Pendency of the case: न्यायपालिका से मानवीय संवेदना का एक बड़ा उदाहरण सामने आया है।
सजा को पहले ही काटी गई जेल अवधि तक सीमित
राजस्थान हाईकोर्ट ने 32 साल पुराने एक मामले में फैसला सुनाते हुए 91 और 92 वर्ष की आयु के दो बुजुर्गों को जेल की सजा से मुक्त कर दिया है। अदालत ने उनकी “अत्यधिक वृद्धावस्था” और दशकों तक चली “कानूनी प्रक्रिया की पीड़ा” को आधार बनाते हुए उनकी सजा को उनके द्वारा पहले ही काटी गई जेल अवधि (Already Undergone) तक सीमित कर दिया है।
यह था मामला
यह विवाद 1993 में एक स्थानीय संपत्ति विवाद से शुरू हुआ था। दोनों बुजुर्गों पर गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा होने, जमीन पर अतिक्रमण करने और संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का आरोप था। इसके बाद उन पर IPC और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। 1996 में निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था, जिसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की थी।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
न्यायमूर्ति फरजंद अली की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला:
- लंबा अंतराल: कोर्ट ने कहा कि घटना 1993 की है और आरोपी पिछले 32 वर्षों से आपराधिक कार्यवाही और मानसिक चिंता का सामना कर रहे हैं।
- कोई आपराधिक इतिहास नहीं: यह उनका पहला और एकमात्र आपराधिक मामला था। जांच और अपील के दौरान वे जमानत पर रहे और कभी अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया।
- सुधारात्मक व्यवहार: पिछले तीन दशकों में वे समाज के “कानून मानने वाले नागरिक” के रूप में स्थापित हुए हैं।
न्यायिक निंदा और संदेश
राहत देने के साथ ही कोर्ट ने कानून को हाथ में लेने की प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना की। अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति से जुड़े विवादों का समाधान केवल कानूनी प्रक्रिया से ही होना चाहिए, न कि निर्माण गिराकर या हिंसा के माध्यम से। हाईकोर्ट ने अंत में कहा कि इस उम्र में उन्हें फिर से जेल भेजना न तो समाज के लिए उपयोगी होगा और न ही न्यायसंगत, बल्कि यह उनके परिवारों के लिए “अनावश्यक कठोरता” होगी।

