Court designates: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न उच्च न्यायालयों के सात सेवानिवृत्त (Retired) न्यायाधीशों को ‘वरिष्ठ अधिवक्ता’ (Senior Advocate) के रूप में नामित किया है।
यह निर्णय 18 मार्च को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता में आयोजित सुप्रीम कोर्ट की ‘फुल कोर्ट’ बैठक में लिया गया। 19 मार्च को जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, यह पदनाम तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी दिग्गजों को यह सम्मान प्रदान किया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित पूर्व न्यायाधीशों की सूची
- जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश।
- जस्टिस हर्षा नथालाल देवानी: गुजरात उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश।
- जस्टिस एम.एस. रमेश: मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश।
- जस्टिस मौना एम. भट्ट: गुजरात उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश।
- जस्टिस आर.एन. मंजुला: मद्रास उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश।
- जस्टिस उमेश चंद्र ध्यानी: उत्तराखंड उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश।
- जस्टिस विनोद चटर्जी कौल: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश।
यह होता है Senior Advocate का दर्जा
- मान्यता: यह सम्मान उन वकीलों या पूर्व न्यायाधीशों को दिया जाता है जिनके पास कानून का गहरा ज्ञान, लंबा अनुभव और बार या बेंच में विशिष्ट योगदान होता है।
- विशेषाधिकार: ‘सीनियर एडवोकेट’ की अपनी एक अलग गाउन (Gown) होती है और उन्हें अदालत में सुनवाई के दौरान प्राथमिकता (Precedence) दी जाती है।
- सीमाएं: वरिष्ठ अधिवक्ता सीधे मुवक्किलों (Clients) से केस नहीं ले सकते; उन्हें ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ (AOR) या किसी अन्य वकील के माध्यम से ही उपस्थित होना पड़ता है। वे अदालतों में हलफनामा दायर नहीं करते।
फुल कोर्ट मीटिंग का महत्व
सुप्रीम कोर्ट में जब सभी न्यायाधीश एक साथ बैठते हैं, तो उसे ‘फुल कोर्ट मीटिंग’ कहा जाता है। इसमें न्यायिक प्रशासन, वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नामांकन और न्यायपालिका से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले लिए जाते हैं।

