Anti-Conversion Case: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उस मुस्लिम छात्रा को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दे दी है, जिस पर अपने एक हिंदू सहपाठी को जबरन धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करने का आरोप था।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| विवरण | तथ्य |
| न्यायाधीश | जस्टिस अविनीश सक्सेना। |
| आरोपी | मलिष्का उर्फ मलिष्का फात्मा। |
| आरोप | बुर्का पहनने और मांसाहार के लिए दबाव (धर्मांतरण का प्रयास)। |
| कोर्ट की टिप्पणी | पीड़िता के बयान के अलावा अन्य कोई दस्तावेजी या ठोस साक्ष्य नहीं। |
| जमानत राशि | ₹25,000 (दो प्रतिभूतियों के साथ)। |
रिकॉर्ड पर कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं: कोर्ट
हाईकोर्ट जस्टिस अविनीश सक्सेना की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि आरोपी छात्रा, मलिष्का उर्फ मलिष्का फात्मा, के खिलाफ पीड़िता के बयान के अलावा रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं है जो उसकी संलिप्तता (Involvement) को सीधे तौर पर साबित करता हो। यह मामला दिसंबर 2025 की एक घटना से जुड़ा है, जहां एक ट्यूशन सेंटर में साथ पढ़ने वाली छात्राओं के बीच धर्म परिवर्तन के प्रयास का आरोप लगाया गया था।
कोर्ट का फैसला और शर्तें
- अदालत ने आरोपी छात्रा को राहत देते हुए निर्देश जारी किए।
- निजी मुचलका: आरोपी को ₹25,000 के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की दो प्रतिभूतियों (Sureties) पर जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया है।
- हाजिरी: उसे 30 दिनों के भीतर ट्रायल कोर्ट या जांच अधिकारी (IO) के सामने पेश होना होगा।
- साफ रिकॉर्ड: कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि आरोपी छात्रा का कोई पिछला आपराधिक इतिहास (Criminal Record) नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप
- यह मामला उत्तर प्रदेश के सख्त धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत दर्ज किया गया था।
- शिकायत: हिंदू छात्रा के भाई ने प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी कि उसकी बहन को बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया गया और इस्लाम स्वीकार करने के लिए दबाव डाला गया।
- पीड़िता का बयान: छात्रा ने पुलिस को बताया कि दिसंबर 2025 में कोचिंग के बाद वह मुस्लिम सहेलियों के साथ घूमने गई थी, जहाँ उसे दिन भर बुर्का पहनाया गया और मांसाहारी भोजन करने के लिए मजबूर किया गया। मना करने पर उसे कम से कम ‘ग्रेवी’ (Gravy) चखने का सुझाव दिया गया।
काउंटर-ब्लास्ट की दलील
- आरोपी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि यह मामला पूरी तरह से झूठा और “काउंटर-ब्लास्ट” (बदले की भावना से की गई कार्रवाई) है।
- उत्पीड़न का आरोप: मुस्लिम छात्राओं ने दावा किया कि शिकायतकर्ता (पीड़िता का भाई) उनमें से एक छात्रा को परेशान कर रहा था। जब उसने इसका विरोध किया, तो उसने इस गंभीर कानून का सहारा लेकर उन पर फर्जी मुकदमा दर्ज करा दिया।
पिछले आदेशों का संदर्भ
उल्लेखनीय है कि इससे पहले 16 अप्रैल, 2026 को हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने इस केस को रद्द (Quash) करने से इनकार कर दिया था। उस समय जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने कहा था कि युवाओं के बीच जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप “बेहद परेशान करने वाले” (Particularly disturbing) हैं। हालांकि, ताजा आदेश में कोर्ट ने केवल ‘अग्रिम जमानत’ के पहलू पर विचार किया है, न कि केस की मेरिट पर।
जांच और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संतुलन
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह आदेश स्पष्ट करता है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती और ठोस सबूत सामने नहीं आते, तब तक केवल आरोपों के आधार पर किसी छात्र के भविष्य और स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत मुख्य मुकदमा अभी भी चलता रहेगा।

