Execution Proceedings: मद्रास हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (Maintenance) की बकाया राशि की वसूली के लिए वारंट जारी करने की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है।
सीआरपीसी की निर्धारित क्रमिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट भरण-पोषण के मामलों में गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrant – NBW) सीधे जारी नहीं कर सकते हैं; इसके लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत निर्धारित क्रमिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी ने पति द्वारा दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण कानून (धारा 125 CrPC) का उद्देश्य सामाजिक न्याय और कमजोर पक्ष को वित्तीय सुरक्षा देना है, लेकिन इसे लागू करने में भुगतान करने वाले व्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रक्रियात्मक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
यह है मामले का तथ्य
पत्नी और बेटी ने पति से क्रमशः ₹6,000 और ₹4,000 प्रति माह भरण-पोषण प्राप्त करने का आदेश हासिल किया था। पति ने एक साल से अधिक समय तक भुगतान नहीं किया। इस पर न्यायिक मजिस्ट्रेट ने यह निष्कर्ष निकालते हुए कि पति के पास पर्याप्त साधन होने के बावजूद उसने जानबूझकर चूक की है, सीधे गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर दिया।
पति की दलीलें (याचिकाकर्ता)
पति ने NBW को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने धारा 87 CrPC का उल्लंघन किया है, जो एक पदानुक्रम (hierarchy) निर्धारित करती है: पहले समन, फिर जमानती वारंट (Bailable Warrant)। और केवल इन कदमों की विफलता के बाद ही गैर-जमानती वारंट जारी किया जा सकता है। उसने तर्क दिया कि NBW को तुरंत जारी करना प्रक्रियात्मक रूप से दोषपूर्ण और नैसर्गिक न्याय का उल्लंघन है। उसने यह भी कहा कि भरण-पोषण का आदेश सत्र न्यायालय में पुनरीक्षण (Revision) के अधीन है, इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा एक साथ वसूली की कठोर कार्रवाई शुरू करना न्यायिक अनुचितता है।
पत्नी की दलीलें (विपक्षी)
पत्नी ने श्री बी. राजेश सरवनन के माध्यम से याचिका का vehemently विरोध किया। उन्होंने कहा कि पति लगातार अपनी कानूनी जिम्मेदारियों से बच रहा है और उसने बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद एक रुपया भी नहीं चुकाया है। NBW नोटिस और सुनवाई के बाद ही जारी किया गया था और यह जानबूझकर चूक करने वाले व्यक्ति की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए न्यायसंगत तंत्र था। भरण-पोषण आदेशों को लागू कराना जरूरी है ताकि महिलाओं और बच्चों को कोर्ट द्वारा आदेशित सहायता मिल सके।
हाई कोर्ट का फैसला और दिशा-निर्देश
न्यायमूर्ति विक्टोरिया गौरी ने NBW को रद्द करते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश में प्रक्रियात्मक अनियमितताओं को रेखांकित किया।
- विधिक प्रावधान का अभाव: कोर्ट ने पाया कि मजिस्ट्रेट के आदेश में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख नहीं किया गया था कि NBW किस विशिष्ट कानूनी प्रावधान के तहत जारी किया गया है।
- धारा 87 CrPC का उल्लंघन: कोर्ट ने माना कि मजिस्ट्रेट ने क्रमिक प्रक्रिया (समन, जमानती वारंट, फिर NBW) को दरकिनार कर दिया। NBW को ‘अंतिम उपाय’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘पहला उपाय’ के रूप में जारी किया गया था, जो आपराधिक न्यायशास्त्र के मूल के खिलाफ है।
- स्वतंत्रता का अधिकार: न्यायालय ने दोहराया कि भले ही याचिकाकर्ता (पति) चूककर्ता हो, लेकिन प्रक्रियात्मक अनियमितता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह मनमानी गिरफ्तारी के विरुद्ध संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करता है।
यह रहा कोर्ट का आदेश
गैर-जमानती वारंट (NBW रद्द) किया जाता है। मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया जाता है कि वह गैर-जमानती उपाय का सहारा लेने से पहले सभी प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं का पालन करे। कोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह भरण-पोषण की स्वीकृत बकाया राशि का 50% चार सप्ताह के भीतर जमा करे। इस फैसले से यह सुनिश्चित किया गया है कि भरण-पोषण के आदेशों को लागू करने की शक्ति का उपयोग न्यायिक संयम और निष्पक्षता के साथ किया जाए।

