Wednesday, November 4, 2026
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Conviction overturns: इंसाफ में लगे 24 साल…इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा पलटी

Conviction overturns: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्याय व्यवस्था की एक बड़ी चूक को सुधारते हुए एक व्यक्ति को बाइज्जत बरी कर दिया।

लंबी कैद को “मामले का सबसे दुखद हिस्सा” बताया गया

मामले के अनुसार, आरोपी ने बिना किसी ठोस सबूत के जेल की सलाखों के पीछे 24 साल गुजार दिए। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने मैनपुरी की निचली अदालत द्वारा 2002 में सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। मामले का दुखद पहलू अदालत ने आरोपी आजाद खान की इतनी लंबी कैद को “मामले का सबसे दुखद हिस्सा” बताया। हाईकोर्ट ने पाया कि 2000 के एक डकैती मामले में आरोपी को केवल उसके इकबालिया बयान (धारा 313 CrPC) के आधार पर सजा सुनाई गई थी, जबकि अभियोजन पक्ष के पास कोई स्वतंत्र गवाह या सबूत नहीं था।

खुलासा: डर के साये में कबूला जुर्म

डर के साये में कबूला जुर्म हाईकोर्ट की जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि आज़ाद खान ने डर के कारण जुर्म कबूला था। उसने सात बार आवेदन देकर कहा था कि यदि वह जेल से बाहर आया, तो पुलिस और मुखबिर मिलकर उसकी हत्या कर देंगे। कोर्ट ने कहा, “यह स्वीकारोक्ति स्वैच्छिक नहीं बल्कि जान बचाने का एक प्रयास थी।”

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

  • कानूनी सहायता का अभाव: आरोपी को कोई वकील नहीं दिया गया, जो अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और धारा 304 CrPC का सीधा उल्लंघन है।
  • अकेला बयान काफी नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी पुख्ता सबूत के केवल आरोपी के बयान पर सजा नहीं दी जा सकती।
  • तत्काल रिहाई: अदालत ने 19 दिसंबर के अपने फैसले में सजा रद्द करते हुए आज़ाद खान को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।
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