पहले भी कोर्ट ने जताई चिंता

27 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मुद्दा नियमित निगरानी का है, न कि जादुई समाधान खोजने का। 19 नवंबर को अदालत ने CAQM को सुझाव दिया था कि खुले में होने वाले खेल आयोजन बच्चों के लिए सुरक्षित महीनों में करवाए जाएं। अदालत ने GRAP के तहत सालभर प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए टिकाऊ, दीर्घकालिक उपायों की जरूरत पर जोर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण पर अब “कभी-कभी की सुनवाई” नहीं बल्कि सालभर की सतत निगरानी की जाएगी, ताकि जमीन पर असर दिखाने वाले समाधान लागू हो सकें।

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