Marriage Registration: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, अगर पति-पत्नी शादी के बाद कभी साथ नहीं रहे और उनका रिश्ता कभी शुरू ही नहीं हुआ, तो ऐसे रिश्ते को जबरन बनाए रखना ठीक नहीं है।
शादी का रजिस्ट्रेशन केवल एक कानूनी औपचारिकता
कोर्ट ने कहा कि शादी का रजिस्ट्रेशन केवल एक कानूनी औपचारिकता है, इससे यह साबित नहीं होता कि दोनों ने रिश्ता निभाया या निभाने की मंशा थी। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें फैमिली कोर्ट ने शादी के एक साल पूरे होने से पहले आपसी सहमति से तलाक की याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के इस फैसले को गलत ठहराया और कहा कि ऐसे मामलों में जबरन रिश्ता बनाए रखना दोनों पक्षों के लिए मानसिक पीड़ा का कारण बन सकता है।
शादी के बाद कभी साथ नहीं रहे
इस मामले में दोनों की शादी 30 मार्च 2025 को हुई थी और 2 अप्रैल 2025 को रजिस्ट्रेशन हुआ था। शादी के तुरंत बाद दोनों अपने-अपने माता-पिता के घर लौट गए और कभी साथ नहीं रहे। करीब सात महीने बाद दोनों ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी(1) के तहत आपसी सहमति से तलाक की याचिका दाखिल की। लेकिन फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि यह “असाधारण कठिनाई” का मामला नहीं है और शादी को बचाने की पर्याप्त कोशिश नहीं की गई।

